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दास्तां उस लड़की की, कोरोना ने स्कूल के साथ जिसके सपनों पर भी ताला लगा दिया

स्कूलबंदी के कारण घर बैठी लड़कियों की कम उम्र में शादी का खतरा बढ़ा है- सांकेतिक फोटो (pxhere)

स्कूलबंदी के कारण घर बैठी लड़कियों की कम उम्र में शादी का खतरा बढ़ा है- सांकेतिक फोटो (pxhere)

कोरोना वायरस (coronavirus) अब सेहत या अर्थव्यवस्था से जुड़ा मुद्दा नहीं रहा, बल्कि इसका असर दूर तक जाएगा. खासकर स्कूलबंदी के कारण घर बैठी लड़कियां कमउम्र में शादी का खतरा झेल रही हैं. माधवी भी उनमें से एक हैं.

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    कहते हैं, सपने देखने पर ही पूरे होते हैं. मैंने भी एक सपना देखा- पुलिस अफसर बनने का. चुस्त वर्दी और कड़क लहजे का. लेकिन बीते महीने जब चाइल्डलाइन को अपनी शादी रोकने के लिए फोन किया, तो आवाज भरभरा रही थी. और वर्दी के नाम पर वो कपड़े थे, जो संदूक में भरे ससुराल जाने का इंतजार कर रहे थे. कोरोना ने स्कूल पर तो ताला लगवाया ही, मेरे सपनों की भी तालाबंदी हो गई.

    ये कहानी है उत्तरप्रदेश के कुशीनगर की 15 साला बच्ची माधवी (नाम बदला हुआ) की, जिसकी शादी 40 बरस के अनदेखे शख्स से होनी थी. बच्ची ने हिम्मत दिखा शादी तो तुड़वा दी लेकिन अब उसके सपने भी टूटने की कगार पर हैं. स्कूल बंद है. हाथ से मोबाइल छीना जा चुका. कुरेदने पर माधवी कहती है- अब घरवाले खेती-बाड़ी करवाएंगे, जब तक कहीं और शादी पक्की न हो जाए.

    कोविड-19 केवल सेहत या अर्थव्यवस्था पर असर नहीं डाल रहा, बल्कि इसका प्रभाव मानवीय विकास पर दूर तक जा सकता है. स्कूली लड़कियों की पढ़ाई इनमें से एक पहलू है जो बुरी तरह से प्रभावित होगी. कई संस्थाएं इस बारे में लगातार सर्वे करते हुए सचेत कर रही हैं. अनुमान है कि कम और मध्यम आयवर्ग के देशों के सेकेंडरी स्कूल में पढ़ रही करीब दो करोड़ लड़कियां कोरोना खत्म होने के बाद भी स्कूल नहीं लौट सकेंगी. खासकर 12 से 17 साल की लड़कियों पर ये खतरा ज्यादा है. उनकी या तो जल्दी शादी हो जाएगी या फिर घरेलू कामों में लगा दिया जाएगा.

    बहुत सी लड़कियां कोरोना खत्म होने के बाद भी स्कूल नहीं लौट सकेंगी- सांकेतिक फोटो


    ये केवल कागजों पर लिखे आंकड़े नहीं, बल्कि हकीकत में ये दिखने भी लगा है. माधवी उन बच्चियों में से एक है, जो कोरोना का अलग ही साइड इफेक्ट झेल रही हैं.

    वे बताती हैं, सालभर पहले जिंदगी कुछ और थी. सहेलियों के साथ 9.30 पर स्कूल के लिए निकलना होता. उससे पहले घर के ढेरों काम निपटाने होते. किसान घर से हूं तो खेती-बाड़ी के दसियों काम होते. अगर फसल का मौसम न हो तो घर के काम हम लड़कियों का इंतजार करते हैं. खाना पकाना, बड़े से आंगन की सफाई, कपड़े-लत्ते धोना. इसी बीच अपने लिए भी दो रोटियां पका लेती और खाकर स्कूल के लिए भागती.

    जाते-जाते भी पीछे से मां या भाभी टोक ही देते. कभी खेत गोड़ना है. कभी मेहमान आ रहे हैं. कभी और कुछ नहीं तो घर की सफाई ही मुझे स्कूल से रोकने का बहाना बन जाती. जो भी था, ये उम्मीद थी कि चलो आज न सही, कल स्कूल जाऊंगी.

