Home /News /knowledge /

कांग्रेसी कामराज को पीएम बनाना चाहते थे, फिर इंदिरा के नाम पर कैसे लगी मुहर

कांग्रेसी कामराज को पीएम बनाना चाहते थे, फिर इंदिरा के नाम पर कैसे लगी मुहर

इंदिरा गांधी (shutterstock)

इंदिरा गांधी (shutterstock)

How Indira Gandhi Become Prime Minister : लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद कांग्रेस के लिए ये बहुत मुश्किल हो गया कि किसे प्रधानमंत्री बनाया जाए. प्रधानमंत्री पद के लिए तीन दावेदार मजबूत थे. मोरारजी देसाई, कामराज और गुलजारी लाल नंदा लेकिन इनके बीच इंदिरा गांधी भी इस पद पर बैठना चाहती थीं. उन्होंने चुपचाप पर्दे के पीछे सहमति बनानी शुरू की. आखिरकार उनकी कोशिशें रंग भी लाईं.

अधिक पढ़ें ...

लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद फिर सवाल खड़ा हो गया कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा. कांग्रेस में इस पद के लिए 03 दावेदार थे. मोरारजी देसाई खुले तौर पर पीएम पद पर अपना दावा ठोक रहे थे. गुलजारी लाल नंदा भी इस पद पर रहना चाहते थे. कांग्रेसी चाहते थे कि कामराज इस पद को संभालें. लेकिन एक चौथा भी था, जो चुपचाप खुद के नाम को चलवाकर कांग्रेसियों को मनाने में लगा था, वो थीं इंदिरा गांधी, जो बहुत चतुराई के साथ प्रधानमंत्री पद की दौड़ में लग चुकी थीं. 19 जनवरी 1966 को ये तय हो गया कि इंदिरा गांधी ही देश की तीसरी प्रधानमंत्री बनेंगी.

11 जनवरी 1966 को ताशकंद से आई एक बुरी खबर. दिल का दौरा पड़ने से प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का निधन हो गया. वे पाकिस्तान के साथ युद्ध खत्म करने के समझौते के लिए सोवियत संघ गए थे. देश सन्नाटे में था. बड़ी मुश्किल से नेहरू के बाद कौन की गुत्थी सुलझी थी कि “शास्त्री के बाद कौन” का सवाल सामने आ गया. कांग्रेस अध्यक्ष के.कामराज प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक उम्मीदवार थे, लेकिन न उन्हें हिंदी आती थी न अंग्रेजी. आखिर देश से संवाद कैसे करते?

