वो लाइब्रेरी, जहां से जिंदा वायरस, फफूंद और बैक्टीरिया आयात-निर्यात होते हैं

दुनिया की सबसे पुरानी लाइब्रेरी, जहां जिंदा और जानलेवा बैक्टीरिया रखे जाते हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)

दुनिया की सबसे पुरानी लाइब्रेरी, जहां जिंदा और जानलेवा बैक्टीरिया रखे जाते हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)

ब्रिटेन में तकरीबन 105 साल पुरानी लाइब्रेरी नेशनल कलेक्शन ऑफ टाइप कल्चर्स (National Collection of Type Cultures) पहली ऐसी जगह है, जहां हजारों जानलेवा जर्म्स का संग्रह (collection of germs) है. दुनिया के किसी भी कोने में मिलने वाले अज्ञात जर्म्स यहीं भेजे जाते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 29, 2021, 10:18 AM IST
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साल 1915 की सर्दियों में फ्रांस के Stationary Hospital में एक टेलीग्राम आया. उसमें लिखा था कि ब्रिटिश सैनिकों की तबियत लगातार खराब हो रही है. बता दें कि तब पहले विश्वयुद्ध की शुरुआत हो चुकी थी और सैनिक खंदकों में खराब हालातों में कई-कई दिन बिताने को मजबूर थे. डॉक्टरों ने जांच में एक बैक्टीरिया को सैनिकों की हालत के लिए जिम्मेदार माना. उस बैक्टीरिया को Shigella flexneri नाम दिया गया.

इस तरह से बना पहला सैंपल

सेना में अफसर और बैक्टीरियोलॉजिस्ट Lt. William Broughton-Alcock ने इसका पता लगाया था. बैक्टीरिया को कांच के मर्तबान में एक खास तरह की लकड़ी अगारवुड (अगरू) डालकर और ऊपर से पैराफिन वैक्स से सील करके रख दिया गया. ये पहला सैंपल था. इसके बाद से अब तक दुनिया की सबसे पुरानी लाइब्रेरी, जहां जिंदा और जानलेवा बैक्टीरिया रखे जाते हैं, में 6000 से ज्यादा बैक्टीरिया रखे जा चुके हैं.

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कुल 9000 स्पीशीज 

यहां रखे बैक्टीरिया इतने घातक हैं कि वे तगड़े से तगड़े व्यक्ति को बीमार बना सकते हैं और यहां तक कि मौत भी दे सकते हैं. यहां बैक्टीरिया के जीवित स्ट्रेन को रखा गया है. बता दें कि स्ट्रेन किसी स्पीशीज का जेनेटिक स्ट्रक्चर होता है, जो RNA या DNA के फॉर्म में होता है. ये 6000 बैक्टीरिया में से एक कई फैमली हैं तो कई एक-दूसरे से एकदम अलग हैं. इस तरह से कुल 9000 स्पीशीज हैं. वैसे यहां कुछ वायरस और फफूंद के सैंपल भी हैं लेकिन बैक्टीरिया पर यहां मुख्य काम होता है.

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यहां रखे बैक्टीरिया इतने घातक हैं कि वे तगड़े से तगड़े व्यक्ति को बीमार बना सकते हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)




इस लाइब्रेरी को बनाने का एक खास मकसद है

दुनिया में जितने लोग वायरस के हमले में नहीं मरते, उससे कहीं ज्यादा हर साल बैक्टीरिया के कारण होने वाली अलग-अलग बीमारियों में मारे जाते हैं. एक और समस्या ये है कि शरीर पर बैक्टीरिया का हमला होने पर उसे कमजोर करने के लिए जो एंटीबायोटिक दी जाती है, धीरे-धीरे वे बैक्टीरिया पर असर करना कम करते जाते हैं और दवा का डोज बढ़ते-बढ़ते बेअसर रह जाता है. इसे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस कहते हैं.

इन्हीं मुश्किलों को देखते हुए लाइब्रेरी बनाई गई. यहां बैक्टीरिया का स्ट्रेन तैयार करके सारी जानकारी जुटाई जाती है और जब भी दुनिया के किसी भी देश में वैज्ञानिकों को इस बारे में कोई जानकारी चाहिए हो, तो यहां से मिल पाती है.

