'इंटरव्यू रोककर उस नेता ने मुझे वीकेंड पर अकेले में मिलने का न्यौता दे डाला'

लोग मेरे 'वजाइना' को पेट्रोल की कीमत की तरह डिस्कस करते थे.

News18Hindi
Updated: January 9, 2019, 1:22 PM IST
'इंटरव्यू रोककर उस नेता ने मुझे वीकेंड पर अकेले में मिलने का न्यौता दे डाला'
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ अप्सरा रेड्डी
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Updated: January 9, 2019, 1:22 PM IST
जब याद रखने लायक हुई तो खुद को मां के बालों के गजरे को प्यार से देखता पाया. आंध्रप्रदेश की किसी भी बच्ची की तरह मुझे भी बालों में वेणी लगाना पसंद था. और उसी तरह के घेरदार लहंगे पहनना. ऊंची एड़ी की चप्पलों में पैर फंसाकर घर में दौड़ती. घर पर आए मेहमान गोद में लेकर उछालते और मैं खिलखिला पड़ती. फूले-मूले गालों वाला बच्चा जो भी करे, उसपर प्यार ही आता है. परेशानी तब शुरू हुई जब फुलबॉल खेलने लायक होने के बाद भी मैं गजरे और बिंदी में उलझी दिखी. अजय रेड्डी से अप्सरा रेड्डी का सफर तय करने में मैंने कई जिंदगियां जी लीं.

विदेशी डिग्री, देश के नामी मीडिया संस्थानों का रसूखदार ओहदा और बड़ी-सी गाड़ी भी में भी एक ट्रांसजेंडर उतना ही अकेला और असुरक्षित होता है, जितना आधी रात को सड़क पर चल रही लड़की. कोई भी आपको अपनी गाड़ी में खींच सकता है.

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लकदक मीडिया हाउस के मीटिंग रूम के भीतर जब उस राजनेता ने कहा कि किसी वीकेंड मैं उसके फार्म हाउस आऊं तो मैं पसीने में डूबी हुई चुपचाप देखती रही. ये चुप उसी रोज की नहीं थी. मुझे याद है जब स्कूल में मैं किसी सवाल के जवाब में हाथ उठाती तो कैसे टीचर मुझे अनदेखा कर देते. बच्चे मुझे लड़की-जैसा-लड़का चिढ़ाते. सबसे बुरा था खेल का मैदान, जहां मैं लड़कों के साथ खेलना नहीं चाहती थी और लड़कियां मुझे खिलाना नहीं चाहती थीं. वो चेन्नई का नामी स्कूल था.

13 साल की उम्र में पहली बार जाना कि दरअसल मेरे भीतर क्या है. मैं लड़के के शरीर में लड़की की रूह थी. लड़की का ही मिजाज था. अब मैं शरीर से भी लड़की होना चाहती थी. लेकिन जेबखर्च के लिए मिल रहे पैसों से सर्जरी मुमकिन नहीं थी. 13 साल के उस लड़के ने अपने सपने को 'होल्ड' पर डाल दिया.



पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए पहले ऑस्ट्रेलिया और फिर लंदन जाने का मौका मिला. वहां जेंडर काउंसलर से मुलाकात हुई. मेरे भीतर की तेरह साल की लड़की फिर जाग गई. मैं जेंडर बदलना चाहती थी. थैरेपी शुरू करने से पहले बंद कमरे में मुझसे लगातार सवाल होते. आसान नहीं है अपने भीतर की सबसे वाइल्ड इच्छा को कहना, अपनी यौन आकांक्षाओं पर बात. बचपन से अबतक के मेरे सपनों को मुझे इन्हीं सवालों के बीच खोजना था. काउंसलिंग में मैंने वही कहा, जो जीती आई थी, तब जाकर मेरी हॉर्मोनल थैरेपी की शुरुआत हुई.
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इसी दौरान मैंने घरवालों को सब बताने का फैसला कर लिया. ऑस्ट्रलिया से आर-पार का फैसला करने के लिए लौटी. बात शुरू करते ही मां जोरों से रो पड़ीं, पिता कमरे का दरवाजा भड़ाक से बंद करते हुए निकल गए. मेरी बात का मतलब निकाला गया कि उनका बेटा सेक्स चाहता है. उसके कई सारे रिश्ते रह चुके हैं और वो भटक गया है. इतना भटक गया है कि अपनी पहचान खो चुका है.

