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Climate Change के कारण पृथ्वी के ‘जरूरी संकेत’ होते जा रहे हैं और भी खराब

हाल ही में पृथ्वी पर (Earth) हो रही विनाशकारी घटनाओं ने वैज्ञानिकों को ऐसी चेतावनी देने पर मजबूर कर दिया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

हाल ही में पृथ्वी पर (Earth) हो रही विनाशकारी घटनाओं ने वैज्ञानिकों को ऐसी चेतावनी देने पर मजबूर कर दिया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

Climate Change: वैज्ञानिकों ने पृथ्वी (Earth) के जलवायु संबंधी जरूरी संकेतों (Vital Signs) का अध्ययन कर पाया है कि दुनिया के जल्दी बहुत गंभीर नतीजे देखने को मिलेगें

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    पृथ्वी (Earth) पर ऐसे बहुत से संकेत हैं जो हमारे नीले ग्रह की सेहत की स्थिति को बताते हैं. वैज्ञानिकों ने इस सप्ताह यह ऐलान किया है कि ये ‘जरूरी संकेत’ (Vital Signs) खराब हो रहे हैं और अब हालात ये हैं कि वे अब बहुत तेज दर से खराब होते जा रहे हैं. यूं तो जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के दुष्परिणाम हमें देखने को मिलने ही लगें हैं. और भविष्य में और भी बुरे हालात की आशंका पिछले कुछ समय से जताई ही जा रही है, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इन संकेतों के आधार पर अब जलवायु परिवर्तन के गंभीर असर बहुत जल्दी ही देखने को मिलने लगेंगे.

    बुधवार को ही एक अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने वाले 14 हजार पेशेवर विशेषज्ञों ने हालिया घटनाओं को जलवायु आपातकाल करार दिया है. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया है कि दुनिया भर की सरकारों इस आपदा को पर्याप्त रूप से स्वीकार करने में पूरी तरह से नाकामी दिखाई है.

    दो साल पहले भी हुआ था ऐसा आंकलन
    वैज्ञानिकों ने इस तरह के आंकलन साल 2019 में भी किया था जब उन्होंने पाया था कि जलवायु संबंधी विनाशकारी घटनाओं में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है. इन हालातों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण एशिया में बाढ़, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के जंगलों में आग और अफ्रीका और दक्षिण एशिया में तूफान प्रमुख रूप से शामिल हैं.

    क्या हैं ये जरूरी संकेत
    वैज्ञानिकों की चेतावनी के पीछे उनके द्वारा की गई जरूरी संकेतों की पड़ताल है. ये जरूरी संकेत मुख्य मैट्रिक सिस्टम के ऐसे मापन हैं जिसमें ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन, ग्लेशियरों की मोटाई, समुद्री बर्फ की तादात, और वनों की कटाई शामिल है. वैज्ञानिकों ने पाया है कि इन मानदंडों में से 18 ने या तो सर्वाधिक का या फिर न्यूनतम का रिकॉर्ड तोड़ा है.

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    इन संकेतों में दुनिया भर में बर्फ की चादरों और ग्लेशियरों (Glaciers) का पिघलना प्रमुख है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    2021 में टूटा रिकॉर्ड
    शोधकर्ताओं ने उदाहरण देते हुए इस बात का विशेष उल्लेख किया कि कोविड-19 महामारी के दौरान प्रदूषण तो कम हो गया था, जिसके प्रभाव को भी उन्होंने अपने आंकलन में शामिल किया था, लेकिन जैसे ही दुनिया के देशों ने औद्योगिक गतिविधियां फिर से शुरू हुईं, वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन के स्तरों साल 2021 में सर्वोच्च का रिकॉर्ड तोड़ दिया.

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    यहां के भी टूटे रिकॉर्ड
    वैज्ञानिकों ने ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में बर्फकी मात्रा अब तक की सबसे कम स्तर की आंकी गई. उन्होंने यह भी पाया की फिलहाल ग्लेशियर अपने 15 पहले की पिघलने की दर से 31 प्रतिशत ज्यादा तेजी से  पिघल रहे हैं. इसी तरह महासागरों की गर्मी और वैश्विक जलस्तरों ने बी 2019 से नए रिकॉर्ड बनाने शुरू कर दिए हैं.

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    दुनिया के जंगलों की कटाई (Deforestation) भी इंसानों की ऐसे गतिविधि है जिसका जलवायु पर सीधा असर हो रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    इंसान ने की हदें पार
    साल 2020 में ब्राजील के अमेजन के वर्षावनों का वार्षिक नुकसान ने 12 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया. यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सटर के ग्लोबल सिस्टम इंस्टीट्यूट ने किया है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इस बात का बड़ा प्रमाण है कि इंसानों ने बहुत से जलवायु शीर्ष  बिंदुओं को पार किया है जिसमें ग्रीनलैंड और पश्चिमी अंटार्कटिका की  पिघलती बर्फ प्रमुख है.

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    इसमें सबसे चिंताजनक बाद यह है कि बहुत से मामलों में अब पुरानी स्थितियों में लौटना असंभव है तो वहीं कुछ मामलों में पुरानी स्थतियों में लौटने में सदियां लग जाएंगी. वैज्ञानिकों ने पाया है कि ऐसे हालात में इंसान अगर हानिकारक उत्सर्जन को कम भी कर लें तो भी यही पुरानी अवस्थाओं में लौटना नामुमकिन ही है.

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