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अगर लक्षण नहीं दिख रहे हैं तो भी शरीर को नुकसान पहुंचाता है कोरोना

संक्रमण होने के बाद लक्षण न दिखें तो फिर भी शरीर पर बुरा असर होता है.

कई अध्ययनों से साफ हुआ है कि कोरोना के एसिम्टोमैटिक (Asymptomatic) मरीजों के इम्यून सिस्टम सहित शरीर को भी नुकसान होता है.

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नई दिल्ली. दुनिया भर में कोरोना वायरस (Corona virus) रुकने का नाम नहीं ले रहा है. इसके बारे में सबसे बुरी बात यह है कि इससे संक्रमित काफी लोगों में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. इस वजह से न तो ये लोग टेस्ट कराते हैं, न डॉक्टर की सलाह लेते हैं और न ही खुद को आइसोलेट या क्वारंटाइन करते हैं. इसी वजह से इसका संक्रमण नियंत्रित नहीं हो रहा है, लेकिन ताजा शोध बताते हैं कि इस तरह के एसिम्टोमैटिक (Asymptomatic) मरीजों पर भी बीमारी का बुरा असर होता है.

ऐसे मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी माना है कि इस तरह के एसिम्टोमैटिक मरीजों की संख्या 80 प्रतिशत तक हो सकती है. साथ ही यह भी माना है कि जिन लोगों में संक्रमित होने के बाद भी लक्षण दिखाई नहीं देते उनसे भी संक्रमण तेजी से फैलता है, बल्कि ज्यादा तेजी से फैलता है. लेकिन अब यह भी पता चला है कि जिन लोगों में लक्षण दिखाई नहीं देता, यह वायरस उनके शरीर को भी काफी नुकसान पहुंचाता है. बावजूद इसके कि मरीज को पता तक नहीं चलता है कि उसे क्या हो रहा है. बहुत से अध्ययनों में पता चला है कि एसिम्टोमैटिक मरीज भी कोरोना वायरस से जूझते हैं.

शोध भी कह रहा है यही बातें
द जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (JAMA) में प्रकाशित शोधपत्र के अनुसार चीन के वुहान शहर के शोधकर्ताओं ने कोविड-19 के लक्षण दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले मरीजों का अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि एसिम्टोमैटिक मरीजों में लक्षण नहीं दिखाई दिए, लेकिन टेस्टिंग से पता चला कि उनके शरीर को भी संक्रमण से नुकसान हुआ है.

इम्यून सिस्टम भी हुआ कमजोर
शोधकर्ताओं ने पाया कि एसिम्टोमैटिक मरीजों में CD4+T  लिम्फोसाइट की खपत कम हुई जिसका मतलब यह हुआ कि ऐसे मरीजों के इम्यून सिस्टम को कम नुकसान हुआ था. फिर भी वे बीमारी से अनजान रहे और उन्होंने खुद के लिए इलाज की मांग नहीं की और खुद को आइसोलेट नहीं किया या फिर वे स्वास्थ्य कर्मियों के द्वारा भी नजरअंदाज कर दिए गए होंगे.

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कोरोना वायरस उन्हीं लोगों को पहले संक्रमित करता है जो घर में ही आसपास रहते हों. ( (Photo-pixabay)


क्या अंतर रहा मरीजों में
अध्ययन में यह भी पाया गया कि एसिम्टोमैटिक मरीजों में लीवर में घावों की मात्रा कम है और सीटी स्कैन में ज्यादा तेजी से उनके फेफड़ों में सुधार दिखाई दिया. जहां सार्स कोव -2 वायरस ऐसे मरीजों के फेफड़ों में कुछ हद तक बढ़ता दिखा तो फेफड़े भी इससे सफलतापूर्वक जूझते नजर आए. इन मरीजों में खांसी और सांस लेने में परेशानी नहीं दिखाई दी, लेकिन सीटी स्कैन में साफ दिखा कि कहां वायरस की  संख्या बढ़ रही थी.

इस अध्ययन में भी पाई गई ये बात
इसी तरह के एक शोध मे जो द लैनसेट में प्रकाशित हुआ था, हॉन्गकॉन्ग के शोधकर्ताओं  ने उन मरीजों का अध्ययन किया जो डायमंड प्रिंसेस क्रूज जहाज पर संक्रमित हुए थे. यहां भी शोधकर्ताओं ने पाया कि एसिम्टोमैटिक मरीज संक्रमण फैला सकते हैं और अगर वे बार बार संक्रमित हुए तो उनके भी फेफड़ों को बहुत नुकसान हो सकता है. पाया गया था कि नौ में से छह मरीज ऐसे थे जिनमें जहाज छोड़ने के बाद क्वारंटाइन के 14 दिनों तक कोई लक्षण नहीं दिखाई दिया. पाया गया कि ऐसे मरीज संक्रमण फैला सकते हैं जबकि लक्षण दिखने वाले मरीज कम ही संख्या में हैं. एसिम्टोमैटिक मरीजों के कारण ही अमेरिका, रूस, यूके, ब्राजील और दूसरे यूरोपीय देशों में यह संक्रमण तेजी से फैलता गया.

Coronavirus
एसिम्टोमैटिक मरीजों का अब तक नजरअंदाज किया जाता रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)(प्रतीकात्मक फोटो)


इन शोधों और अन्य अध्ययनों से जाहिर हुआ है कि एसिम्टोमैटिक मरीजों में भले ही कोविड-19 के लक्षण स्पष्ट तौर पर न दिखाई देते हों,  उनकी जानकारी के बिना ही उनका शरीर इस बीमारी से जूझता रहता है. वायरस उनके फेफड़ों में फैलता है और उनके इम्यून सिस्टम को भी प्रभावित करता है. और ये दूसरों को तो संक्रमित कर ही सकते हैं. इसी लिए सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क की अहमियत अब भी बहुत ज्यादा है.

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