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Coronavirus: चांसलर एंगेला मर्केल वैज्ञानिक हैं, क्या इस वजह से जंग जीत रहा है जर्मनी

Coronavirus: चांसलर एंगेला मर्केल वैज्ञानिक हैं, क्या इस वजह से जंग जीत रहा है जर्मनी

जर्मनी की कोरोना से जंग में जीत का श्रेय एंगेला मर्केल को दिया जा रहा है

जर्मनी की कोरोना से जंग में जीत का श्रेय एंगेला मर्केल को दिया जा रहा है

पड़ोसी देशों के मुकाबले जर्मनी (Germany) में कोरोना (corona) के कारण होने वाली मौत की दर काफी कम है. इसकी वजह वहां की चांसलर एंगेला मर्केल (Angela Merkel) की रणनीति तो है ही, साथ में इसमें इस बात का भी योगदान है कि मर्केल खुद एक वैज्ञानिक (scientist) रही हैं.

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    कोरोना संक्रमण के मामले में जर्मनी पांचवे नंबर पर है. यहां लगभग डेढ़ लाख लोग कोरोना पॉजिटिव हैं. ये आंकड़ा चौथे नंबर पर खड़े देश फ्रांस के लगभग बराबर ही है. हालांकि तीनों ही यूरोपियन देशों स्पेन, इटली और फ्रांस में मौत की दर के मुकाबले जर्मनी में मौत का प्रतिशत काफी कम है. यहां अब तक कोरोना के कारण 5,086 मौतें हुई हैं. क्या वजह है कि संक्रमण दूसरे देशों की तरह तेजी से फैलने के बाद भी मृत्यु दर इतनी कम है? जर्मनी की कोरोना से जंग में जीत का श्रेय एंगेला मर्केल को दिया जा रहा है. वे राजनेता के साथ-साथ एक वैज्ञानिक की तरह भी इस वायरस को ट्रीट कर रही हैं.

    क्वांटम केमेस्ट्री में ली डिग्री
    मर्केल के वैज्ञानिक पक्ष को कम ही लोग जानते हैं. साल 1954 में पश्चिमी जर्मनी में जन्मी मर्केल के पिता लूथरन पादरी थे. वे मार्टिन लूथर किंग के विचारों पर चलने वाले थे, जो क्रिश्चियनिटी को नहीं मानते. अलग आस्था के कारण मर्केल के पिता पर हरदम सख्त पहरा रहा. इसी बीच नन्ही मर्केल की पढ़ाई-लिखाई चलती रही. मर्केल की जीवनी पर काम कर रहे Stefan Kornelius के मुताबिक उन्होंने घर पर सख्त निगरानी के बाद भी अपना ध्यान अपनी ही पढ़ाई पर रखा. 1989 में मर्केल क्वांटम केमेस्ट्री में डाक्टरेट कर चुकी थीं. उन्होंने बतौर रिसर्चर काम की शुरुआत ही की थी कि तभी बर्लिन की दीवार ढहा दी गई. इस घटना के बाद मर्केल ने विज्ञान छोड़ा और राजनीति में आने का इरादा बना लिया. एक छोटे से राजनैतिक ग्रुप से शुरुआत कर एंगेला साल 2005 में जर्मनी की चांसलर बन गईं.

    साल 1989 में मर्केल क्वांटम केमेस्ट्री में डाक्टरेट कर चुकी थीं


    एंगेला का जर्मन सरकार के सबसे अहम ओहदे पर आना हैरानी की बात है क्योंकि वे पढ़ाई और पेशे से भी वैज्ञानिक ही रहीं. दूसरे राजनेताओं की तरह उनके पास कानून या सिविल सर्विस का कोई अनुभव नहीं था. हालांकि उनका यही वैज्ञानिक बैकग्राउंड अब पूरे देश के काम आ रहा है.

    रिसर्च के बाद किया जनता को संबोधित
    28 जनवरी को जर्मनी में कोरोना का पहला मरीज आया लेकिन हालात बिगड़ने शुरू हुए मार्च से. धीरे-धीरे देश में बंदी होने लगी. 18 मार्च को चांसलर ने देश की जनता को संबोधित किया. जर्मनी और यूरोपियन यूनियन के झंडों के बीजच बैठी मर्केल ने स्पीच में एक वैज्ञानिक की तरह सारे तथ्य दिए. साथ में ये भी कहा कोरोना काल दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी का सबसे मुश्किल वक्त है. इसके साथ ही प्रतिबंधों के बीच टेस्टिंग की तैयारी होने लगी. अपील की गई कि सार्वजनिक जगहों पर तीन से ज़्यादा लोग एक साथ नहीं रह सकते. कंप्लीट शटडाउन न होते हुए भी मर्केल की समझाइश के कारण लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया.