आखिर इन तीन दावेदारों की जगह इंदिरा गांधी ने कैसे देश का ये शीर्ष पद हासिल किया. कांग्रेस के दिग्गज नेता और मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्रा ने अपनी किताब द पोस्ट नेहरू एरा-पालिटिकल मेमोरीज में इस बारे में लिखा है. उन दिनों डीपी मिश्रा को भारतीय राजनीति का चाणक्य कहा जाता था. वो लिखते हैं कि शास्त्री के निधन के तुरंत बाद इंदिरा ने फोन करके उन्हें जता दिया था कि वो प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं. उन्होंने इसके लिए मिश्रा से मदद मांगी.
डीपी मिश्रा ने किताब में लिखा, “कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा भी पूर्णकालिक प्रधानमंत्री बनना चाहते थे. वो भी सबसे समर्थन मांग रहे थे. लेकिन सबसे मजबूत थे कामराज. उन्होंने न तो कभी प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश जाहिर की और न ही इसका खंडन किया. लेकिन उस समय वो कांग्रेस में सबसे मजबूत थे. जो चाहते कर सकते थे.”
इस किताब के अनुसार, “मोरारजी देसाई ने खुलेआम उम्मीदवारी जता दी थी. धनवान गुजरात लॉबी भी उनके साथ थी. लेकिन कांग्रेसी उन्हें अक्खड़ और अंहकारी मानते थे. इसलिए आमतौर पर कांग्रेसियों में उनकी लोकप्रियता कम थी.”
कांग्रिसयों ने कामराज के पीएम बनने पर सहमति दे दी थी
शास्त्री का निधन 11 जनवरी 1966 को हुआ. इसके दो दिन बाद 13 जनवरी को कांग्रेस सिंडिकेट नेताओं की गुप्त मीटिंग हुई. इसमें सभी सदस्यों ने मुहर लगा दी कि कामराज ही प्रधानमंत्री बनें. प्रस्ताव भी पेश कर दिया गया. कामराज ने सबकी बातें सुनीं लेकिन मीटिंग के अंत में प्रधानमंत्री बनने से मना कर दिया. उसकी वजह शायद ये थी कि ना तो उन्हें हिंदी आती और ना ही अंग्रेजी भाषा पर ही बेहतर नियंत्रण था.
क्यों इंदिरा के नाम पर कामराज ने भी दे दी थी सहमति
अगले दिन कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने इस बारे में फैसला करने के लिए कांग्रेस वर्किंग कमेटी की महत्वपूर्ण बैठक बुलाई. जिसमें ये तय हुआ कि शास्त्री के उत्तराधिकारी की घोषणा 19 जनवरी को की जाएगी. बस इसके बाद ही पर्दे के पीछे का खेल शुरू हो गया. डीपी मिश्रा किताब में लिखते हैं कि उन्होंने कामराज को इंदिरा गांधी के नाम पर सहमत करने का काम किया. वो सहमत हो भी गए. शायद कामराज को ये लगा कि मोरारजी अगर प्रधानमंत्री बन गए तो वो किसी के काबू में नहीं आने वाले, लेकिन इंदिरा गांधी तो गूंगी गुड़िया की तरह हैं, उन्हें आराम से नियंत्रित किया जा सकता है.
वोटिंग में इंदिरा ने मोरारजी को हरा दिया
अब मोरारजी देसाई से बात करके कहा गया कि वो भी मान जाएं और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनने दें. मोरारजी ने इनकार कर दिया. नतीजतन 19 जनवरी को प्रधानमंत्री पद के चुनाव के लिए वोटिंग हुई. हालांकि वोटिंग से पहले ही मोरारजी खुद समझ चुके थे कि वोटिंग में उन्हें कांग्रेसियों का समर्थन नहीं मिलने वाला.
इंदिरा गांधी तब शास्त्री मंत्रिमंडल में सूचना प्रसारण मंत्री जरूर थीं, लेकिन उन्हें गूंगी गुड़िया ही समझा जाता था. इससे पहले वे 1959-60 में कांग्रेस की अध्यक्ष भी थीं. उनकी ज्यादा रुचि पिता जवाहरलाल नेहरू की जिंदगी को व्यवस्थित रखने में ही थी. वोटिंग में  मोरारजी देसाई के 169 वोटों के मुकाबले इंदिरा को 355 वोट मिले. दिग्गज अपनी कामयाबी पर खुश थे.

इंदिरा को काफी चुनौतियां झेलनी पड़ीं
बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा की शुरुआत अच्छी नहीं हुई. 1967 के चुनाव में डॉ. राम मनोहर लोहिया के गैरकांग्रेसवाद का नारा खूब चला और गुटों में बंटी कांग्रेस पहले के मुकाबले 60 सीटें खोकर 297 पर सिमट गई. कई राज्यों में संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं. नेहरू जी के साथ प्रधानमंत्री आवास में कई बरस बिता चुकीं इंदिरा ने समझ लिया कि ताकतवर होने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं. उन्होंने मोरारजी के नेतृत्व में गोलबंद पार्टी के परंपरावादियों को चुनौती दी.

इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री जरूर बन गईं थीं लेकिन कांग्रेस में उनके लिए चुनौतियां बहुत बड़ी थीं. एक तबका लगातार उन्हें चुनौती दे रहा था. ऐसे में उन्होंने खुद को मजबूत करने का फैसला किया.

पार्टी तोड़कर वामपंथियों के सहयोग से सरकार चलाई
समाजवादी धड़ा उनके साथ था. उन्होंने 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और पूर्व रियासतों को दिया जाने वाला प्रीवीपर्स खत्म कर दिया. वह पार्टी से अलग अपनी शख्सियत बनाने में जुट गईं. 1969 में राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीवा रेड्डी के खिलाफ वी.वी.गिरी को समर्थन देकर जिता दिया. नतीजा पार्टी टूट गई लेकिन इंदिरा ने समाजवादियों और वामपंथियों के सहयोग से अगले दो साल तक सरकार चलाई.

रियासतों के विशेषाधिकार खत्म कराए
माखनलाल फोतेदार ने एक बार कहा था कि रियासतों के भारत में विलय के बावजूद विशेषाधिकार थे. इंदिरा गांधी ने संसद में बिल पास करवाकर उन्हें हटवाया. कहा गया कि इंदिरा ने भारत को दूसरी बार आजाद करवाया.

