क्या है जापान का वो मार्शल आर्ट, जिसके एक्सपर्ट हैं राहुल गांधी?

राहुल गांधी जापानी मार्शल आर्ट के एक रूप अकिदो के जानकार माने जाते हैं (Photo- twitter )

राहुल गांधी जापानी मार्शल आर्ट के एक रूप अकिदो के जानकार माने जाते हैं (Photo- twitter )

Rahul Gandhi Teaches Aikido: कांग्रेस के नेता राहुल गांधी जापानी मार्शल आर्ट के एक रूप अकिदो के जानकार माने जाते हैं. ये आक्रामकता की बजाए मन की शांति के लिए होता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 23, 2021, 5:48 PM IST
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विपक्ष के नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi in Kerala) इन दिनों केरल में चुनाव के सिलसिले में प्रचार में लगे हैं. इसी दौरान उन्होंने कोच्चि के एक कॉलेज में स्टूडेंट्स को जापानी मार्शल आर्ट के चुनिंदा पैंतरे सिखाए. इससे पहले भी वे एक स्कूल में इस कला का कौशल दिखा चुके हैं. इस कला को अकिदो कहते हैं, जिसका हुनर कई बार पहले भी राहुल गांधी दिखा चुके हैं. तो क्या है ये मार्शल आर्ट और कैसे सेल्फ डिफेंस सिखाता है, जानिए

आक्रामकता की बजाए ये है मकसद

अकिदो मार्शल आर्ट का वो रूप है, जिसमें आक्रामकता से ज्यादा मन को शांत रखने पर जोर दिया जाता है. यही कारण है कि ये हमले से ज्यादा सेल्फ डिफेंस यानी आत्मरक्षा सिखाने वाली कला है. अकिदो में इसलिए ही इसका खास ध्यान रखा जाता है कि सामने वाले को गंभीर चोट न आए. राहुल गांधी इस मार्शल आर्ट में ब्लैक बेल्ट कहलाते हैं.


चार साल पहले तस्वीरें वायरल हुईं

साल 2017 में राहुल गांधी की अकिदो के पैंतरों के साथ कई तस्वीरें वायरल हुई थीं. तब उनके ट्रेनर सेंसई परितोष कर हुआ करते थे. उन्होंने ही कहा था कि राहुल को इस कला में खासी दिलचस्पी है और वे इसके पहले लेवल पर ब्लैक बेल्ट हैं. साथ ही ट्रेनर ने ये भी बताया था कि अकिदो में 9 लेवल होते हैं और हर लेवल पर ब्लैक बेल्ट होता है.

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सेल्फ डिफेंस सिखाने वाला ये मार्शल आर्ट ज्यादा पुराना नहीं

बीसवीं सदी में जापान के एक शख्स Morihei Ueshiba ने इस आर्ट फॉर्म की शुरुआत की थी. वैसे जापान में तब चल रहे ज्यादातर मार्शल आर्ट आक्रामक तौर-तरीकों वाले थे, जिसके बीच अकिदो एकदम अलग लगता था. खुद इसके संस्थापक मोरिहेई ने इसे मन की शांति के लिए तैयार किया था.

काफी प्राचीन भी कहा जाता है

वैसे अकिदो की शुरुआत के बारे में कई जगह अलग-अलग बातें कही गई हैं. जैसे ब्रिटानिका में कहा गया है कि इस मार्शल आर्ट की शुरुआत 14वीं सदी में हो चुकी थी, हालांकि इसे एक सूत्र में पिरोकर सामने लाने का काम 20वीं सदी में ही हुआ.

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अकिदो में आक्रामकता से ज्यादा मन को शांत रखने पर जोर दिया जाता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


इसमें प्रतियोगिता नहीं होती

जहां दूसरे मार्शल आर्ट्स में प्रतियोगिता होती रहती है, अकिदो में कोई चैंपियनशिप नहीं होती. अकिदो में विरोधी की कभी भी हत्या करने की सीख नहीं दी जाती है, चाहे हालात कितने ही खराब क्यों न हों. यानी अगर कोई हमला करे तो बस अकिदो के जरिए उसे इतना चोटिल कर दो कि वो अगले कुछ देर तक दोबारा हमला न करे. यही इस मार्शल आर्ट का मकसद होता है.

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हथियारों का उपयोग नहीं

अकिदो में विरोधी को हराने के लिए केवल हाथ-पैरों का इस्तेमाल होता है, और इसमें किसी तरह का दूसरा हथियार नहीं होता है. हालांकि मोरिहेई से ही अकिदो सीखने वाले एक जापानी छात्र तोमिकि केंजि ने इसमें कुछ और शैलियां जोड़ीं, जिसमें रबर या लकड़ी के चाकू का इस्तेमाल भी होता है. लेकिन इसमें भी सख्त नियम है कि विरोधी को गंभीर चोट न आए. अकिदो की इस शैली को तोमिकि अकिदो कहते हैं. अगर हमलावर या विरोधी के हाथ में हथियार हो तो इसी तरीके से उसे निःशस्त्र किया जाता है.

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चीन भी मार्शल आर्ट के मामले में जापान को प्रतियोगिता देता रहा है- सांकेतिक फोटो (flickr)


चीन भी काफी आगे 

जापान में तो मार्शल आर्ट के विभिन्न रूप हैं ही, लेकिन साथ ही चीन भी इस मामले में जापान को प्रतियोगिता देता रहा है. चीन में मार्शल आर्ट का सबसे पहला जिक्र लगभग 4000 साल पहले शिआ राजवंश के दौरान मिलता है. तब शाही सेना के लिए हाथ से लड़ाई की प्रैक्टिस काफी जरूरी मानी जाती थी. इसी दौरान मार्शल आर्ट की खोज हुई मानी जाती है. इनमें कुंग-फू काफी लोकप्रिय है. इस कला को भारतीय बौद्ध भिक्षु बोधिधर्मन ने किया था. सैकड़ों सालो तक यह युद्ध कला चीनी बौद्ध मठों में सिखाई जाती रही और ‘शाओलिन टेम्पल’ इस विद्या का केंद्र रहा.

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देश में कलरी मार्शल आर्ट केरल से है 

भारत में भी मार्शल आर्ट की कला कलरी या कलरीपायट्टु काफी लोकप्रिय है. केरल से आई इस विद्या को दुनिया के 10 सबसे खतरनाक मार्शल आर्ट्स में शुमार किया जाता है. भारतीय बौद्ध भिक्षु और कलारी मास्टर बोधिधर्मन ने ही चीन जाकर कुंग फू को जन्म दिया. कलारी का अर्थ होता है युद्ध का मैदान और इसीलिए इस मार्शल आर्ट के बारे में यह कहा जाता है कि ये किसी भी स्थिति में खेल नहीं है, बल्कि गंभीर युद्ध कला है जो सिर्फ जीत और जीत के लिए बनी है.
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