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प्रदूषण के लिए कोयला सबसे खतरनाक लेकिन भारत क्यों नहीं रह सकता इसके बगैर

प्रदूषण के लिए कोयला सबसे खतरनाक लेकिन भारत क्यों नहीं रह सकता इसके बगैर

भारत में कोयला उद्योग (Coal Industry) बहुत बड़ा है और बड़ी जनसंख्या इसपर पूरी तरह से निर्भर है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

भारत में कोयला उद्योग (Coal Industry) बहुत बड़ा है और बड़ी जनसंख्या इसपर पूरी तरह से निर्भर है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के चुनौती के दौर में भारत (India) की कोयले (Coal) पर ईंधन के रूप में निर्भरता चिंता का विषय है. भारत में विद्युत उत्पादन का करीब दो तिहाई हिस्सा कोयला विद्युत संयंत्रों से आता है. इतना ही नहीं देश की आबादी की बड़ा तबका तो कोयला उद्योग पर निर्भर है. ऐसे में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्यों को हासिल करना बहुत ही ज्यादा बड़ी चुनौती होगी क्यों भारत की अधोसंरचना अन्य साफ या अक्षय ऊर्जा स्रोतों के लिए तैयार नहीं हैं. वाबजूद इसके कि भारत में सौर ऊर्जा पर बड़े पैमाने पर कुछ जगह काम चल रहे हैं.

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    जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को रोकने के लिए जरूरी है कि जल्द से जल्द जीवाश्म ईधनों  पर निर्भरता कम की जाए. इसमें सबसेबड़ी चुनौती कोयला (Coal) का उपयोग है जो आज भी चीन और भारत जैसे देशों में विद्युत उत्पादन का प्रमुख ईंधन है.भारत (India) दुनिया में जीवाश्म ईंधनों से उत्सर्जन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है और वह कोयले पर बहुत अधिक निर्भर है. ग्लोसगो जलवायु सम्मेलन के बाद दुनिया के देशों पर जहां जीवाश्म ईंधन से मुक्त होने का दबाव बढ़ रहा है, वहीं भारत की कोयले पर निर्भरता को खत्म करना एक बहुत बड़ी चुनौती है.

    जीवाश्म ईंधन पर पश्चिम और विकासशील देश
    भारत जैसे विकासशील देशों पर जीवाश्म ईंधन की निर्भरता को खत्म करना आसान नहीं हैं. इन देशों का आरोप है कि पश्चिम ने सौकड़ों साल पहले औद्योगिक क्रांति से ही जीवाश्म ईंधनों का बेतहाशा उपयोग कर दुनिया को प्रदूषित और जब उसे कम करने की बात आई तो वे विकासशील देशों पर जिम्मेदारी थोप रहे हैं.

    भारत की निर्भरता
    पश्चिम भारत से कह रहा है कि वह कार्बन उत्सर्जन को कम करे. ऐसे में ध्यान कोयले के उपयोग को कम करने पर है. कोयला जीवाश्म ईंधन का सबसे खराब रूप है लेकिन वह भारत के ऊर्जा उत्पादन का 70 प्रतिशत भागीदार है. इतना ही नहीं भारत की अधोसंरचना भी अभी निकट भविष्य में दूसरे स्रोत पर जाने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं हैं.

    भारत में कोयला उद्योग
    ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कोयला उद्योग में करीब 40 लाख लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं. इसमें से अधिकांश कोयले की खदानें पूर्व में हैं जिसे कोयले की पट्टी कहते हैं, जो झारखंड, छत्तीसगढ़ या ओडिशा में हैं. इन क्षेत्रों में कोयला की अर्थव्यवस्था में प्रमुख योगदान है और इतना ही नहीं कोयला कुछ स्थानीय समुदायों की जीवन रेखा तक है.

    भारत (India) 70 प्रतिशत ऊर्जा आज भी कोयला विद्युत संयंत्रों से पैदा की जाती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    कई लोगों के लिए जीवन रेखा
    ओडिशा का खदानों में काम करने वाले मजदूरों के एक केंद्रीय नेता सुदर्शन मोहंती बीबीसी को बाताते हैं कि भारत कोयले के बिना नहीं जी सकता. उनकी दलील है कि कोयलने से साफ ऊर्जा स्रोतों की ओर जाने कि लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है. इसमें सबसे प्रमुख काम यह सुनिश्चित करना होगा कि कोयले पर निर्भर लोग इस बदलाव के साथ चलें, पीछे ना छूट जाएं.

    आ जाएगा बड़ा संकट
    अगर अंतरराष्ट्रीय दबाव में कोयले का उत्पादन बंद भी कर दिया जाए तो भारत में बहुत सारे लोग बेघर तक हो जाएंगे. हजारों परिवारों पर आर्थिक संकट आ जाएगा. ये लोग दशकों से खदानों में काम कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं. मोहंती का कहना है कि पेड़ लगाकर भले ही कुछ हद तक भरपाई भी हो जाए, लेकिन कोयला उत्पादन बंद करने का समझौता संभव नहीं है.

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    भारत का लक्ष्य साल 2030 तक 40 प्रतिशत बिजली (Electricity) उत्पादन साफ ऊर्जा स्रोतों से पैदा करना है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    बढ़ती जा रही है कोयले की खपत
    भारत में ऊर्जा की मांग बढ़ती ही जा रही है. पिछले दशक से कोयले की खपत दो गुनी हो गई है. अब भी भारत को बड़ी मात्रा में कोयला आयात करना पडता है और अगले कुछ सालों में कई खदानों में उत्खनन शुरू करने की योजना है. फिर भी औसत भारतीय अमेरिकन या ब्रिटिश नागरिक की तुलना में बहुत कम बिजली की खपत करता है.

    साफ ऊर्जा के लिए
    ऐसा नहीं है कि भारत साफ ऊर्जा के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहा है. साल 2030 तक उसका लक्ष्य देश की 40 प्रतिशत ऊर्जा गैर जीवाश्म ईंधन वाले विद्युत संयंत्रों सो ऊर्जा पैदा करने का  है जो इस समय केवल 25 प्रतिशत के आसपास है. दिल्ली मैट्रो  जैसे परियोजनाएं 60 प्रतिशत सौर ऊर्जा से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं.

    Tags: Climate Change, Environment, Research, Science

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