Opinion: कश्मीर पर कांग्रेस को लेनी चाहिए नेहरू-शेख की दोस्ती से सीख

कांग्रेस को ये साफ-साफ बताना चाहिए कि कश्मीर पर उसकी नीति अब क्या है और वह इस मामले में किस तरह राष्ट्रहित को ऊपर रखती है.

News18Hindi
Updated: August 6, 2019, 3:36 PM IST
Opinion: कश्मीर पर कांग्रेस को लेनी चाहिए नेहरू-शेख की दोस्ती से सीख
कश्मीर पर नेहरू और इंदिरा दोनों ने राष्ट्रहित को हमेशा ऊपर रखा
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Updated: August 6, 2019, 3:36 PM IST
रशीद किदवई

जम्मू-कश्मीर से जुड़े आर्टिकल 370 पर हुए नाटकीय घटनाक्रम पर कांग्रेस को व्यावहारिक रुख अपनाने की जरूरत है, जिसमें देश हित सबसे ऊपर रहे. विरोधाभासों से भी बचा जाए. ऐसे में कांग्रेस नेताओं के लिए सदन में दिए प्रणब मुखर्जी के भाषण पर गौर करना बहुत जरूरी हो जाता है.

नेहरू ने हमेशा राष्ट्रीय हित को सबसे ऊपर रखा. जब घाटी में 'भारतीय सेना कश्मीर से जाओ' के नारे लगने शुरू हुए और हालात बदलने लगे तो उन्होंने 08 अगस्त 1953 में शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त कर उन्हें जेल में डाल दिया. हालांकि शेख और नेहरू के बीच अच्छी दोस्ती थी. इसके बाद भी उन्हें जेल में डाला गया, क्योंकि प्रधानमंत्री नेहरू ने महसूस किया कि कश्मीर पर राष्ट्रीय हित दोस्ती से कहीं ज्यादा जरूरी हैं.

1957 में नेहरू के दोस्त और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन ने संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में कहा, 'ब्रिटिश राज का हिस्सा रहीं रियासतों को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए लेकिन इसे उन संवैधानिक इकाइयों के परिपेक्ष्य में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जो खुद केंद्रीय संघ का हिस्सा हों.'

क्या मानते थे गोविंद वल्लभ पंत
गोविंद वल्लभ पंत 1955 में नेहरू कैबिनेट में गृह मंत्री थे, वो मानते थे कि यद्यपि कश्मीर की चुनी हुई विधानसभा अपने फैसले लेने में सक्षम है, लेकिन वो क्या कर रही है, इससे आंख नहीं मूंदी जा सकती है और घटनाओं, तथ्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती है.
1962 में कृष्णा मेनन ने फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में याद दिलाया कि किस तरह पाकिस्तान अपनी प्रतिबद्धता और जनमत संग्रह के हालात बनाने संबंधी शर्तों में नाकाम रहा है. कश्मीरियों ने लोकसभा चुनाव और फिर राज्य के विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया, उससे तो संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव खुद ब खुद निरापद हो गया. उन्होंने कहा, 'हम किसी भी शर्त पर अपनी इस विरासत को हाथ से नहीं जाने देंगे. किसी भी शर्त पर हम भारत को टूटने नहीं देंगे.'
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नेहरू बेशक शेख अब्दुल्ला के अच्छे दोस्त थे लेकिन जब राष्ट्रहित की बात आई तो उन्होंने शेख को लंबे समय के लिए जेल में डाल दिया


अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को रिहा करने का आदेश दिया. इसके बाद विदेशी ताकतों के हाथों में खेलने के संदेह में लाल बहादुर शास्त्री की सरकार ने उन्हें फिर गिरफ्तार किया. हालांकि इंदिरा गांधी ने उन्हें आजाद किया. उनके साथ एक समझौता भी किया गया. जिसके चलते तब घाटी में शेख अब्दुल्ला के पक्ष में सैयद मीर कासिम की कांग्रेस सरकार ने इस्तीफा दे दिया.

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शेख अब्दुल्ला बाद में इंदिरा के खिलाफ हो गए
संसदीय लोकतंत्र के लिहाज से ये शानदार कदम था. यहां तक कि बाद में शेख अब्दुल्ला, इंदिरा गांधी के खिलाफ हो गए. फिर उनके बेटे फारुक अब्दुल्ला ने भी राजीव गांधी के साथ ऐसा ही रुख अपनाया. राजीव ने 31 अक्टूबर 1987 में फारुक के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया, जिससे उनके चीफ मिनिस्टर बनने का रास्ता साफ हुआ. हालांकि सियासी तौर पर राजीव-फारुक की दोस्ती संकटभरी साबित हुई, इसने ऐसे शून्य को जन्म दिया, जिससे कश्मीर में अलगाववादी और अतिवादी ताकतों को पैर पसारने का मौका मिला.

कांग्रेस अपनी कश्मीर नीति सामने लाए
मौजूदा कांग्रेस को कश्मीर पर अपनी स्पष्ट नीति सामने लानी चाहिए ताकि उसका काडर आश्वस्त हो कि उसकी पार्टी की नीतियां कश्मीर पर राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर ही हैं. राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस की हिस्सेदारी हर जगह बनती है, चाहे वो लद्दाख हो या फिर जम्मू क्षेत्र या फिर घाटी का इलाका.

अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने कश्मीर मामले पर जिस तरह संशोधन किए और कदम उठाए, उसके बाद ऐसा लगा कि ये पुरानी पार्टी वैसा ही राग अलाप रही जैसा पाकिस्तान. इसने कांग्रेस और उसके उन दिग्गजों को हास्यास्पद और अपमानजनक हालात में पहुंचा दिया जो पाकिस्तान के खिलाफ हमेशा डटकर मुकाबला करते रहे. बल्कि कांग्रेस की सरकारों के दौर में पाकिस्तान के खिलाफ तीन लड़ाइयां भी जीती गईं. कश्मीर के मामलों में भारतीय जनता की आकांक्षाओं को आगे भी रखा गया.

कांग्रेस के लिए फिर से सब कुछ शुरू करने का समय 
फरवरी 1994 में पीवी नरसिम्हाराव की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया था, "कश्मीर हमेशा से भारत का अविभाज्य अंग रहा है और रहेगा."
लगता है कि ये कांग्रेस के लिए फिर से सब कुछ शुरू करने का समय है. जो बेहतर काम हो रहे हैं, उसे उसमें ना केवल साथ खड़े होना चाहिए बल्कि पुरानी बातों में खुद बेहतर बताते रहने से भी बचना चाहिए.

(रशीद किदवई आब्जर्बर रिसर्च फाउंडेशन में विजिटिंग फैलो हैं, ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

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First published: August 6, 2019, 2:41 PM IST
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