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    काम निपटा जल्दी स्कूल पहुंचने का छोटा रास्ता खोज निकाला था. पगडंडियों, खेतों से होते हुए स्कूल पहुंचते. कई लड़कियों के पास साइकिल थी लेकिन हम पैदल ही उनसे तेज भाग लेते. चाहे पसीने में भीग जाएं लेकिन मजाल कि कभी घंटी बजने के बाद स्कूल पहुंचे हों.

    घर से अलग दुनिया थी वहां की. गणित-विज्ञान पढ़ते हुए घर का चौका-बर्तन भूल जाते. हल-बैल संभालने से मजबूत हुए हाथ खेल के समय में सबको पटखनी दे देते. क्लास में ढेरों लड़कियां थीं. किस्म-किस्म की बातें करतीं. बहुतों का सपना शादी करके घर संभालना था. कोई टीचर बनने की सोचती. मैं पुलिस अफसर बनना चाहती थी. पहले सहेलियां मजाक बनातीं कि लड़की जात का पुलिस में जाना आसान नहीं. लेकिन मैं रोज दोहराती. और धीरे-धीरे सब मुझे पुलिस की वर्दी में सोचने लगीं. ये पहली जीत थी. अब मेरा सपना कई आंखों में उतर चुका था.

    माधवी उन बच्चियों में से एक है, जो कोरोना का अलग ही साइड इफेक्ट झेल रही हैं- सांकेतिक फोटो


    साल 2020. एकदम से वक्त का पहिया तेजी से कई साल आगे निकल गया. घरवाले पहले से ही मेरे रिश्ते की बात कर रहे थे लेकिन शादी मेरे 18 के होने के बाद होनी थी. मुझे यकीन था कि तब तक मैं कोई न कोई रास्ता निकाल लूंगी. लेकिन इस साल ने सारी आस लील ली. घर बैठी बच्ची भी घरवालों को जवान बोझ लगने लगती है. मेरे साथ भी यही हुआ. मेरा रिश्ता हो गया. न लड़का मुझसे मिला, न मुझे ही उसकी तस्वीर दिखाई. बस बात पक्की हो गई.

    मेरे रोने-धोने पर सालों पुरानी तस्वीर दिखाते हुए बताया गया कि दूल्हा विदेश में है. फिर किसी ने चुपके से राज खोला, वो 40 साल का है और सऊदी में जाने क्या करता है! मैं परेशान तो हुई लेकिन इरादों ने तब भी दम नहीं तोड़ा. ससुराली रस्मों में साड़ी-लत्ते-गहनों के बीच के साथ एक मोबाइल फोन भी चमक रहा था. मैंने फटाफट उसे उठा लिया. ये फोन होने वाले दुल्हे ने मुझसे बात करने के लिए दिया था. मैंने सोचा- ठीक है. जब रिश्ता तय हो चुका है तो बात कर लूंगी. उसे देख भी लूंगी और पढ़ने की अपनी इच्छा भी बताऊंगी.

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    ऐसा हो नहीं सका. मेरी तरफ से गया कोई फोन वो नहीं उठाता था. अपनी मर्जी से हफ्ता-दस दिन में कभी कॉल करे तो भी एक-दो बात के बाद फोन रख देता. सपने सुनने-सुनाने की बात दूर, उसके पास मामूली बातें सुनने का भी वक्त नहीं था. वीडियो कॉल किया तो तुरंत काट दिया और फिर सख्त लहजे में हिदायत मिली कि मुझे दोबारा कभी वीडियो कॉल मत करना.

    मैंने इंटरनेट पर देखकर चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर पर कॉल किया- सांकेतिक फोटो


    खुटका-सा लगा. तिगुनी उम्र का है, ये तो जानती हूं लेकिन क्या कोई खोट भी है! जानने का कोई तरीका था नहीं. तो मोबाइल का मैंने पढ़ने में इस्तेमाल शुरू कर दिया. स्कूल में ऑनलाइन पढ़ाई चालू थी. मैं क्लास करने लगी. मैडम वॉट्सएप पर होमवर्क भेजतीं, मैं खूब मन लगाकर करती. स्कूल बंद था लेकिन मोबाइल मेरा स्कूल बन गया. बिना कमरों का, जहां स्कूल की घंटी नहीं बजती और पगडंडी पार कर भागना नहीं होता था.

