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जानिए, संस्कृत से क्या है पाकिस्तान और उर्दू का ताल्लुक

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: November 22, 2019, 12:06 PM IST
जानिए, संस्कृत से क्या है पाकिस्तान और उर्दू का ताल्लुक
संस्कृत भाषा में लिखी पांडुलिपी

भाषाविद कहते हैं कि दुनिया की सभी भाषाएं आमतौर पर तीन भाषाओं से निकली हैं- ये हैं लेटिन, ग्रीक और संस्कृत. संस्कृत का उद्गम उसी गांधार इलाके में हुआ, जहां आज पाकिस्तान का स्वात घाटी इलाका है.

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  • Last Updated: November 22, 2019, 12:06 PM IST
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देश में इन दिनों संस्कृत (Sanskrit) से जुड़े एक मामले को लेकर विवाद चल रहा है. इसमें धर्म को लपेट लिया गया है. दरअसल बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University) के संस्कृत विभाग (Sanskrit Department) में एक मुस्लिम (Muslim) की अध्यापक पद पर नियुक्ति के बाद विवाद शुरू हो गया. एक भाषा के तौर पर संस्कृत की यात्रा कई जगहों से गुजरी है. कहा जाता है कि इस भाषा की पैदाइश मूल तौर पर स्वात में हुआ. जो अब पाकिस्तान (Pakistan) का अंग है.

स्वात के बारे में कहा जाता है कि प्राचीन भाषा में यहां हिंदू (Hindu) धर्म फला-फूला, फिर बौद्ध (Buddhism) धर्म यहां की पहचान बना. हालांकि अब भी लोग मानते हैं कि स्वात नाम ही वास्तव में संस्कृत से निकला है, जिसे सुवास्तु और श्वेत से जोड़ा जाता है. स्वात को प्राचीन शास्त्र गांधार में बताते हैं.

सबसे रोचक बात ये भी है, जिसका अक्सर जिक्र होता है. संस्कृत के विद्वानों ने भी अक्सर इसकी चर्चा की है कि पाकिस्तान का नाम खुद संस्कृत से निकला हुआ है. पाकिस्तान दो शब्दों से मिलकर बना है-पाक और स्तान.

स्तान संस्कृत से निकला शब्द 

स्तान शब्द मूलरूप से संंस्कृत से आया है, जिसका अर्थ होता है जगह. पाकिस्तानी मूल के कनाडाई लेखक तारेक फतेह अपने टीवी कार्यक्रमों में अक्सर कहते हैं कि किस तरह पाकिस्तान का नाम ही संस्कृत से आया.



बकौल उनके प्राचीन समय अफगानिस्तान, पाकिस्तान और इससे ऊपर के इलाकों में एक जैसी सभ्यता थी. संस्कृत उन्हीं लोगों के बीच से निकली.  स्तान संस्कृत शब्द है. जिसे पाकिस्तान ने लिया. अब स्तान को हिंदी में स्थान भी कहा जाने लगा है.
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जहां आज पाकिस्तान है, उस धरती पर स्वात और आसपास से किस तरह संस्कृत का उदय हुआ, इस बारे में पाणिनी ने 500 ईसा पूर्व अपनी किताब अष्टाध्याय में लिखा है. तक्षशिला के इस विद्वान की किताब को दुनिया की पहली व्याकरण पुस्तक माना  जाता है. पाणिनी का जन्म भी गांधार में हुआ था.

ईसा से 500 साल पहले विद्वान पाणिनी ने अष्टाध्याय नाम से ग्रंथ लिखा, जिसमें संस्कृत के इतिहास के साथ व्याकरण का जिक्र किया गया


अष्टाध्यायी केवल व्याकरण ग्रंथ नहीं है. इसमें प्राचीन काल के भारतीय समाज का पूरा चित्रण मिलता है.तब के भूगोल, सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा और राजनीतिक जीवन, दार्शनिक चिंतन, ख़ान-पान, रहन-सहन आदि का भी इसमें जिक्र हुआ है.

