Explained: डेनमार्क क्यों समंदर में नकली द्वीप खड़ा करने जा रहा है?

डेनमार्क की संसद ने हाल में एक कृत्रिम द्वीप तैयार करने की परियोजना को मंजूरी दी- सांकेतिक फोटो (pxhere)

डेनमार्क की संसद ने हाल में एक कृत्रिम द्वीप तैयार करने की परियोजना को मंजूरी दी- सांकेतिक फोटो (pxhere)

डेनमार्क की संसद का विचार है कि समुद्र में कृत्रिम द्वीप (artificial island in Denmark) से वो अपने 35 हजार लोगों को आवास दे सकेगी. वैसे ये पहला देश नहीं, जो समुद्र में अपनी सीमाएं बढ़ा रहा है.

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डेनमार्क ने समुद्र में एक द्वीप बनाने के प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है. ये स्कैंडिनेवियाई देश लिनेटहोम (Lynetteholm) नाम से नकली द्वीप बनाएगा, ताकि लगभग 35 हजार लोगों को घर मिल सके. द्वीप को आधुनिक शहर की तर्ज पर सारी सुविधाएं मिलेंगी. लगभग 2.6 वर्ग किलोमीटर में द्वीप बनाने के इस प्रोजेक्ट का हालांकि शुरू होने से पहले ही तगड़ा विरोध शुरू हो गया है.

समुद्र के बढ़ते जलस्तर के कारण बन रहा द्वीप 

डेनमार्क की संसद ने हाल में एक कृत्रिम द्वीप तैयार करने की परियोजना को मंजूरी दी. दरअसल, ये द्वीप समुद्री जलस्तर बढ़ने से डरकर बनाया जा रहा है. बता दें कि ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ने के साथ ध्रुवीय बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्र का स्तर तेजी से बढ़ा. इससे खासकर डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन पर खतरा आ गया है. यही कारण है कि सीमा पर रहती आबादी को किसी खतरे से बचाने के लिए डेनिश संसद ने द्वीप बनाने की योजना बनाई.

द्वीप पर काम साल के अंत में शुरू होगा
उत्तराखंड न्यूज नेटवर्क नामक वेबसाइट में छपी खबर में डेनिश प्रोजेक्ट डेवलपर्स के हवाले से बताया गया कि द्वीप के चारों ओर एक बांध बनाया जाएगा. इसका मकसद बंदरगाह को समुद्र के बढ़ते जलस्तर और तूफानी लहरों से बचाना रहेगा. वहां की सरकार का कहना है कि द्वीप की नींव साल 2035 में तैयार हो जाएगी और साल 2070 तक वो पूरी तरह से बनकर रेडी होगा.

artificial island Denmark
समुद्री जलस्तर बढ़ने के कारण डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन पर खतरा आ गया है- सांकेतिक फोटो

इंटरनेशनल स्तर पर उछला मामला 



प्रोजेक्ट में काफी समय है लेकिन घोषणा के साथ ही पर्यावरण पर काम करने वाली संस्थाएं इसके विरोध में आ गईं. यहां तक कि कुछ पर्यावरण समूहों इस द्वीप के निर्माण के खिलाफ मामला यूरोपीय न्यायालय (ईसीजे) के सामने ला रहे हैं.

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गाड़ियों के कारण प्रदूषण

उनका कहना है कि अगर द्वीप की परियोजना शुरू होती है तो इससे प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता जाएगा. काम के दौरान मालवाहक ट्रक राजधानी कोपेनहेगन से निकलेंगे. बीबीसी की रिपोर्ट में एक अनुमान दिया गया है कि इससे लगभग 350 ट्रक रोज निकलेंगे, जिससे राजधानी में प्रदूषण कई गुना बढ़ जाएगा. इसके अलावा स्थानीय लोगों का जीवन भी सड़कों पर बढ़े वाहनों के कारण प्रभावित होगा.

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क्या नुकसान होगा पर्यावरण को 

इसके अलावा द्वीप चूंकि समुद्र में बनेगा, इसके लिए अतिरिक्त मिट्टी की भी जरूर होगी. स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स का मानना है कि इसके लिए लगभग 8 करोड़ टन मिट्टी की जरूरत होगी. इस मिट्टी को भी जहां से लिया जाएगा, वहां खनन के कारण कई तरह की समस्याएं होने लगेंगी. साथ ही समुद्र में कृत्रिम द्वीप के चलते वहां की जैव-विविधता पर सीधा असर होगा. ये भी हो सकता है कि वहां की वनस्पति और जीव-जंतु नष्ट होने लगें या दूसरी जगहों पर जाने को मजबूर हो जाएं.

