जानिए कितने उपयोगी हैं Colloidal diamonds जिन्हें विकसित करने में लग गए 30 साल

हीरे (Diamond) की आकार की कोलाइडल संचरना (Colloidal structure) बना पाना शोधकर्ताओं के लिए बड़ी उपलब्धि है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
हीरे (Diamond) की आकार की कोलाइडल संचरना (Colloidal structure) बना पाना शोधकर्ताओं के लिए बड़ी उपलब्धि है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

वैज्ञानिकों ने लंबे समय के बाद कोलाइडल डायमंड (Colloidal diamonds) की संरचना (Structure) विकसित करने में सफलता पाई जिसका ऑप्टिकल कम्प्यूटर्स, लेजर्स जैसे कई तकनीकों में बहुत व्यापक उपयोग हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 27, 2020, 6:48 AM IST
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वैसे तो हीरा (Diamond) अपनी खूबसूरती कारण दुनिया भर के लोगों का ध्यान खींचता रहते है.  लेकिन वैज्ञानिकों की तीस साल से के हीरे का आकार (Diamond structure) विकसित करने में विशेष दिलचस्पी रही है. यह है कोलाइडल हीरों का निर्माण. 1990 से किए जा रहे प्रयासों को आखिरकार इस साल सफलता मिल गई. शोधकर्ताओं ने कोलाइड्स में ही हीरे की ऐसी संरचना बनाई जो स्थायी है और इसका ऑप्टिकल कम्प्यूटर्स, लेजर्स और फिल्टर्स के क्षेत्र में क्रांतिकारी उपयोग हो सकता है.

क्या होते हैं कोलाइड्स
कोलाइड्स एक तरह के मिश्रण होते हैं जिसमें कण तरल पदार्थ में बीच में बने रहते हैं वे न तो तल पर जा पाते हैं और न ही सतह पर पहुंच पाते हैं. लेकिन ये सॉल्यूशन की तरह घुलते भी नहीं हैं और दो अलग अवस्थाओं (Phases) में होते हैं. कुछ मामलों में कण बहुत से क्रस्टल संरचना  से जुड़ जाते हैं.  जिसका उपयोग ऑपट्कल उपकरणों में किया जा सकता है.

कोलाइड्स में संरचनाओं का निर्माण
इन कोलाइड्स हर कण से जुड़े डीएनए तंतुओं से कड़ी बना लेते हैं. जब ये पदार्थ तरल में तैर रहे होते हैं डीएनए खास तरीकों से इन कणों को पकड़ता है जिससे एक विशेष संरचना बन जाती है. कण डीएनए में कहां जुड़ता है इसमें बदलाव करने से कई तरह की संरचनाएं बनाई जा सकती हैं से कि कोलाइड क्यूब्स, स्ट्रिंग्स और पिरामिड वगैरह, लेकिन हीरे की संचरना नहीं बन पा रही थी.



तो कैसे बनी हीरे की संरचना
शोधकर्ताओं ने एक फोटोनिक तकनीक विकसित की  जिससे कोलाइड्स में हीरे की संरचना अपने आप गई. इसके लिए पहले शोधकर्ताओं ने पिरामिड की संचरना बनाई और बिखरे रूप में इन पिरामिड्स को आपस में जुड़ने की स्थिति में ला दिया जिससे हीरे का आकार बनता गया.  तरल पदार्थ हटाने के बाद यह संरचना कायम रही है और शोधकर्ताओं को सफलता मिल गई. तरल हटने के बाद ही  यह संरचना उपयोग की स्थिति में आ सकती थी.

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इस अध्ययन में शोधकर्ताओं के पास नौनोतकनीक (Nanotechnology) के स्तर जाने का विकल्प था, लेकिन उसके बिना ही उन्होंने कारगर समाधान निकाल लिया. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


कम्प्यूटर के क्षेत्र में बहुत उपयोगी
इस तकनीक से इस तरह की संरचनाओं का सस्ता और बड़े पैमाने पर निर्माण हो सकता है. ऐसी संरचनाएं स्थाई होती है औह इनका छोटे स्तर पर स्वतः निर्माण हो सकता है. इनमें प्रकाश की तरंगों का वैसे ही उपयोग हो सकता है जैसा कि कम्प्यूटिंग में इलेक्ट्रॉन का उपयोग होता. यह तकनीक बहुत ही उपयोगी मानी जा रही है.

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किसने विकसित की तकनीक
शोधकर्ता दशकों से कोलाइड्स और उनके संभावित संरचनाओं के निर्माण का अध्ययन कर रहे थे. न्यूयार्क यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर और NYU मे टंडन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग में कैमिकल और बायोकैमिकल इंजिनियरिंग के प्रोफेसर डेविड पाइन की अगुआई में वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस नई तकनीक को विकसित किया है.

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यह तकनीक (Technique) ऑप्टिकल कम्प्यूटर्स (Optical computers) जैसे क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


इन क्षेत्रों में भी उपयोग
नेचर में प्रकाशित यह नई तकनीक बहुत सारी संभावनाएं खोल सकती है जिसमें प्रभावी ऑप्टिकल सर्किट्स जिससे ऑप्टिक कम्प्यूटर्स और लेसर्स में उन्नति हो सकती है, प्रमुख है. इसके अलावा विश्वस्नीय और सस्ते प्रकाश फिल्टर्स का उत्पादन भी ऐसा ही क्षेत्र है जहां यह तकनीक बहुत उपयोगी हो सकती है.

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पाइन का कहना है, “इंजीनियरों में इस तरह का हीरे का आकार बनाने की बड़ी इच्छा थी. ज्यादातर शोधकर्ताओं ने हार  मान ली थी, लेकिन हम शायद केवल ऐसे समूह थे जो इस पर अब भी काम कर रहा था. इसीलिए मुझे लगता है कि शोध का प्रकाशित होना बहुत से लोगों के हैरानी भरा रहा.”
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