दुनियाभर के विमानों में अब कोरोना के बाद कौन सी सीट रखी जाएगी खाली

दुनियाभर के विमानों में अब कोरोना के बाद कौन सी सीट रखी जाएगी खाली
सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने को बहुत सी एयरलाइनें नए-नए तरीके सोच रही हैं

कोविड-19 (Covid-19) से बचाव के लिए सोशल डिस्टेंसिंग (social distancing) बनाए रखने को बहुत सी एयरलाइनें (airlines) नए-नए तरीके सोच रही हैं. जैसे कई कंपनियां बीच की सीट (empty middle seat in flights) खाली रखते हुए उड़ान शुरू कर सकती हैं. 

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 27, 2020, 1:36 PM IST
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कोरोना वायरस के संक्रमण से जूझ रहे कई देशों में लॉकडाउन खुलने की बात हो रही है. इसके साथ ही सभी तरह की यात्राएं भी शुरू हो जाएंगी. हवाई यात्रा भी इनमें से एक है. बता दें कि पूरी तरह से या आंशिक लॉकडाउन के बाद भी अधिकतर देशों ने अपनी सीमाएं और यहां तक कि घरेलू उड़ानें भी बंद कर रखी हैं ताकि संक्रमण न फैले. अब विमान सेवाएं दोबारा शुरू होने जा रही हैं. ऐसे में बीमारी से बचने के लिए कई कंपनियों ने फैसला किया कि वे फ्लाइट में बीच की सीट खाली रखेंगी. इनमें विदेशी विमान सेवाएं EasyJet, Alaska Airlines और Wizz Air शामिल हैं.

इसी बारे में टोक्यो की एक कंपनी एरो डिजाइन के डायरेक्टर डेनियल बैरन कहते हैं कि संकरी फ्लाइट में सिर्फ बीच की सीट खाली छोड़ने का विकल्प काफी नहीं लेकिन इसके अलावा फिलहाल कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है. एयरलाइन में केबिन डिजाइन पर काम कर रहे डेनिकल मानते हैं कि लंबे वक्त तक एक सीट खाली छोड़ना घाटे का भी सौदा रहेगा. लेकिन चूंकि सोशल डिस्टेंसिंग भी बनाए रखना जरूरी है इसलिए हो सकता है कि विमानों के किराए में फेरबदल दिखे.

कई कंपनियां बीच की सीट खाली रखते हुए उड़ान शुरू कर सकती हैं




सीटों के बीच सिर्फ 45 सेंटीमीटर दूरी
हालांकि बीच की सीट खाली रखने पर कोरोना के मामले में अपनाई जा रही दूरी का पालन नहीं हो सकेगा. फिलहाल कोरोना वायरस के मामले में माना जा रहा है कि कम से कम 2 मीटर यानी लगभग 6 फीट की दूरी दो लोगों के बीच होनी चाहिए. लेकिन अभी की फ्लाइट्स को देखें तो उनमें एक सीट लगभग 45 सेंटीमीटर चौड़ी होती है और तीनों ही सीटें एक दूसरे से सटी हुई होती हैं. यानी बीच की सीट खाली भी छोड़ दी जाए तो भी दो यात्रियों के बीच लगभग 45 सेंटीमीटर की ही दूरी होगी. वहीं 2 मीटर की सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए ऐसे बैठना होगा कि हर 26 सीटों के बीच केवल 4 ही यात्री बैठ सकें. यानी पूरी फ्लाइट में सिर्फ 15% सीट ही भरें.

बढ़ सकता है किराया 
इससे फ्लाइट के लोड फैक्टर पर काफी फर्क पड़ेगा. लोड फैक्टर के तहत किसी भी तरह के पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे बस, ट्रेन या हवाई जहाजों में ये देखा जाता है कि उसकी सीट या क्षमता के हिसाब से कितने लोग बैठे हैं और इसका कितना फायदा हो रहा है. हर ट्रांसपोर्ट की कुछ फिक्स्ड कॉस्ट होती है. ये कीमत सीट की टिकटों के बिकने पर वसूल होती है. जितने ज्यादा लोग होंगे, ईंधन की कीमत पर लगे पैसे उतने ही कम होंगे. यही वजह है कि पूरी तरह से भरे हुए ट्रांसपोर्ट को फ्यूल इफिशिएंट कहा जाता है. यही लोड फैक्टर है, जिससे ट्रांसपोर्ट अपनी लागत वसूलने के बाद प्रॉफिट भी देता है. अब विमान सोशल डिस्टेंसिंग के लिए कम यात्रियों को बिठाएंगे तो विमान कंपनियों के लिए फ्लाइट चलाना घाटे का सौदा हो जाएगा.

चूंकि सोशल डिस्टेंसिंग भी बनाए रखना जरूरी है इसलिए हो सकता है कि विमानों के किराए में फेरबदल दिखे


क्या है विशेषज्ञों का मानना
International Air Transport Association के मुताबिक साल 2019 में वैश्विक लोड फैक्टर 84% था. जबकि सिर्फ बीच की सीट खाली रखने पर ये घटकर 66.7% हो जाएगा. साथ ही ये उपाय अपनाने के बाद भी दो यात्रियों के बीच 45 सेंटीमीटर की ही दूरी होगी, जो किसी भी तरह से कोरोना संक्रमण के सोशल डिस्टेंसिंग नियम के करीब नहीं है.

दूसरे तरीके सुझाए जा रहे
यही वजह है कि सारी एयरलाइंस बीच की सीट खाली छोड़ने के पक्ष में भी नहीं हैं. उनका मानना है कि यात्रियों को सुरक्षित रखने के लिए कई दूसरे तरीके भी हो सकते हैं. बीबीसी की एक रिपोर्ट में एरो डिजाइन के डायरेक्टर डेनियल बैरन कहते हैं कि यात्री फ्लाइट में आएं, उससे पहले फ्लाइट की स्क्रीनिंग होनी चाहिए. साथ ही केबिन सैनेटाइजेशन हो सकता है. इसके अलावा यात्रियों को इस तरह से बैठाया जाए उनके बीच ज्यादा से ज्यादा मुमकिन दूरी रखी जा सके. कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए सारे यात्रियों और केबिन क्रू को मास्क पहनने का निर्देश हो.

कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए सारे यात्रियों और केबिन क्रू को मास्क पहनने का निर्देश हो सकता है


यूरोप में हवाई यात्रा के खिलाफ चल रही मुहिम
कई फ्लाइटों में खाने-पीने की सुविधा बंद हो चुकी है ताकि संक्रमण टाला जा सके. इन्हीं सब के बीच यूरोप में पहले से ही हवाई जहाज से यात्राओं को हतोत्साहित किया जा रहा है. खासकर Short-haul flight यानी बिना रुके चलने वाले वे जहाज जो 3 घंटे से कम में अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं, उन्हें रोकने के लिए एक मुहिम चलाई जा रही है. ये मुहिम स्वीडन से निकली मुहिम है, जिसमें छोटी दूरी की यात्रा के लिए इतना ईंधन लगाकर पर्यावरण को खराब करने के लिए विमान कंपनियों को लताड़ा जा रहा है. पर्यावरणविदों के अनुसार इससे ग्लोबल वॉर्मिंग हो रही है.

साल 2017 में शुरू हुई इस मुहिम को flygskam (फ्लाइट शेम) भी कहा जाता रहा है. इस मुहिम के बाद से बहुत से यात्रियों ने हवाई जहाज पर रेल जैसी सुविधा को तरजीह देना शुरू किया.

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