    पढ़ने के बीच घरवाले काम की टेर लगाते. बार-बार उठती. कभी हाथ गोबर से सने होते तो कभी ऊंगलियां सब्जी काटते हुए चिरी रहतीं. कोरोना से पहले स्कूल था तो 5 घंटे की दुनिया अलग ही थी. बस लड़कियां होतीं, टीचर होते और ब्लैक बोर्ड. अब घर पर रहने पर भी दिनभर में मुश्किल से घंटाभर पढ़ पाती. या कई बार उससे भी कम.

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    इस बीच शादी की तारीख आ गई. 8 दिसंबर. होने वाले पति को कॉल किया. उसने रूखी-सी आवाज में घर के कामों में और पक्का होने की हिदायत दी. मैं समझ गई कि दिसंबर बाद कभी किताबें नहीं देख सकूंगी. सारा दिन घरवालों को मनाते-रोते बीतता. सबने एक सुर में मना कर दिया. दिन सरक रहे थे. उम्मीद टूटती जा रही थी. मैंने मोबाइल खंगालना शुरू किया. सुना था कि लड़कियों की मदद को एक नंबर सरकार ने दिया है. नंबर मिला. चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर. मौका देखकर मैंने फोन कर दिया.

    अगली सुबह वो लोग घर पर थे. शादी रोकने की बात की तो घरवालों ने उल्टा उन्हें ही धमकाना शुरू कर दिया. मेरी उम्र का नया सर्टिफिकेट बनवाकर मेरी शादी किसी दूसरे शहर से कराने की बात कर डाली. मैं घर से निकल स्थानीय विधायक और एनजीओ तक चली गई. मदद मिली. कम से कम इतनी कि शादी टूट गई.

    साड़ी-गहनों के साथ वो लोग मोबाइल भी वापस ले गए- सांकेतिक फोटो (pxhere)


    साड़ी-गहनों के साथ वो लोग मोबाइल भी वापस ले गए. घरवाले दिनभर झींकते हैं कि शादी काटकर लड़की ने बदनामी कर दी. हाथ में किताबों की जगह दिनभर कोई न कोई काम थमा दिया जाता है.

    15 साल की माधवी बुढ़ा चुकी आवाज में कहती हैं- खबरों में रोज कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा आता है. लेकिन हम जैसी लड़कियों का दर्द इसका हिस्सा नहीं, जो रोज अपने सपनों की मौत देख रही हैं.

    आंकड़ों पर लौटें तो लड़कियों के साथ जमीनी स्तर पर काम कर रही कई संस्थाओं ने उत्तरप्रदेश के हालात खंगालने की कोशिश की. इसमें दिखा कि राज्य की हर दो में से एक लड़की कोविड-19 के खत्म होने के बाद भी स्कूल लौट पाने को लेकर अनिश्चित है. यह बात राइट टू एजुकेशन फोरम (RTE Forum), सेंटर फॉर बज़ट एंड पॉलिसी स्टडीज (CBPS) और चैंपियंस फॉर गर्ल्स एजुकेशन (Champions for Girls' Education) की ओर से कराए गये एक सर्वे में सामने आई.

    ‘लाइफ इन द टाइम ऑफ कोविड-19: मैपिंग द इंपैक्ट ऑफ कोविड-19 ऑन द लाइव्स एंड एजुकेशन ऑफ चिल्ड्रन इन इंडिया’ नाम के इस सर्वे को देश के 5 राज्यों में किया गया, उत्तरप्रदेश जिनमें से एक था. लड़कियों का कहना है कि उनके कहीं आने-जाने पर लगभग पूरी तरह से रोक लग चुकी है. इनमें से 75% मानती हैं कि 'कोविड-19 से पहले जिंदगी बेहतर थी.' बातचीत के दौरान सबसे डराने वाली बात ये दिखी कि 54% लड़कियां महामारी खत्म होने के बाद अपने स्कूल लौटने को लेकर निश्चित नहीं हैं.

    (Interview Coordination - Right to Education Forum, Uttar Pradesh)

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