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27 साल में पहली बार 'दिल्ली के दंगल' में बिना शीला दीक्षित उतरी है कांग्रेस, क्या होगा नतीजा

News18Hindi
Updated: January 25, 2020, 11:41 PM IST
27 साल में पहली बार 'दिल्ली के दंगल' में बिना शीला दीक्षित उतरी है कांग्रेस, क्या होगा नतीजा
शीला दीक्षित 15 सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं.

चांदनी चौक सीट से कांग्रेस की प्रत्याशी अलका लांबा (Alka Lamba) ने एक रैली में कहा है कि दिल्ली को नई शीला दीक्षित (Sheila Dikshit) मिलने वाली है. उनके इस भाषण के बाद सोशल मीडिया पर लोग शीला को याद कर रहे हैं.

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दिल्ली की चांदनी चौक (Chandani Chowk) सीट से कांग्रेस (Congress) उम्मीदवार अलका लांबा (Alka Lamba) ने शुक्रवार को कहा कि इस विधानसभा चुनाव (Assembly Election) से दिल्ली को ‘एक और शीला दीक्षित’ मिलने जा रही है. अलका लांबा के इस स्टेटमेंट के बाद सोशल मीडिया पर शीला दीक्षित को याद करते हुए पोस्ट्स भी आईं. शीला दीक्षित को दिल्ली की फेवरेट मुख्यमंत्री के तौर भी याद किया जाता है. वो 1998 से 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं.

दिल्ली में विधानसभा का चुनाव पहली बार 1952 में हुआ था. लेकिन फिर States Reorganisation Act, 1956 के तहत दिल्ली को संघशासित प्रदेश बना दिया है. फिर करीब 35 साल बाद भारतीय संविधान के 69वें संशोधन के तहत दिल्ली को National Capital Territory of Delhi बना दिया गया. इसके बाद 1993 में दिल्ली में दूसरी बार विधानसभा चुनाव हुए. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 70 में से 49 सीटें जीती थीं. मदन लाल खुराना राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने. इसके बाद साल 1998 में हुए विधानसभा चुनाव में दिल्ली को शीला दीक्षित के रूप में ऐसा मुख्यमंत्री मिला जो लंबे समय तक शासन करता रहा. दिल्ली में लंबे समय से रह रहे लोग बताते हैं कि राष्ट्रीय राजधानी में सबसे ज्यादा सकारात्मक परिवर्तन और विकास कार्य हुए.

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अलका लांबा चांदनी चौक से कांग्रेस की प्रत्याशी हैं.


दिलचस्प थी राजनीतिक एंट्री

यूपी की राजधानी लखनऊ से कोई घंटे भर की दूरी पर एक जिला है उन्नाव. इसी उन्नाव के एक गांव के रहने वाले थे स्वतंत्रता सेनानी उमाशंकर दीक्षित. दीक्षित जी ने कानपुर में पढ़ाई की और वहीं गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया. गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर कांग्रेस के अध्यक्ष थे तो दीक्षित जी सचिव. दीक्षित जी के एक पुत्र थे विनोद कुमार दीक्षित जो आईएएस थे, उन्हीं से दिल्ली के मिरांडा हाउस की शीला दीक्षित का विवाह हुआ था. विद्यार्थी जी की हत्या के बाद दीक्षित जी कांग्रेस में सक्रिय रहे और नेहरू के संपर्क में आए और उनके करीबी बन गए.

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस से जुड़े सभी नेताओं को काफी अहमियत दी गई सो दीक्षित जी को भी मिली. शीला दीक्षित भी ससुर के साथ राजनीति में सक्रियता से हिस्सा लेती रहीं. उधर जब 1969 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निकाला गया तो दीक्षित जी इंदिरा गांधी के साथ थे और जब इंदिरा गांधी ने सत्ता में वापसी की तो दीक्षित जी को भी इसका इनाम मिला. और 1974 में वो देश के गृह मंत्री बन गए.

इसी दौर में जब इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी पार्टी से लेकर देश तक चलाने लगे तो दीक्षित जी गवर्नर बनाकर कर्नाटक भेज दिए गए. संजय गांधी युवा कांग्रेसियों की फौज खड़ी करना चाहते थे. तो दीक्षित जी की बहू शीला दीक्षित कुछ ज्यादा सक्रिय हो गईं. अस्सी के दशक में परिवार के साथ एक रेल यात्रा के दौरान शीला दीक्षित के पति विनोद कुमार दीक्षित की हार्ट अटैक से मौत हो गई. शीला ने बखूबी बच्चों को भी संभाला और ससुर की राजनीतिक विरासत को भी.delhi elections 2020 dates, Election Commission, sheila dikshit, metro, aap, bjp, CONGRESS CANDIDATE LISTS, कांग्रेस उम्मीदवार की लिस्ट, दिल्ली चुनाव की तारीखें, चुनाव आयोग, Delhi Assembly Election, दिल्ली विधानसभा चुनाव, अरविंद केजरीवाल, Arvind Kejriwal, बीजेपी, BJP, आम आदमी पार्टी, AAP, Aam Aadmi Party, कांग्रेस, Congress

