World Water Day : पानी क्या होना चाहिए, कमोडिटी या सबका हक?

पानी की बोतलों के बाज़ार से प्लास्टिक को बढ़ावा मिलता है, जो पर्यावरण के लिए खतरनाक है.

पानी की बोतलों के बाज़ार से प्लास्टिक को बढ़ावा मिलता है, जो पर्यावरण के लिए खतरनाक है.

20वीं सदी में सबसे अहम मोड़ था कि पानी बड़े पैमाने पर बिकने (Water Market) लगा. हम पीने का पानी खरीदते वक्त क्या सोच पाते हैं कि कुदरत की देन है, हर इंसान की बुनियादी ज़रूरत, जिसे मुनाफ़े की इंडस्ट्री (Water Industry) बना दिया गया?

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 22, 2021, 8:03 AM IST
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करीब सवा दो अरब लोगों की आबादी को दुनिया भर में सुरक्षित या सेहतमंद पानी (Safe Drinking Water) नसीब नहीं है. पानी के बारे में हर तरह की जागरूकता लाने के मकसद से संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के तहत 1993 से विश्व जल दिवस हर साल 22 मार्च को मनाया जाता है. 2021 में इसकी थीम रखी गई है 'Valuing Water' यानी 'पानी का मूल्यांकन'. पानी को हम अनमोल कहते आए हैं इसलिए ज़ाहिर है कि पानी की कीमत इस थीम (Water Day Theme) का आशय नहीं है. तो क्या पानी की कीमत को लेकर कोई बहस की जा सकती है?

सबसे पहले तो यही समझना चाहिए कि पानी के मूल्य का मतलब किसी बोतल पर लिखी उसकी कीमत ही नहीं है बल्कि हमारे घरों, भोजन, संस्कृति, स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण में उसका महत्व ही पानी का वास्तविक मूल्य माना जाना चाहिए. इसी थीम से इस बहस तक पहुंचा जा सकता है कि पानी को किसी वस्तु या प्रोडक्ट की तरह ट्रीट किया जाए या नहीं!

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क्या है यह बहस?
पानी को लेकर दुनिया भर में एक मुहिम छिड़ी हुई है कि पानी को बेचने की चीज़ न बनाकर मूलभूत मानवाधिकार माना जाना चाहिए. हर व्यक्ति को हक है कि उस तक सुरक्षित पानी पहुंचे इसलिए इस मुहिम के पक्ष में कई तरह ​की विश्व स्तरीय संस्थाएं बनी हैं. ऐसी हा एक आंदोलन है फर्स्ट नेशन्स, जो पानी की पहुंच सब तक होने का मुद्दा खड़ा करता है.

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दुनिया में अरबों लोग पीने लायक पानी से वंचित हैं.


पिछले ही महीने एक ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि दुनिया के 41 देश ऐसे हैं, जहां लोगों तक पीने लायक पानी नहीं पहुंच पा रहा. बदतर हालत तो यह है कि इन तक पानी पहुंचाने के लिए कोई योजना तक नहीं है. हाल में, फर्स्ट नेशन्स ने कहा था कि 2019 में 2021 तक इन देशों में पीने लायक पानी पहुंचाने का वादा किया गया था, लेकिन कोविड 19 के चलते इस लक्ष्य को हासिल करने में देर हो रही है.



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प्राइवेटाइज़ेशन से क्या संकट खड़ा हुआ?

कनाडा जैसे दुनिया के कुछ और देश हैं, जां पानी और सीवर सिस्टम का निजीकरण कर दिया गया है. इसका मतलब यही है कि मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता से मुनाफा कमाए जाने की कवायद हो रही है. कनाडा की सबसे बड़ी श्रम संस्था NUPGE की मानें तो चिंता की बात यह है कि पानी के निजीकरण वाले सिस्टम को सरकारें सपोर्ट करती हैं और मुनाफे का एक हिस्सा सरकारों तक भी पहुंचता है.

क्या है पानी का धंधा?

एक सच यह है कि दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में पानी के मार्केट के भविष्य को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है, लेकिन एक सच यह भी है कि दुनिया के ज़्यादातर हिस्से में पानी बिकने वाली एक कमोडिटी है. पानी की कीमत कैसे तय होती है, इसे समझने के लिए कुछ पहलुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है.

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नेटवर्क18 की मुहिम से आप भी जुड़िए.


1. क्लाइमेट : ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में जहां सूखाग्रस्त इलाके ज़्यादा हैं, वहां पानी की डिमांड बेहद बढ़ जाती है, हालांकि बारिश के समय में डिमांड घटती है. इसी तरह रेगिस्तानी देशों में पानी की डिमांड बनी रहती है. पानी की कीमत तय करने में यह डिमांड बड़ा फैक्टर है.

2. कृषि : पानी की खपत वाला सबसे बड़ा सेक्टर कृषि और पशुपालन है. इस सेक्टर की क्षमता और स्थिति से पानी की कीमतें निर्धारित की जाती हैं.

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3. बिजली की मांग और उत्पादन के बीच पानी बहुत अहम कड़ी है. बारीकी से समझें तो पानी अर्थव्यवस्था की जान नज़र आने लगता है. पानी के उद्योग में जितना पैसा घूम रहा है, वो कई तरह के धंधों और शेयरों में लग रहा है.

इनके अलावा, कई तरह के धंधों का सीधा असर पानी की कीमतों पर पड़ता है. उद्योगों के लिए भी पानी की डिमांड बनी रहती है, जिससे पानी कमोडिटी बन जाता है. उद्योगों या सेक्टर विशेष के लिए पानी संबंधी जो नीतियां बनती हैं, वही आम आदमी पर थोप दी जाती हैं और पानी का एक बड़ा बाज़ार बन जाता है.

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पानी को बचाना हर नागरिक का कर्तव्य है.


क्या कोई उम्मीद की किरण है?

दुनिया में कई तरह की संस्थाएं पानी को मानवाधिकार का दर्जा देकर निशुल्क मुहैया करवाए जाने के मुद्दे पर लड़ रही हैं. यह भी एक अच्छी खबर है कि लोगों तक पानी के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ रही है. वहीं, कनाडा जैसी जगहों पर पानी के निजीकरण का विरोध के परिणाम दिख रहे हैं कि सरकार पानी के प्राइवेटाइज़ेशन पर किसी हद तक रोक लगा रही है.

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इस पूरी बहस में दो अहम बातें हाथ लग रही हैं. एक, पीने का पानी हर इंसान का बुनियादी हक माना जाए, इसके लिए हर इंसान को लड़ना होगा. और दूसरा, पीने के पानी को बचाना, सहेजना और उपलब्धता बनी रहे, इसके लिए जागरूक होना ज़रूरी है.
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