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    Climate Change: लगातार बर्फ पिघलने से पृथ्वी पर बन रहा तापमान वृद्धि का दुष्चक्र

    दुनिया भर में बर्फ पिघलने (Ice Melting) की दर तेजी से बढ़ रही है जिससे तापमान वृद्धि भी बढ़ने लगी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
    दुनिया भर में बर्फ पिघलने (Ice Melting) की दर तेजी से बढ़ रही है जिससे तापमान वृद्धि भी बढ़ने लगी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के लेकर ताजा अध्ययन ने बताया है कि दुनिया भर में बर्फ पिघलने (Ice Melting) से तापमान वृद्धि और बढ़ गई है एक खतरनाक दुष्चक्र (Vicious circle) का रूप ले रही है.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 30, 2020, 9:44 AM IST
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    पृथ्वी (Earth) पर पिछले कुछ समय से बर्फ लगातार पिघल (Ice melting) रही है. हाल के कुछ सालों में हुए अध्ययन बता रहे हैं कि ग्लोबल वार्मिंग(Global warming) का सबसे बुरा असर दुनिया की बर्फ की चादरों (Ice Caps) पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है. ताजा शोध में शोधकर्ताओं ने इससे भी आगे का एक खतरनाक सच का पता लगाया है. उनके मुताबिक बर्फ के पिघलने से अब दुनिया में तापमान वृद्धि और ज्यादा होगी और यह एक दुष्चक्र (Vicious Circle) में बदल रहा है.

    कितनी बर्फ पिघल रही है
    शोधकर्ताओं का कहना है कि अरबों टन की बर्फ का पिघलने से दुनिया का तापमान 0.4 डिग्री और ज्यादा बढ़ जाएगा. इसकी वजह से उन्होंने चेताया है कि इससे तापमान वृद्धि का दुष्चक्र बन जाएगा. आर्कटिक इलाके में गर्मी के मौसम में बर्फीला समुद्री स्तर 1970 के दशक से हर दशक में 10 प्रतिशत कम हो रहा है.  पिछली सदी में पहाड़ों के ग्लेशियरों से करीब 250 अरब टन बर्फ हर साल समुद्रों में पहुंची है.

    उम्मीद से ज्यादा तेजी से पिघल रही थी बर्फ
    पश्चिमी अंटार्किटिका और ग्रीनलैंड में बर्फ की चादर तेजी से पिघल रही है और जितना पहले वैज्ञानिक सोच रहे थे उससे ज्यादा गति से पिघल रही है. हाल ही में उन्होंने पाया की हालात पहले से बहुत खराब है. दशकों के अध्ययनों ने पृथ्वी पर बर्फ पिघलने की मात्रा की गणना की जिसका समुद्री तल का स्तर  बढ़ने में योगदान रहा.



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    दुनिया में ग्लोबल वार्मिग (Global Warming) का असर उम्मीद से ज्यादा खतरनाक दिख रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    बर्फ पिघलने से तापमान वृद्धि
    अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में अकेले ही इतनी ज्यादा बर्फ है कि वह महासागरों का जलस्तर 60 मीटर तक बढ़ा सकते हैं. लेकिन एक छोटे शोध ने यह प्रयास किया है कि यह पता चल सके कि कैसे बर्फ पिघलने की मात्रा में बढ़ने से तापामान और बढ़ेगा, जबकि औद्योगिक युग से अब तक एक डिग्री तापमान पहले से ही बढ़ चुका है.

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    क्लाइमेट मॉडल का उपयोग
    जर्मनी के इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च (PIK) के वैज्ञानिकों ने एक क्लाइमेट मॉडल का उपयोग किया जिसमें वायुमंडल, महासागर, समुद्र और धरती की बर्फ कीमात्रा के जैसे कारकों का शामिल किया जिससे की बर्फ पिघलने से तापमान में बदलाव का अनुमान लगाया जा सके.

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    बर्फ पिघलने (Ice Melting) के खतरे पहले से ही दिखाई देने लगे हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


    कितना असर हो रहा है
    शोधकर्ताओं ने पाया की वर्तमान में वायुमंडलीय कार्बन डाइ ऑक्साइड के वर्तमान स्तर जो करीब 400 पार्ट्स पर मिलियन है, पर आर्कटिक सागर की बर्फ, पहाड़ों के ग्लेशियर और ध्रुवीय बर्फ की चादर तापमान में 0.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. यह तापमान उस वृद्धि के अतिरिक्त है जो मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़ रहे 1.5 डिग्री सेल्सियल की तापमान से हो रही है.

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    यह प्रक्रिया बदल जाएगी
    बर्फ का पिघलने के कारण इस तापमान वृद्धि का प्रमुख कारक एक प्रक्रिया है जिसे एल्बेडो फीडबैक कहते हैं इसमें ऊष्मा को प्रतिबिंबित करने वाली बर्फ की जगह गहरे रंग का समुद्री पानी या मिट्टी ले लेती है. इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता निको वुंडरलिंग का कहना है कि यदि वैश्विक बर्फ के इलाके सिमट गए तो इससे पृथ्वी की सतह पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी के उन जगहों में बदलाव आएगा जहां वह प्रकाश प्रतिबिंबित होता है.
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