    कंप्लीट शटडाउन न होते हुए भी मर्केल की समझाइश के कारण लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया


    टैक्सियों में हो रहा था टेस्ट
    जर्मनी ने शुरू से ही टेस्टिंग को प्राथमिकता दी. यहां जांच के लिए लोगों को अस्पताल आने की जरूरत नहीं, बल्कि यहां टेस्टिंग टैक्सियां (corona taxis) चलने लगीं जो मर्केल के दिमाग की उपज है. ये घर-घर पहुंचकर लोगों की कोरोना जांच करने लगी. वहां लोगों से कहा गया कि अगर आपको कोरोना के लक्षण दिखें तो घबराकर भागने की बजाए सीधे पास के अस्पताल फोन करें. वहीं से हेल्थ वर्कर आकर संदिग्ध की जांच करेंगे. आम लोगों के साथ-साथ डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के लक्षणों पर भी नजर रखी गई और हल्का सा भी लक्षण दिखने पर टेस्ट किया गया. इससे हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स भी कोरोना की चपेट में आने से बचे रहे.

    लगातार हुई जांच
    अपने पड़ोसी देशों की तुलना में जर्मनी में आए कोरोना के मामलों में एजग्रुप अलग था. यहां कोरोना पीड़ितों की औसत आयु 47 साल है, जबकि इटली और चीन जैसे देशों में वायरस 60 से ऊपर वालों को ज्यादा प्रभावित कर रहा है. माना जा रहा है कि यहां पर शुरुआती मामले ऑस्ट्रिया और इटली के स्की रिजॉर्ट से फैले. यही वजह है कि यहां पर हल्के लक्षणों वाले लोगों को भी क्वारंटाइन में रखने की बजाए सीधे जांच की गई. ये सारी जांचें मुफ्त होती रहीं. हर हफ्ते यहां 350,000 जांचें हो रही हैं, जो अपने में एक रिकॉर्ड है.

    यहां जांच के लिए लोगों को अस्पताल आने की जरूरत नहीं, बल्कि यहां टेस्टिंग टैक्सियां (corona taxis) चलने लगीं


    मौत की दर कम
    4 अप्रैल तक जर्मनी में 92,000 लोगों के टेस्ट नतीजे कोरोना पॉजिटिव आ चुके थे. Johns Hopkins University के मुताबिक ये आंकड़े यूएस, इटली और स्पेन के बाद सबसे ज्यादा थे. इतने संक्रमण के बाद भी जर्मनी में मौत की दर पर तेजी से नियंत्रण किया गया. यहां फेटेलिटी रेट अब भी यूएस, इटली, स्पेन और फ्रांस से कम है. यहां तक कि यूके में संक्रमण की दर जर्मनी से कम होने के बाद भी वहां कोरोना से मरने वालों की संख्या तीन गुनी है. इसके अलावा साउथ कोरिया, जिसे कोरोना से मुकाबले में दुनिया मॉडल की तरह देख रही है, वहां भी मौत का प्रतिशत 1.7% रहा, जबकि जर्मनी में ये 1.4% है.

    महीनेभर में ICU की संख्या बढ़ी
    जर्मनी का मजबूत हेल्थकेयर सिस्टम भी कोरोना संक्रमण रोकने में असरदार रहा. यहां तेजी से intensive care beds (ICU) का इंतजाम हुआ. जनवरी में पूरे देश में 28,000 आईसीयू बेड थे, जिनके साथ वेंटिलेटर था. यानी जनसंख्या के हिसाब से हर 1 लाख पर 34 बेड. अब इस देश में 40,000 आईसीयू बेड हैं. इन सारी वजहों के साथ-साथ चांसलर का जनता से लगातार और सीधा संवाद भी यहां कोरोना से जीतने की वजह दिख रहा है. विज्ञान की पृष्ठभूमि होने के कारण मर्केल हर संवाद में वैज्ञानिक तथ्य दे रही हैं ताकि जनता में डर की बजाए जानकारी आए.

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    Tags: Corona epidemic, Corona infection, Corona positive, Coronavirus, Coronavirus Epidemic, Coronavirus in India

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