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कृत्रिम द्वीप का असर समुद्र की वनस्पति और जीव-जंतुओं पर होगा- सांकेतिक फोटो

डेनमार्क में हो रहा विरोध 

यही कारण है कि 4 मई को जब डेनिश संसद में ये बिल लाया जा रहा था, तभी से संसद के बाहर इसका विरोध शुरू हो चुका था. संसद के भीतर भी इसे बहुमत तो मिला लेकिन पूर्ण सहमति नहीं मिल सकी. 85 सांसद इसके पक्ष में थे, जबकि 12 ने बिल के विरोध में वोट किया. कहा जा रहा है कि बिल पास करके आनन-फानन काम शुरू करने की बजाए इसके लिए सोच-विचार होना चाहिए.

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चीन ने दक्षिण चीन सागर पर किया कब्जा 

वैसे समुद्र में कृत्रिम द्वीप बनाने का सिलसिला नया नहीं, बल्कि चीन इसमें सबसे आगे निकल चुका है. वो किसी समस्या के कारण नहीं, बल्कि व्यापारिक और सैन्य लाभ के लिए साउथ-चाइना सी में एक के बाद एक नकली द्वीप तैयार करता जा रहा है.

कैसे चीन जल्दी तैयार कर रहा द्वीप 

इन द्वीपों को बनाने के लिए उसने बहुत ही आसान तरीका चुना. उसने ऐसी खुदाई की मशीनें बनाई हैं जो समुद्र तल से मिट्टी की खुदाई करती हैं और उसे किसी कोरल रीफ पर डालती जाती हैं. इससे रीफ पूरी तरह से पट जाती है और द्वीप का आधार मजबूत हो जाता है. इसके बाद उस आर्टिफिशियल द्वीप को सीमेंट से पक्का कर दिया जाता है. जिससे उसका इस्तेमाल चीनी सेना कर सके. फिर इन नकली द्वीपों पर चीन भारी हथियारों सहित चीनी सैनिकों की तैनाती कर देता है.

artificial island Denmark and china
समुद्र में कृत्रिम द्वीप बनाने का सिलसिला नया नहीं, बल्कि चीन इसमें काफी आगे निकल चुका है- सांकेतिक फोटो

समुद्री जीव-जंतुओं की हो रही मौत

इस तरह से समुद्री द्वीपों के निर्माण से न सिर्फ दुनिया भर में चीन ने राजनैतिक, नागरिक और सैन्य संतुलन को बिगाड़ने का काम किया है बल्कि उसने कोरल रीफ जैसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक संरचना को भी नष्ट किया है. जानकार मान रहे हैं कि चीन के इस कदम से हजारों जीव-जंतुओं के ऊपर भी हमेशा के लिए खत्म हो जाने का खतरा मंडरा रहा है.

ये यूरोपियन देश भी सीमाएं बढ़ा रहा 

इसके अलावा फ्रांस के पास भूमध्य सागर के तट पर बसा देश मौनेको भी कृत्रिम द्वीप बनाने की तैयारी में है, हालांकि ये योजना किसी आर्थिक फायदे के लिए नहीं, बल्कि जमीन की कमी के चलते हैं. ये देश केवल 2.02 स्क्वैयर किलोमीटर में फैला है. यानी क्षेत्रफल के लिहाज से ये न्यूयॉर्क सिटी के सेंट्रल पार्क से भी कम है, जो 3.41 किलोमीटर में फैला हुआ है. ऐसे में जाहिर तौर पर जगह की कमी हो रही है.

लगभग 15 एकड़ जमीन मिलेगी देश को 

अब मौनेको सरकार ने द्वीप पर एक प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसे ऑफशोर अर्बन एक्सटेंशन प्रोजेक्ट नाम दिया. माना जा रहा है कि साल 2026 तक ये प्रोजेक्ट पूरा हो जाएगा. वैसे ये जानना भी मजेदार रहेगा कि इससे मोनाको में कितनी दूरी तक निर्माण हो सकेगा. इससे उस देश के पास घरों या दूसरे कमर्शियल जरूरतों के लिए 15 एकड़ का इजाफा होगा. इसमें 120 से ज्यादा नए मकान, पार्क और दुकानें बनाई जाएंगी. वैसे समुद्र में खुद को बढ़ाने की मोनाको की ये पहली कोशिश नहीं. इससे पहले भी 1861 से लेकर अब तक मोनाको समंदर में अपना इलाका 20 फीसदी तक बढ़ा चुका है.

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