क्या उर्दू में संस्कृत के ढेर सारे शब्दों का इस्तेमाल
उनका ये भी कहना है कि मूलतौर पर उर्दू जुबान भी संस्कृत के ही शब्दों से मिलजुल कर बनी है. केवल तारेक ही नहीं संस्कृत के विद्वान कहते हैं कि 90 फीसदी उर्दू शब्द संस्कृत से आये. वो बहुत से शब्दों का हवाला भी देते हैं, मसलन- सफेद (श्वेत) , हफ्ता(सप्ताह), बारिश (वर्षा), भाई (भ्राता), सूरज (सूर्या), चांद (चंद्रमा), हाथ (हस्त), काम (कर्म), कौवा (कागा), जीभ (जिह्वा), दिन (दिनक), एक (एकम), दो (द्वि), तीन (त्रे), पांच (पंचम) आदि.

अंग्रेज विद्वान विलियम जोन्स के अनुसार, "दुनिया की सारी भाषाएं मूल तौर पर तीन भाषाओं से निकली हैं, वो हैं लेटिन, ग्रीक और संस्कृत"

क्या बुद्ध ने संस्कृत को स्वीकार नहीं किया था
कहा जाता है कि प्राचीन समय में संस्कृत को लेकर कई धारणाएं भी थीं. आमतौर पर ये कहा जाता रहा है कि संस्कृत तब शासकों और कुलीन जन की भाषा थी. इसलिए ईसा से पांच शताब्दी पहले जब भगवान बौद्ध का उदय हुआ तो उन्होंने अपनी शिक्षाएं संस्कृत में ना तो बोलीं और ना ही लिखवायीं. बल्कि इसके बदले उन्होंने उस जमाने की आमजन की भाषा मगही को चुना. बाद में इसी प्राकृत और पाली भाषाएं निकलीं.

कहा जाता है कि बुद्ध को संस्कृत कुलीन जनों की भाषा लगती थी, उन्होंने इसकी जगह मगही भाषा पर ज्यादा जोर दिया


कहा जाता है कि बुद्ध कहते थे, हम ऐसी भाषा में अपनी बात कहेंगे जो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और स्वीकार की जाए.  कुछ लोग ये दावा भी करते हैं कि बुद्ध ने संस्कृत की श्रेष्ठता को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था.

बाद में इसी से प्राकृत और पाली भाषा का विकास हुआ. ऐसे भी बुद्ध को हमेशा लगता था कि संस्कृत देश के कुलीन माने जाने वाले ब्राह्मणों की भाषा है, जिसे चुनौती दिया जानी जरूरी है.

ऋगवेद पहले भारत से कहां बोली गई
हालांकि एक रिपोर्ट ये भी कहती है कि मौखिक तौर पर ऋगवेद को पहले भारत नहीं बल्कि उत्तरी सीरियाई इलाके में बोला गया था. वहां से आए आर्यों ने उसे हिंदुस्तान में आकर लिखित रूप दिया. वहां मितानी वंश का राज था, जिनके राजाओं के नाम संस्कृत में होते थे.

1500 से 1350 ईसा पूर्व वहां मितानी वंश राज करते थे, वे हुरियन नाम की भाषा बोलते थे, जो संस्कृत तो नहीं थी लेकिन उसके आसपास जरूर थी. मितानी वंश की संस्कृति उसी तरह थी, जैसी वैदिक सभ्यता के लोगों की. वे घोड़े की सवारी करते थे. कई तरह के संस्कृत शब्द भी बोलते थे. वो उन्हीं देवताओं की पूजा करते थे, जिनका जिक्र ऋगवेद में हुआ है. हालांकि उनके अपने भी कुछ स्थानीय देवता रहे होंगे.

हालांकि भारत में संस्कृत भाषा का प्रयोग आम लोगों के बीच बंद हो जाना हैरानी की ही बात है. कुछ लोग कहते हैं कि संस्कृत के कठिन होने के कारण इसे हटा दिया गया. लेकिन दुनिया की सबसे कठिन भाषा तो चीनी है, फिर उन्होंने चीनी भाषा का प्रयोग बंद क्यों नहीं कर दिया?

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First published: November 21, 2019, 9:20 PM IST
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