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साल 1915 का सैंपल अब तक है जिंदा

मिसाल के लिए जिस बैक्टीरिया Shigella flexneri का सैंपल साल 1915 में लिया गया था, वो अब भी एक्टिव है. हर साल इसी बैक्टीरिया की वजह से डायरिया होने पर 164000 बच्चों की मौत हो जाती है. इस लाइब्रेरी में रखे जीनोम सीक्वेंस से इसी फैमली के नए आ रहे बैक्टीरिया से तुलना की गई तो पता चला कि बैक्टीरिया का स्ट्रक्चर धीरे-धीरे बदल रहा है. ये जानने के बाद इसी के मुताबिक नई दवा बनाई जाती है या पुरानी दवा में बदलाव होते हैं.

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जिस बैक्टीरिया Shigella flexneri का सैंपल साल 1915 में लिया गया था, वो अब भी एक्टिव है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


आयात-निर्यात भी होता है

कई बार लाइब्रेरी से जिंदा बैक्टीरिया के स्ट्रेन दूसरे देशों में भेजे जाते हैं ताकि स्टडी की जा सके. एक से दूसरे देश तक ट्रांसपोर्ट के दौरान बैक्टीरिया को काफी एहतियात से ले जाना होता है वरना इससे संक्रमण का खतरा रहता है. इसके लिए बैक्टीरिया को कांच के जार में अगरू के साथ डालकर ऊपर से पैराफिन की मोटी परत चढ़ाई जाती है. इसके बाद इसे कई बॉक्सेज में बंद करते हैं. ये काफी सुरक्षा के साथ भेजा जाता है.

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अलग-अलग स्तर के हैं खांचे 

बैक्टीरिया के जीवित होने के कारण यहां कई सेफ्टी प्रोटोकॉल भी हैं, जो यहां के वैज्ञानिकों को मानना होता है. वैसे ज्यादातर बैक्टीरिया यहां बायोसेफ्टी लेवल 2 और 3 पर हैं. इसका मतलब इनसे संक्रमण पर मरीज की हालत गंभीर हो सकती है लेकिन इनका इलाज खोजा जा चुका है. बायोसेफ्टी लेवल 4, जिसके तहत लाइलाज जर्म्स आते हैं, उसमें यहां सिर्फ वायरस ही रखे गए हैं.

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जर्म्स के जीवित होने के कारण यहां कई सेफ्टी प्रोटोकॉल भी हैं -सांकेतिक फोटो (pixabay)


हर साल सैंपल भेजे जा रहे 

लाइब्रेरी में हर साल के साथ बैक्टीरिया सैंपल बढ़ रहे हैं. यहां साल में 50 से लेकर 200 तक सैंपल पहुंचते हैं. ये अलग-अलग संस्थानों या वैज्ञानिकों से भी आते हैं. जैसे कोई वैज्ञानिक बुजुर्ग हो चुका है और अब काम नहीं कर पाता तो वो अपना बैक्टीरिया या वायरस का सैंपल इस लाइब्रेरी को दे देगा ताकि उसपर काम चलता रहे.

इस तरह होता है स्टोर 

नए आने वाले बैक्टीरिया को तुरंत लाइब्रेरी में नहीं रखा जाता, बल्कि इसकी एक प्रक्रिया होती है. इसे अगार पर कल्चर किया जाता है ताकि पता चल सके कि इसमें कोई दूसरा संक्रमण नहीं है. इसके बाद इसे बायोलॉजिक टिशू की रक्षा करने वाले तत्व cryoprotectant में डालकर 3 से 4 घंटे से लिए -28 डिग्री तापमान पर रखते हैं. इसके बाद इसे स्टोर किया जाता है. हालांकि सारे बैक्टीरिया सर्वाइव नहीं कर पाते और बहुत से नष्ट हो जाते हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी खबर में लाइब्रेरी की मुख्य वैज्ञानिक सारा एलेक्जेंडर कहती हैं कि आज से 50 साल पहले स्ट्रेन के साथ हाथ से लिखा कोई पर्चा आता था, जिसमें बैक्टीरिया कहां मिला जैसी सबसे बेसिक जानकारी आती थी. अब ये ये पूरे जीनोम सीक्वेंस के साथ भेजा जाने लगा है.
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