सूजी हुई आंखें लिए मां ने दोबारा पूछा- क्या तुम पक्का हो! इसके बाद हुई बात के बाद मां ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा. तब भी जब मैं सर्जरी के लिए थाइलैंड में थी. तब भी जब सर्जरी के बाद दर्द के दौरे पड़ते. तब भी जब सारे अपने मेरे वजाइना को पेट्रोल की कीमत की तरह डिस्कस करते. और तब भी जब राह चलते लोग मुझसे एक रात की कीमत पूछ जाते.



इससे पहले बहुत कुछ बीता. मेरी पढ़ाई पूरी हुई. मैंने लंदन में ही बड़े मीडिया संस्थानों में काम किया. मैं रेडियो पर बतौर ट्रांसजेंडर अपने अनुभव बांटती, अपने-से लोगों को हिम्मत देती. लंदन की चमचमाती सड़कों पर फर्राटे से ऑडी गाड़ी दौड़ाती ये लड़की बंद कमरे में उतनी ही अकेली थी. अब भी मेरा सेक्स पूरी तरह से बदला नहीं था. मैं थैरेपी पर थी. छोटी-भूरी टैबलेट हलक से नीचे जाते ही अपना असर दिखाने लगती. मैं किसी भी बात पर रो पड़ती. सिर इतनी जोरों से घूमता मानो मैं फ्लाइट में पलटी खा चुकी हूं. नाक से खून आता. कई बार घंटों बर्फ के टुकड़े अपनी नाक पर मलती रहती और सुबह काम पर जाने का वक्त हो आता. मैं घर लौट आई.

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लौटकर बड़े अंग्रेजी अखबार में बड़ा ओहदा संभाला लेकिन यहां भी मैं आधी-अधूरी ट्रीट की जाती. मेरी साफ-सुथरी फाइनल कॉपी में अचानक कहीं से गड़बड़ियां आ जातीं. लौटने के वक्त मेरी कार के टायर पिचके रहते. इन सबसे ऊपर था मेरे वॉशरूम के इस्तेमाल पर विवाद. शरीर से पूरी न सही लेकिन मन से मैं पूरी औरत हो चुकी थी. ऐसे में पुरुषों के टॉयलेट में जाते डर लगता. महिलाओं के टॉयलेट में भी ऊंची भौंहें दिखतीं. अक्सर प्यासे ही दिन गुजारती कि टॉयलेट-प्रसंग न छिड़ जाए. कार के फ्लैट टायर और साथियों की तिरछी मुस्कान से गुजरकर रात को घर लौटती तो भी ट्रांसजेंडर होना मेरे साथ चलता. एक बार एक पुलिसवाला पास आया और पूछा- मैं एक रात का क्या लूंगी! मैंने कार आगे बढ़ा दी. ऐसा अक्सर हुआ करता.



थाइलैंड में ठंडे-सफेद कमरे में हरा गाउन पहनकर सर्जरी के लिए लिवाई जाती उस लड़की को नहीं पता था कि बेहोशी वापस टूटने वाली भी है कि नहीं. साढ़े आठ घंटों की सर्जरी के बाद आंखें खुलीं तो सिर के अलावा शरीर का हर हिस्सा पट्टियां ओढ़े हुए था. सर्जरी में बच गई लेकिन डरती कि कहीं दर्द से न मर जाऊं. फिर बिस्तर के कोने में सुस्ताती मां दिखतीं. मानो दूसरी बार उन्होंने मुझे जन्म दिया हो. थकान से बोझिल लेकिन गर्व से गीली मुस्कान. मैं बच गई. अजय अब अप्सरा रेड्डी था.

फास्ट फॉरवर्ड टू जनवरी 2019...
कानों से कतरे हुए बालों में फूलों का गजरा सजाने वाला वो बच्चा अब कांग्रेस पार्टी की ऑल इंडिया महिला कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव है. किसी रोज पिता से डूब मरने का ताना सुनकर देर तक आंसू ढरकाती वो आधी-अधूरी बेटी अब देश की औरतों की आवाज बनेगी.

कुंभ विशेष: अखाड़ों में क्या-क्या करती हैं साध्वियां?
First published: January 9, 2019, 12:42 PM IST
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