Israel में निकलने वाला वो जुलूस, जो Hamas समेत अरब देशों को डराता है

इजरायल का मार्च ऑफ फ्लैग हर साल बहस का विषय बन जाता है (cnbctv18)

साठ के दशक में अरब देशों पर अपनी ताबड़तोड़ जीत की याद में हर साल इजरायल एक जुलूस निकालता है, जिसे मार्च ऑफ फ्लैग (March of Flag in Israel) कहते हैं. आतंकी संगठन हमास (Hamas) इस जुलूस को उकसाऊ बताते हुए हिंसा भड़कने की धमकी है.

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    इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता से बेदखल कर नफ्ताली बेनेट नए प्रधानमंत्री बने लेकिन दो दिनों तक भी शांति नहीं रह सकी. असल में बेनेट ने यहूदियों को यरुशलम में विवादित फ्लैग मार्च की इजाजत दे दी और मंगलवार को ये जुलूस निकला भी. आतंकी संगठन हमास में इसे लेकर खलबली मची है और वे धमकियां दे रहे हैं कि मार्च निकालकर यहूदियों ने शांति तोड़ी. वैसे मार्च ऑफ फ्लैग हमेशा से ही हमास को भड़काता रहा है.

    किस बात पर है इजरायल और हमास में झगड़ा
    इजरायल और फिलिस्तीन के बीच पिछले महीने ही 11 दिनों तक खुली लड़ाई के बाद सीजफायर हो सका. लेकिन लगता है कि ये संघर्षविराम ज्यादा नहीं चलने वाला है. इसकी वजह वो मार्च है, जो दक्षिणपंथी यहूदियों ने निकाला. टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक हमास के प्रवक्ता अब्द अल-लतीफ कनौ ने एक बयान में कहा कि फ्लैग मार्च एक विस्फोटक है जिससे यरुशलम और अल-अक्सा मस्जिद में तनाव की आग भड़केगी.

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    वैसे हर साल ही इस मार्च के दौरान फिलिस्तीन और इजराइल के बीच तनाव बढ़ जाता है. इसके पीछे दरअसल मार्च का इतिहास है, जो हमास को परेशान करता है.

    flag march Israel
    साल 1967 में अरब देशों के साथ इजरायल का भयंकर युद्ध चला था- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    इजरायल ने अकेले हराया था अरब मुल्कों को 
    साल 1967 में अरब देशों के साथ इजरायल का भयंकर युद्ध चला था. 5 दिनों तक चले इस युद्ध में इजरायल ने भारी तबाही मचाते हुए मिस्र, जॉर्डन और सीरिया की सेनाओं को हिला दिया. युद्ध में जीत के साथ ही इजरायल को यरुशलम पर कब्जा मिल सका, जो कि यहूदियों के लिए दुनिया में सबसे पवित्र जगह है. उन्होंने तुरंत इसे अपनी राजधानी घोषित कर दिया. नतीजा ये हुआ कि भारी संख्या में फलस्तीनी यहां से निकलने लगे.



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    जीत की याद में हर साल इजरायल में फ्लैग मार्च 
    ये दिन हर साल तिथि के मुताबिक बदलता रहता है. लेकिन सवाल वहीं का वहीं है कि आखिर इसपर फिलिस्तीन और अरब देश क्यों भड़कते हैं. इसकी एक वजह तो मनोवैज्ञानिक है. इस दिन जुलूस को देखकर अरब देशों की हार की याद ताजा हो जाती है कि कैसे इजरायल ने अकेले इतने देशों को हरा दिया था.

    जुलूस का रूट भी विवाद का हिस्सा
    दरअसल मार्च में हजारों यहूदी युवा और हर उम्र के लोग यरुशलम के उन इलाकों से गुजरते हैं, जहां मुस्लिम आबादी बसती है. वे वहां से होकर वेस्टर्न वॉल जाते हैं, जिसे वे दुनिया की शुरुआत की जगह मानते हैं. मुस्लिम-बहुल इलाकों से मार्च निकलने पर वहां के लोगों को अपनी दुकानें बंद करनी होती हैं. साथ ही घरों के भीतर रहना होता है. ये बात उन्हें अखरती है और स्थानीय व्यापारी काफी समय से मार्च का विरोध करते रहे हैं.

    यरुशलम में जुलस का रूट भी विवाद पैदा करता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    मार्च देखकर बेदखली की याद आती है 
    फिलिस्तीनी इससे उकसावे वाला मार्च मानते हैं. उनके मुताबिक जुलूस का बड़ा हिस्सा जान-बूझकर भड़काऊ नारे लगाता है और हार के साथ फलस्तीनियों की बेदखली की याद दिलाता है. बता दें कि पूर्वी यरुशलम पर कब्जे के बाद अस्सी की शुरुआत में इजरायल ने एक कानून बनाया, जिसके तहत पश्चिमी और पूर्वी यरुशलम को एक घोषित किया गया. इसके बाद पूर्वी यरुशलम में रहने वाली मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा पलायन कर गया.

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    आज भी अरब मुल्क मानते हैं कि पूर्वी यरुशलम फलस्तीनियों का है और उसे आजाद करना चाहते हैं. यही हमास का भी इरादा है. मार्च के दौरान ये सारी बातें सतह पर आ जाती हैं और लगभग हर साल ही छिटपुट भिड़ंत होती रही.

    बेनेट ने लिया था फैसला 
    इस साल ये मार्च 10 मई को निकलने वाला था लेकिन हिंसा की खबरों के बीच इसे स्थगित करना पड़ा. लेकिन बेनेट प्रशासन ने सत्ता में आते ही इसकी अनुमति दे दी और मार्च हो भी गया. वैसे बता दें कि नए पीएम बेनेट को बेंजामिन नेतन्याहू से भी ज्यादा सख्त और धार्मिक माना जाता है, जो फिलिस्तानी के अलग अस्तित्व से ही इनकार करते हैं. ऐसे में इंटरनेशनल जगत में ये चर्चा भी हो रही है कि आने वाले समय में अरब मुल्कों से इजरायल की आर-पार हो सकती है.

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