इंदिरा के नेतृत्व में अब एक नई कांग्रेस सामने थी. वे देश को आत्मनिर्भर बनाने, गरीबी और बेरोजगारी दूर करने का सपना दिखा रही थीं. कांग्रेस के युवा तुर्क ही नहीं, वामपंथी भी इंदिरा के जरिए भारत में समाजवादी क्रांति का सपना देखने लगे. लेकिन इसी के साथ संगठन बतौर कांग्रेस का क्षरण शुरू हो गया. इंदिरा गांधी संगठन के फैसलों के खिलाफ जाकर लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ रही थीं. आगे चलकर ये कांग्रेस ही नहीं लोकंतंत्र के लिए भी घातक सिद्ध हुआ.

‘गरीबी हटाओ’ के नारे से हो गए वारे न्यारे
इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान को ही नहीं, देश में अपने विरोधियों को भी निर्णायक मात दी. गरीबी हटाओ का उनका नारा मतदाताओं के सिर चढ़कर बोला. अगले कुछ साल उपलब्धियों के रहे और 1974 में पोखरण में परमाणु विस्फोट करके उन्होंने पूरी दुनिया को चौंका दिया.

इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ नारे ने 1971 के बसंत में ऐसी बयार उठाई जो उनके विरोधियों को तिनके की तरह उड़ा ले गई. पहली बार लोकसभा के चुनाव विधानसभा चुनाव से पहले हो रहे थे. बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवीपर्स खत्म कर देने जैसे कदमों को अदालती जंजीर में कसने की कोशिश के खिलाफ इंदिरा ने कार्यकाल खत्म होने के 14 महीने पहले ही लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर दी थी. मार्च में हुए इस चुनाव में गरीबी हटाओ का नारा मतदाताओं के सिर जादू की तरह चढ़ गया. इंदिरा ने गरीबी और बेरोजगारी से आजाद भारत के सपने की ऐसी बड़ी लकीर खींची की बाकी सभी छोटे पड़ गए.

INDIRA GANDHI

राजाओं का प्रिविपर्स बंद कर और बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके इंदिरा गांधी ने जनता का दिल जीत लिया. उन्होंने तीन महीने पहले ही चुनाव की घोषणा की और अपने बल पर चुनाव जीता भी.

चुनावों में इंदिरा ने बहुत मेहनत की
इस चुनाव में इंदिरा ने दिन-रात एक कर दिया. वे इंदिरा कांग्रेस का अकेला चेहरा थीं. प्रचार के दौरान उन्होंने 36,000 मील की दूरी तय की और 300 सभाओं को संबोधित किया. गरीबों, भूमिहीनों, मुस्लिम और दलित वर्ग का पूरा वोट इंदिरा कांग्रेस के खाते में गया. इंदिरा को 352 सीटों के साथ दो तिहाई बहुमत मिला. संगठन कांग्रेस 16 सीटों पर सिमट गई.

लगातार बढ़ता गया उनका कद
इंदिरा के सामने अब कोई चुनौती नहीं थी. कहा जाने लगा कि मंत्रिमंडल में वे अकेली मर्द हैं. हर उपलब्धि के साथ उनका कद पहले से ऊंचा होता गया. और जब 1974 में भारत ने विकसित देशों के दबाव को दरकिनार करके पोखरण में पहला परमाणु विस्फोट किया तो दुनिया दंग रह गई. दक्षिण एशिया में इंदिरा के नेतृत्व में एक ऐसी शक्ति का उदय हुआ था जिसकी ओर कोई आंख उठाकर नहीं देख सकता था. इंदिरा देशभक्ति का पर्याय बन गईं. इसके आगे की कहानी इमरजेंसी, सरकार गंवाने और फिर सरकार बनाने के बाद ऑपरेशन ब्लू स्टार तक जाती है. इस ऑपरेशन के बाद इंदिरा गांधी को अपनी जान गंवानी पड़ी थी.

इंदिरा अनुशासन के साथ कभी कोई समझौता नहीं करती थीं. घर की सजावट से लेकर रिश्तों की बनावट तक, हर चीज को वे पाबंदी के साथ दुरुस्त रखना चाहती थीं. ये शायद देश को अपने लिहाज से दुरुस्त करने की ख्वाहिश ही थी, जो उन्हें इमरजेंसी जैसे बेहद अतिवादी कदम की तरफ लेकर चली गई.

Tags: Indira Gandhi, Lal Bahadur Shastri, Prime Minister of India

विज्ञापन
विज्ञापन

राशिभविष्य

मेष

वृषभ

मिथुन

कर्क

सिंह

कन्या

तुला

वृश्चिक

धनु

मकर

कुंभ

मीन

प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
और भी पढ़ें
विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर