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आधे से ज्यादा देश समय सीमा के भीतर नहीं तय कर सके जलवायु के अपने नए लक्ष्य

साल 2020 के अंत में पेरिस समझौते (Paris Agreenment) के तहत देशों को अपने पुराने लक्ष्य ही हासिल नहीं कर सके. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

साल 2020 के अंत में पेरिस समझौते (Paris Agreenment) के तहत देशों को अपने पुराने लक्ष्य ही हासिल नहीं कर सके. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से निपटने के लिए पेरिस समझौते (Paris Agreement) के तहत हर देश को अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (Greenhouse gas emission) कटौती के लक्ष्य की समीक्षा हर पांच साल में करने थी. साल 2020 में बहुत से देश ऐसा नहीं कर सके.

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    साल 2015 में जलवायु परिवर्तन (Climate change) से निपटने के लिए दुनिया के बहुत सारे देशों ने पेरिस समझौता (Paris Agreement) किया था.  इस समझौते के तहत हर देश ने तय किया था. वह अपने ग्रीनहाउस गैस (Greenhouse gases) या कार्बन उत्सर्जन (Emission) में कटौती करने का लक्ष्य बनाएगा और हर पांच साल में अपनी उत्सर्जन योजनाओं की समीक्षा करनी थी. इस बार यह समय सीमा साल 2020 के अंत में खत्म हो गई है और अभी तक आधे से ज्यादा देश न केवल अपने तय कार्यक्रम से पीछे चल रहे हैं, बल्कि उन्होंने अपने संशोधित लक्ष्य (Upgraded commitments) भी तय नहीं किए हैं.

    क्या था पेरिस समझौते का लक्ष्य
    पेरिस समझौते पर लगभग सभी देशों ने हस्ताक्षर किए हैं. इस समझौते के अनुसार सभी देशों को ग्लोबल वार्मिंग की दर 2 डिग्री सेल्सियस  से नीचे रखना है. कोशिश यह है कि यह दर औद्योगिक क्रांति के दौर के पहले 1.5 डिग्री के स्तर पर पहुंच सके. हकीकत यह है कि अलग इन देशों के राष्ट्रीय स्तर पर तय किए गए योगदान हासिल भी हो गए तो भी पृथ्वी 3 डिग्री ज्यादा गर्म हो जाएगी. इसी लिए देशों ने यह संकल्प लिया था के वे अपनी कटौती में तेजी लाते हुए हर पांच साल में अपने लक्ष्यों की समीक्षा करेंगे.

    नेट जीरो का लक्ष्य?
    अंतिम तिथि 31 दिसंबर 2020 के आते-आते बहुत सारे बड़े उत्सर्जन करने वाले देशों ने कहा था कि वे इस सदी के अंत तक अपना आउटपुट नेट जीरो कर देंगे, लेकिन बहुत से देशों ने अपने छोटे लक्ष्यों की जानकारी प्रकाशित तक नहीं की है. बहुत से देशों ने साल 2030 तक अपने अंतिम लक्ष्य को हालिल करने का संकल्प लिया था. अमेरिका ने तो यह सीमा 2025 तक रखी थी.

    चीन की इरादा
    संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इस साल की शुरुआत में 200 में से केवल 70 देशों ने अपने संशोधित संकल्प की जानकारी दी है. इसमे से कुछ देशों ने इसकी वजह कोविड-19 महामारी को बताया है. लेकिन जलवायु के शुभचिंतकों  की दिलचस्पी चीन की योजनाओं में है जो दुनिया का सबसे बड़ा उत्सर्जक है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिन ने पिछले साल अपने महत्वाकांक्षी इरादे जाहिर करते हुए कहा था कि चीन साल 2060 तक कार्बन उदासीनता (Neutrality) को हासिल कर लेगा, लेकिन अभी तक उसने किसी तरह का कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं दिया है.

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    ग्रीनहाउस गैसों (Greenhouse Gases) के उत्सर्जन की कटौती के लिए पेरिस समझौते (Paris Agreements) के लक्ष्य काफी नहीं है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    अमेरिका की वापसी
    इसके अलावा इस साल अमेरिका ने भी अपने लक्ष्य निर्धारित नहीं किए क्योंकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्पने  पेरिस समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया था. फिर भी अच्छी खबर यह है कि चुने गए राष्ट्रपति जो बाइडन ने घोषणा की है कि अमेरिका पेरिस समझौते के अपने वादों की ओर लौटेगा.

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    लेकिन यह भी एक चिंता
    संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक यदि वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखने की उम्मीद करनी है तो अगले दस सालों में हमें हमारी कटौती 7.6 प्रतिशत प्रति वर्ष करने होगी. फिलहाल पृथ्वी की सतह 1.2 डिग्री सेल्सियस की औसत दर से गर्म हो रही है. मौसम में अति इसे और खतरनाक बना सकती है.

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    जलवायु परिवर्तन (Climate change) के दुष्प्रभावों से बचने के प्रयास अब तक नाकाफी साबित हुए हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    इतने देशों ने ही जमा किए प्रस्ताव
    क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर की ताजा आंकलन के मुताबिक 49 देशों ने दिसंबर मध्य तक अपने नए प्रस्ताव जमा कर दिए थे, लेकिन ये वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 23.7 प्रतिशत को ही प्रदर्शित करते हैं. इनमें से भी  27 देश यूरोपीय यूनियन के हैं. उसके बाद से 20 देशों ने अपने प्रस्ताव जमा कर दिए हैं. जिसमें दक्षिण कोरिया और अर्जेंटीना जैसे देश भी शामिल हैं.

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    कई देशों ने अपने प्रस्तावों में पुराने लक्ष्य ही रखे हैं तो जिन्होंने कुछ बड़े लक्ष्य निर्धारित किए हैं तो वे भी बहुत ज्यादा उम्मीद जगाने वाले नहीं दिखते हैं. यूरोपीय यूनियन ने अपने उत्सर्जन की कटौती को 40 प्रतिशत से 55 प्रतिशत का लक्ष्य बनाया है. लेकिन फिर भी यह पेरिस समझौते के लक्ष्य को हासिल करने की काफी नहीं है. अब इस साल यून कंनेवन्शन ऑन क्लाइमेंट चेंज ग्लासगो में होने वाली है. इस सम्मेलन से काफी उम्मीदें हैं.

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