कन्नौज से बनी थीं पहली बार सांसद
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद चली कांग्रेस लहर में शीला दीक्षित भी यूपी के ब्राह्मण बहुल कन्नौज से लोकसभा पहुंच गईं. गांधी परिवार से शीला की नजदीकियों का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो राजीव गांधी के साथ कलकत्ता से विमान में दिल्ली आने वाले यात्रियों में प्रणब मुखर्जी और अन्य के अलावा शीला दीक्षित भी मौजूद थीं और उन्हीं के सामने राजीव को प्रधानमंत्री बनाए जाने की रणनीति बनाई गई थी.

राजीव गांधी से निकटता का फायदा ये हुआ कि शीला दीक्षित को केंद्र में राज्यमंत्री बना दिया गया. पहले संसदीय कार्य मंत्रालय में फिर पीएमओ में. लेकिन पांच साल के अंदर ही कुछ तो बोफोर्स की हवा और कुछ 84 सिख दंगों का असर, कांग्रेस का पूरे देश से पत्ता साफ हो गया.

शीला दीक्षित चुनाव हार गईं, साथ ही कांग्रेस के बड़े-बड़े तुर्रम खां इस चुनाव मे चित्त हो गए. इस हार के बाद शीला दीक्षित ने कभी यूपी का रुख नहीं किया. पति की मौत हो चुकी थी और 1991 में ससुर का भी देहांत हो गया. शीला दीक्षित पूरी तरह दिल्ली में बस गईं और सामाजिक कामों में लग गईं. हालांकि 1991 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई और नरसिम्हा राव पीएम बने, लेकिन ये वो दौर था जब गांधी परिवार के करीबियों को ज्यादा तरजीह नहीं दी जा रही थी.

सिमटती कांग्रेस में चमका सितारा
बाबरी विध्वंस, हर्षद मेहता और जेएमएम कांड के चलते 1996 के चुनाव में कांग्रेस का बंटाधार हो गया. कांग्रेस सिमटने लगी. लेकिन 1998 में सोनिया ने पार्टी की कमान संभाली और इससे कांग्रेस के तो अच्छे दिन लौटे ही तमाम पुराने वफादारों को भी कुछ न कुछ मिलने लगा. 1998 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने शीला को पूर्वी दिल्ली से मैदान में उतारा लेकिन बीजेपी के लालबिहारी तिवारी ने उन्हें हरा दिया.

इसी साल विधानसभा चुनाव भी हुए. ये वो दौर था जब दिल्ली में बीजेपी की सरकार थी और कुछ ही महीने पहले आज की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सीएम की कुर्सी संभाली थी. प्याज के दाम आसमान छू रहे थे, राजधानी में कानून व्यवस्था चरमराई हुई थी, लोगों में गुस्सा था. बीजेपी चुनाव हार गई और कांग्रेस ने दिल्ली की गद्दी शीला दीक्षित के हवाले कर दी. लोकसभा चुनाव हार चुकीं शीला दीक्षित गोल मार्केट से चुनाव जीत गईं.



तीन बार रहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री
शीला दीक्षित लगातार तीन बार यानी 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं. कहते हैं कि जब पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ हवा थी तब भी शीला ने अकेले अपने दम पर दिल्ली की सल्तनत कांग्रेस के खाते रखी. लेकिन 2013 के चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने उन्हें बेदखल कर दिया. हार के बाद शीला दीक्षित की राजनीति से करीब करीब विदाई हो गई और जैसा कि रिटायर्ड नेताओं के साथ होता है उन्हें भी केरल में राजभवन भेज दिया गया.

2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद शीला दीक्षित ने राज्यपाल का पद त्याग दिया और दिल्ली आ गईं. फिर उन्हें यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने ब्राह्मण चेहरे के रूप में पेश किया लेकिन कुछ खास नतीजा नहीं निकला. दिल्ली कांग्रेस की हालत खराब देखकर एक बार फिर उन्हें राज्य कांग्रेस की कमान सौंपी गई. उन्होंने कांग्रेस को फिर से खड़ा करना शुरू ही किया था कि 19 जुलाई 2019 को उनकी मृत्यु हो गई. वो अपने आखिरी वक्त राजनीति में सक्रिय रहीं. दिल्ली में कांग्रेसी नेता शीला दीक्षित के समय पार्टी के वैभव काल को याद करते नहीं थकते हैं.
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First published: January 25, 2020, 11:40 PM IST
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