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Climate Change: हिमालयी ग्लेशियर बदल रहे हैं रास्ते, टेक्टोनिक प्लेट भी एक वजह

Climate Change: हिमालयी ग्लेशियर बदल रहे हैं रास्ते, टेक्टोनिक प्लेट भी एक वजह

हिमालय ग्लेशियर (Himalaya Glaciers) के बहाव की दिशा बहुत ही असामान्य बहाव माना जा रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

हिमालय ग्लेशियर (Himalaya Glaciers) के बहाव की दिशा बहुत ही असामान्य बहाव माना जा रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) दुनिया के हर ग्लेशियर (Glaciers) को प्रभावित कर रहे हैं. लेकिन अभी तक ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के रूप में यही देखा जा रहा है कि ये ग्लेशियर बहुत ही जल्दी और तेजी से पिघल रहे हैं इसके साथ ही समय से पहले पिघल रहे हैं. इसमें हिमालय के ग्लेशियर भी अपवाद नहीं हैं. लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने नए अध्ययन में पाया है कि हिमालय (Himalaya) के उत्तराखंड के पिथौरगढ़ में उच्च काली गंगा धाटी में ग्लेशियर असामान्य रूप से अपने बहाव की दिशा बदल दिया है. जिसके लिए जलवायु परिवर्तन के अलावा टेक्टोनिक गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं.

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    जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण पूरी दुनिया में ऐसा बदलाव देखने को मिल रहे हैं जिनका अंदेशा आज से 50 साल पहले बिलकुल नहीं था. वायुमंडल से लेकर महासागरों में हर जगह जलवायु परिवर्तन ने असर दिखाया है. इसमें धरती की कई भूआकृतियों तक में बदलाव देखने को मिलने रहे हैं. जंगल, रेगिस्तान, बर्फ की चादरों के साथ अब हिमलय पर्वत जैसे इलाके भी इसकी जद में आ गए हैं.  अब भारतीय वैज्ञानिकों ने पहली  बार हिमालय ग्लोशियरों (Himalayan Glaciers) में भी एक बदलाव देखा है. ये ग्लेशियर अपने बहाव का रास्ता बदल रहे हैं, जिसके पीछे टेक्टोनिक गतिविधि (Tectonic Movement) भी एक कारण है.

    कहां किया गया अध्ययन
    भारतीय शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड के पिथौरगढ़ जिले के उच्च काली गंगा के ग्लेशियर का अध्ययन किया और पाया कि ग्लेशियर ने असामान्य रूप से अपने बहाव का रास्ता बदल दिया. इसमें भी हैरानी की बात यह रही कि शोधकर्ताओं ने पाया कि इसकी वजह जलवायु परिवर्तन और टेक्टोनिक्स दोनों ही थे.

    केवल जलवायु ही कारक नहीं
    शोधकर्ताओं का मानना है कि ग्लेशियर के असामान्य बर्ताव से पता चलता है कि केवल जलवायु ही इसके नियंत्रण का कारक नहीं है, बल्कि टेक्टोनिक्स भी इस इलाके में अपना प्रभाव दिखा रहा है. ग्लेशियर की गतिविधि में बदलाव इस इस साल 7 फरवरी को चिमोली के पहाड़ी इलाके में आपदा के पीछे की पड़ताल के नतीजों की भी पुष्टि करता है. इस हादसे में 200 से ज्यादा लोग मारे गए थे.

    कैसे हुआ था वह हादसा
    वैज्ञानिकों ने कहा था कि उस हादसे की शुरुआत छह किलोमीटर ऊंचे रोंटी पीक के शीर्ष से शुरू हुई थी. जहां एक विशाल बर्फ का टुकड़ा और चट्टान ढलान से खिसक गए थे जिससे एक विशाल भूस्खलन शुरू होकर मलबे और मिट्टी के बहाव में बदल गया था. जिससे अपने रास्ते में तबाही मचा दी थी. मलबे के बहाव से एक विशाल विस्फोट भी हुआ था जिसका असर 20 हेक्टेयर तक जंगल में हुआ था.

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    पहली बार किसी ग्लेशियर (Glacier) के बहाव बदलने पर इस तरह का अध्ययन हुआ है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    अपरदन से हुई नाजुक
    इस घटना से पता चला था कि कैसे एक ग्लेशियर पर भारी चट्टान बैठी थी जो उसकी दरारों में गुसे पानी, जमाव, बर्फ बारी, अधिक भार और धीमी गति से काम कर रही टेक्टोनिक प्लेट्स के कारण हुए अपरदन की वजह से बहुत नाजुक हो गई थी. इससे से इसकी तबाही इतनी भयावह हो गई थी. नई पड़ताल सुझाती है कि हिमालय बहुत ही सक्रिय पर्वतमाला है और बहुत ही नाजुक है जहां टेक्टोनिक्स और जलवायु बहुत नाजुक भूमिका निभाते हैं.

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    दिशा बदली और दूसरे ग्लेशियर से मिलन
    यह नया अध्ययन देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की टीम ने किया था जो जियोसाइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है. वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में  बताया है कि इस पांच किलोमीटर लंबे ग्लेशियर, जो युति युक्ति घाटी के चार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है, ने अचानक अपना प्रमुख रास्ता बदल दिया, टेक्टोनिक गतिविधि के कारण उत्तरपूर्व की ओर बहने वाला ग्लेशियर छोटा हो गया था. वह दक्षिण पूर्व की ओर बहने लगा और अंततः अपने पास के सुजुर्कचंकी ग्लेशियर से मिल गया.

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    उत्तराखंड इस साल फरवरी में आए ग्लेशयर (Glacier) की वजह से हुए हादसे के पीछे भी यही कारण थे.

    उपयोगी साबित होगा यह अध्ययन
    शोधपत्र में बताया गया है कि यह अध्ययन ग्लेशियर-टेक्टोनिक अंतरक्रिया को समझने में मददगार होगा और सही भविष्य में होने वाले अध्ययनों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी भी प्रदान करेगा. शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में सैटेलाइट की तस्वीरों, टॉपशीट और गूगल अर्थ की तस्वीरों का उपयोग किया. उन्हें पता चला कि ग्लेशियर पर सक्रिय फॉल्ट का प्रभाव है और जलवायु परिवर्तन के कारण एक सक्रिय फॉल्ट भी बना जो 250 मीटर की ऊंचाई के साथ 6.2 किलोमीटर तक उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व तक लंबाई थी.

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    भारत के विज्ञान और तकनीक मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया, “यह ग्लेशियर का बहुत विशिष्ट बर्ताव होता है और ग्लेशियर गतिकी में अभी तक इससे पहले ऐसा कोई भी अवलोकन नहीं पाया गया है. अध्ययन में बताया गया है कि जलवायु ही एक ऐसा कारक नहीं है जिससे हिमालय में ऐसे हादसे हो रहे हैं. लेकिन टेक्टोनिक्स भी ग्लेशियर के इलाको में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

    Tags: Climate Change, Himalaya, Research, Science

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