2.3 करोड़ सालों में सबसे ज्यादा CO2 का स्तर है आज, जानिए क्या है इसका मतलब

2.3 करोड़ सालों में सबसे ज्यादा CO2 का स्तर है आज, जानिए क्या है इसका मतलब
कार्बन उत्सर्जन के आज के स्तर पिछले 2.3 करोड़ सालों में सबसे ज्यादा हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

ताजा शोध से पता चला है कि आज पृथ्वी (Earth) पर जो कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का स्तर है. वह पिछले 2.3 करोड़ सालों में सबसे ज्यादा है.

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नई दिल्ली:  इन दिनों जब भी हमारे पर्यावरण की बात होती है तो कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission) का जिक्र जरूर होता है.  मानवीय गतिविधियों के कारण हमारे वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon dioxide) की मात्रा इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि पूरी पृथ्वी की ही औसत तापमान बढ़ने लगा है. वैज्ञानिक भविष्यवाणी करने लगे हैं कि पृथ्वी पर इंसान के लिए जीने के हालात प्रतिकूल होते जाएंगे. ताजा शोध से पता चला है कि पृथ्वी पर जितना ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा है, उतनी ज्यादा तो पिछले 2.3 करोड़ साल पहले भी नहीं थीं.

पता चली हैं खास बातें
शोधकर्ताओं का कहना है कि आज जो कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर हैं वे मानवीय गतिविधियों के कारण हैं इस तरह के उतार चढ़ाव इससे पहले पृथ्वी के इतिहास में कभी नहीं हुए . अमेरिका के लेफायेट स्थित लोउइसियाना यूनिवर्सिटी के एक टीम ने नई कार्बन मापन तकनीक का प्रयोग कर वायुमंजल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में बदलाव का अध्ययन किया है.

क्या मिल रहा है अध्ययन से संदेश
शोधकर्ताओं का कहना है कि अध्ययन से साफ संदेश मिल रहा है कि आज जो हमारे वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर है. एक करोड़ साल पहले के स्तर से भी ज्यादा है. लोगों के इसे गंभीरता से लेना चाहिए. उनका कहना है कि नए अध्ययन से पता चला है कि आज का कार्बन डाइऑक्साइड स्तर पिछले 2.3 करोड़ साल में सबसे अधिक है.



Carbon emission
इससमय पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकासन कार्बन उत्सर्जन से हो रहा है.


इससे पहले यह तकनीक अपनाई जाती थी
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि कार्बन डाइऑक्साइड में जरा भी बदलाव हमारे पर्यावरण पर प्रभावी असर डालता रहा है. अब तक वैज्ञानिक बर्फ के अंदर से लिए गए नमूनों का अध्ययन कर कार्बन डाइऑक्साइट के स्तरों का पता लगाया करते थे. इससे  उन्होंने करोड़ों साल रहले तक के भी स्तर निकाले थे.

इस बार अपनाया दूसरा तरीका
लेकिन अब वैज्ञानिकों ने नया तरीका अपनाया. इस बार उन्होंने उन्होंने पौधों के जीवाश्म में दो स्थाई कार्बन आइसोटोप की तुलनात्मक मात्रा को नापा. इससे उन्हें उस समय के कार्बन के स्तरों का पता चला जब ये पौधे बने थे. इस आधार पर उन्होंने नई टाइम लाइन बनाई और पाया कि इससे पहले कार्बन डाइऑक्साइड के स्तरों में इतिहास में कभी उतना उतार चढ़ाव नहीं रहा जितना का आज पाया जा रहा है.

तो क्या है आज  की स्थितियों में विशेष बात
शोधकर्ताओं ने पाया है कि आज के जलवायु परिवर्तन में अचानक बदलाव पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास में विलक्षण हैं. इस पर समय रहते ध्यान दने की जरूरत है. जियोलॉजी में प्रकाशित इस शोध में दर्शाया गया है कि पारिस्थितिकी तंत्र और तापमान कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं.

global warming,
ग्लोबल वार्मिंक का इकोलॉजी पर सबसे ज्यादा असर हुआ है.


इससे पहले भी हुई थी ग्लोबल वार्मिंग लेकिन
आज के युग में हो रहे ग्लोबल वार्मिंग की तुलना प्लियोसीन युग के मध्य (30से 50 लाख साल पूर्व) और  मियोसिन युग के मध्य  (1.5 से 1.7 करोड़ साल पूर्व) की ग्लोबल वार्मिंग से होती है.  लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि उस समय में भी कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा ज्यादा नहीं बढ़ी थी.

इस अध्ययन से सबसे अहम बात जो सामने आई है कि यह अब तक का सबसे अलग तरह का जलवायु परिवर्तन है.  इसका कारण पहले बार प्राकृतिक न होकर मानवीय है. इसके अलावा यह भी जाहिर हो गया है कि पृथ्वी पर हमारी निर्भरता बहुत ही ज्यादा है और पृथ्वी में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तरों के बदलावों को लेकर बहुत संवेदनशील है. इसी लिए हमें इस मामले में जल्दी ही कुछ करना होगा नहीं हालात बदतर होते जाएंगे.

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