वैज्ञानिकों के साथ आंख मिचोली का खेल खेल रहा है कोरोना वायरस

वैज्ञानिकों के साथ आंख मिचोली का खेल खेल रहा है कोरोना वायरस
कोरोना वायरस में खुद में बदलाव लाने की क्षमता है.

दुनियाभर के सामने अगर कोरोना वायरस सबसे गंभीर समस्या बनकर उभरा है तो ये वैज्ञानिकों के लिए भी चुनौती बन गया है. ये बड़ा सवाल है कि साइंटिस्ट उसको कैसे काबू में कर पाते हैं

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 25, 2020, 6:10 PM IST
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कोरोना वायरस को लेकर एक तरफ कहा जा रहा है कि डरने की जरूरत नहीं हैं तो वहीं बहुत सी सावधानियां बरतने को भी कहा जा रहा है. देश के अधिकांश राज्यों में लॉकडाउन की स्थिति के बीच कोरोना वायरस दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए एक कड़ी चुनौती बना हुआ है. इसके पीछे क्या वजहें हैं और इस मामले में वैज्ञानिक क्या कह रहे हैं.

कोरोना वायरस आखिर एक वायरस ही है
कोरोना वायरस के आज के रूप को नोवल कोरोना वायरस के नाम से जाना जाता है, वैज्ञानिक इसे सार्स कोव-2 (SARS CoV-2) के नाम से जानते हैं. जैसा कि यह एक वायरस है, तो यह एक निर्जीव ही माना जाता है. लेकिन खत्म होने से पहले मानव संपर्क में आकर इसे अनुकूल परिस्थिति मिलती है और यह जीवित की तरह मानव शरीर के सेल्स में घुसकर अपने जैसे लाखों-करोड़ों वायरस बना लेता है.

ऐसे में वैज्ञानिक इससे निपटने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं और इसमें वे कितने सफल हुए हैं, यह बड़ा सवाल है क्योंकि फिलहाल वैज्ञानिकों के पास इससे सटीक तरह से निपटने का  कोई तरीका नहीं हैं.



निर्जीव की तरह भी रहता है यह वायरस


संक्रमित व्यक्ति के बाहर यह वायरस निष्क्रिय रहता है और उसमें जीवन जैसे खास लक्षण जैसे मैटाबॉलिज्म, हिलना डुलना, या खुद के जैसे और वायरस बनाने की क्षमता नहीं होती है. और इस तरह लंबे समय तक निर्जीव रहने पर ये खत्म भी हो जाते हैं, लेकिन संक्रमित व्यक्ति के बाहर आने पर यह कमजोर होता है और अन्य व्यक्तियों के संपर्क में आकर फिर जीवित अवस्था में आ जाता है.

अमेरिका के टेक्सास यूनिवर्सिटी के विनीत मेनाचरी (Vineet Menachery) के अनुसार इसमें अलग-अलग हालातों से लड़ने के लिए तीन तरह की क्षमताएं होती हैं.


क्यों खतरनाक है यह वायरस
कोरोना वायरस डेंगू, जीका जैसे वायरस से तीन गुना बड़ा होता है और उसमें ज्यादा प्रोटीन बनाने की क्षमता भी होती है. अमेरिका के टेक्सास यूनिवर्सिटी के विनीत मेनाचरी (Vineet Menachery) के अनुसार इसमें अलग-अलग हालातों से लड़ने के लिए तीन तरह की क्षमताएं होती हैं. यह अपने जैसे दूसरे वायरस बनाते समय अपने प्रोटीन में कुछ सुधार कर सकता है. (यह एक तरह की म्यूटेशन प्रक्रिया होती है.) ऐसा वह बैक्टीरिया की तुलना में काफी तेजी से करता है. इससे उसमें नए वातावरण में खुद को ढाल देने की क्षमता भी आ जाती है. माना जा रहा है कि यही वजह है कि यह वायरस चमगादड़ से मनुष्यों तक पहुचने और उनमें फैलने में कामयाब हो सका.

यह है बड़ी दिक्कत
वायरस के पास खुद का सेल जैसा कोई स्ट्र्क्चर कोई ढांचा नहीं होता. वे मनुष्य की ही सेल का उपयोग करते हैं. इस तरह वे हमारे साथ ही घुलमिल जाते हैं. यही वजह है कि उनके लिए सटीक और प्रभावी दवा बनाना आसान नहीं है क्योंकि उनके मारने वाली दवा हमें ही नुकसान पहुंचा सकती हैं.

खुद में बदलाव ला सकता है कोरोना
ये वायरस तेजी से खुद में बदलाव ला सकते हैं जिसे म्यूटेशन (Mutation) कहा जाता है. इससे पिछला शोध बहुत काम का नहीं रह जाता है. यही वजह है कि शोध के मामले में हमें उनसे आगे जाना होगा. ताजा कोरोना वायरस अपने पिछले संस्करण सार्स से अलग जरूर है, लेकिन अब भी उनमें काफी समानताएं हैं जो शोधकर्ताओं के मददगार साबित हो सकती हैं.

तो क्या तेजी से खुद को बदल रहा है कोरोना
दरअसल हर वायरस में खुद को बदलने की क्षमता होती है. वे Evolve होते हैं यानि विकसित हो सकते हैं. कोरोना का यह संस्करण भी बदल रहा है, लेकिन पहले लग रहा था कि यह तेजी से बदल रहा है, पर ऐसा नहीं है.

बहुत ज्यादा नहीं है म्यूटेशन की दर
अच्छी बात यह है कि कोरोना के जीन्स फ्लू वायरस के जीनोम की टूट कर बिखरते नहीं हैं. टेक्सारकाना यूनिवर्सिटी के बेन्जामिन न्यूमैन का कहना है कि ऐसा कोरोना के मामले में नहीं है. हां यह हो सकता है कि छोटा बदलाव असर के मामले में बड़ा दिख रहा हो. कोरोना के कई अलग संस्करण बने इसके लिए उसे कम से कम एक साल का समय चाहिए होगा. तब तक समाधान निकल आएगा इसी संभावना बहुत ही ज्यादा है.

अब इतना नया भी नहीं रहा है यह वायरस
ला जोला इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी के संक्रमित रोग केंद्र के प्रमुख एलेसांद्रो सेटी (Alessandro Sette) भी मानते हैं कि नोवल कोरोना उतना नया (नोवल) नहीं हैं. अगर हम इसके कांटे वाले प्रोटीन ( जो इस क्राउन की तरह का आभास देते हैं) का तोड़ निकाल सके तो इससे हमारी प्रतिरोधी व्यवस्था (Immune System) को वायरस को पहचानने में आसानी होगी और वह इसका जल्दी से सफाया कर सकेगा.

तो कौन जीत रहा है यह रेस
इन तमाम बातों के बीच वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस वायरस से जल्द ही निपट लिया जाएगा और आने वाले समय में यह एक जुखाम जैसा एक मामूली वायरस बनकर रह जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए. बहराल अभी यह वायरस भले वैज्ञानिकों से आगे दिख रहा है लेकिन उसका मात खाना तय है इस पर सभी वैज्ञानिक एक मत दिख रहे हैं.

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First published: March 25, 2020, 10:55 AM IST
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