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रेस में तब्दील हो चुकी है कोरोना वैक्सीन की तलाश, देशों ने बनाया प्रतिष्ठा का सवाल

कोरोना वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया अब एक रेस सरीखी हो गई है. इसमें फर्स्ट आने वाले को वैश्विक ताकत बनने का तमगा हासिल होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कोरोना वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया अब एक रेस सरीखी हो गई है. इसमें फर्स्ट आने वाले को वैश्विक ताकत बनने का तमगा हासिल होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कोरोना वायरस (Corona Virus) के इलाज के लिए जिस कदर वैक्सीन (Vaccine) की तलाश की जा रही है, वैसा शायद ही पहले कभी हुआ हो. इस वैक्सीन के साथ महामारी के इलाज के अलावा और भी कई महत्वपूर्ण चीजें जुड़ गई हैं. जानिए कैसे ये वैक्सीन दुनिया की भूराजनीतिक (Geopolitics) स्थितियों को बदल कर रख देगी.

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    जब सोवियत ने 1961 में पहली बार यूरी गार्गिन (Yuri Gagarin) को अंतरिक्ष में भेजा था तो अमेरिका का आत्मविश्वास हिल गया था. माना जा रहा है कि अगर चीन ने कोरोना वायरस की वैक्सीन पहले बना ली तो अमेरिका को फिर से वैसा ही झटका लगेगा. और शायद यही वजह की कोरोना वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया अब एक रेस सरीखी हो गई है. इसमें फर्स्ट आने वाले को वैश्विक ताकत बनने का तमगा हासिल होगा.

    यही कारण है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ड़ोनाल्ड ट्रंप इसके लिए फार्मा कंपनियों, सरकारी एजेंसियों और यहां तक की सेना की रिसर्च विंग को भी साथ लेकर आए हैं. रिसर्च के इस प्रयास को ऑपरेशन रैप स्पीड (Operation Warp Speed) का नाम दिया गया है. वैक्सीन तैयार करने का दबाव ताकतवर मुल्कों पर बुरी तरह काम कर रहा है. महज कुछ महीनों के भीतर ही कोरोना महामारी ढाई लाख लोगों की जान ले चुकी है. पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही है.

    हालांकि इस दौरान दुनिया के कई नेता वैश्विक सहयोग की बात कर रहे हैं लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसी स्थितियों में राष्ट्रहित ही सर्वोपरि होकर उभरता है. ये वो स्थिति है कि जो भी देश वैक्सीन पहले तैयार करेगा न सिर्फ उसका प्रभाव बहुत तेजी के साथ बढ़ेगा बल्कि उसे आर्थिक तौर पर भी बहुत बड़ा बूस्ट मिलेगा. अगर ये देश चीन हुआ तो इसका प्रभाव वैसे ही पड़ेगा जैसे 60 साल पहले यूरी गार्गिन के अंतरिक्ष में जाने का हुआ था.



    साइबर सिक्योरिटी और ग्लोबल हेल्थ के अमेरिकी विशेषज्ञ डेविड फिडलर का मानना है कि अगर चीन ये वैक्सीन बनाने में कामयाब रहता है तो इसका इस्तेमाल वो अपनी भूराजनीतिक ताकत बढ़ाने में करेगा. हालांकि इससे पहले भी चीन दुनिया के कई देशों में मेडिकल उपकरण पहुंचा कर हीरो बना था. लेकिन मेडिकल उपकरणों की घटिया क्वालिटी की वजह से उसका ये दांव उल्टा पड़ गया.

    क्यों है ये खतरनाक रेस
    ये खतरनाक रेस है. वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनिया में इससे पहले ऐसी स्थितियां कभी नहीं आईं जब वैक्सीन बनाने के लिए महीनों में समय दिया जाए. वैक्सीन बनाना एक लंबा प्रोसेस है और इसमें सालों का समय लग सकता है. यह भी संभव है कि कोई वैक्सीन बन ही न पाए.

    (Donald Trump)

    हालांकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में एक समन्वयकारी स्टेटमेंट दिया था. उन्होंने कहा था कि हम वैक्सीन बनाने के लिए ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. हमारा ध्यान इस पर नहीं है कि इसे कौन पहले बनाएगा. अगर कोई देश ऐसा करने में कामयाब होता है तो मैं उसे सलामी दूंगा. लेकिन हमें इस बीमारी की वैक्सीन चाहिए.

    तेज हुई है भूराजनीतिक प्रभाव की जंग
    कोरोना महामारी फैलने के कुछ ही समय बाद इसे लेकर भूराजनीतिक प्रभाव की लड़ाई तेज हो गई थी. मार्च महीने में जर्मनी ने अमेरिका पर मॉडर्न पायरेसी का आरोप लगाया था. दरअसल चीन से जर्मनी के लिए मेडिकल उपकरणों का जहाज अमेरिका की तरफ मोड़ दिया गया था. इस आरोप को अमेरिका ने खारिज कर दिया था. अब यूरोपीय देश एक नया नियम लेकर आ रहे हैं जिसके मुताबिक उनके यहां की फार्मा कंपनियों का अधिग्रहण कोई दूसरा देश नहीं कर सकेगा. दरअसल चीन के कुछ कदमों की वजह से यूरोपीय देशों में नाराजगी पनपी है. दरअसल मेडिकल उपकरणों की मदद को चीन की तरफ से अतिप्रचारित किया गया. इसे राजनीतिक प्रभुत्व दिखाने के लिए इस्तेमाल किया गया. ये बात यूरोपीय देशों को पसंद नहीं आ रही है.

    अमेरिका की तरफ से भी दिए गए सिग्नल
    अमेरिका की तरफ से सिग्नल दिया गया है कि इस महामारी में अमेरिकी लोगों के हितों का खयाल सबसे पहले रखा जाएगा. उपराष्ट्रपति माइक पेंसे ने कहा है कि अमेरिका का वैक्सीन प्रोग्राम मुख्यत: अपने देश के लोगों के लिए है. अगर वैक्सीन बनती है तो इसके 30 करोड़ डोज बनाने का लक्ष्य रखा गया है. इतनी ही अमेरिका की आबादी है.

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    चीन में तेज चल रहे हैं प्रयास
    Chinese Academy of Military Medical Sciences की तरफ से तैयार की जा रही वैक्सीन के दूसरे फेज के ट्रायल के लिए 508 वॉलंटियर तैयार हो चुके हैं. माना जा रहा है कि इस ट्रायल का रिजल्ट इस महीने के आखिरी तक आ जाएगा. चीन बेहद तेजी के साथ वैक्सीन बनाने में जुटा हुआ है. दरअसल चीन वैक्सीन बनाकर न सिर्फ आर्थिक और राजनीतिक लाभ उठाने के मूड में है बल्कि वो उस दाग को भी धुलना चाहता है जो उसे कोरोना की वजह से मिले हैं.

    रूस और ब्रिटेन के प्रोग्राम
    अगर रूस की बात की जाए तो वहां पर इस वक्त वैक्सीन के चार प्रोजेक्ट चल रहे हैं. रूस के एक्सपर्ट Sergei Netesov के मुताबिक रूस चाहता है कि वो खुद इस महामारी के लिए वैक्सीन बनाए जिससे उसे अपने प्रतिद्वंद्वियों पर निर्भर न रहना पड़े. वहीं ब्रिटेन का कहना है कि अगर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का संभावित प्रोजेक्ट वैक्सीन बनाने में सफल रहा तो वो ब्रिटिश लोगों की जान बचाने में सबसे पहले इस्तेमाल किया जाएगा.

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