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Coronavirus: भारतीय वैज्ञानिकों ने तेज की जीनोम सीक्‍वेंसिंग, इस जेल से रुकेगा कम्‍युनिटी ट्रांसमिशन

News18Hindi
Updated: April 9, 2020, 2:18 PM IST
Coronavirus: भारतीय वैज्ञानिकों ने तेज की जीनोम सीक्‍वेंसिंग, इस जेल से रुकेगा कम्‍युनिटी ट्रांसमिशन
भारतीय वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के हर पहलु को समझने के लिए इसकी जीनोम सीक्‍वेंसिंग की रफ्तार तेज कर दी है.

भारतीय वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस की जीनोम सीक्‍वेंसिंग (Genom sequencing) तेज कर दी है ताकि इसके अलग-अलग पहलुओं को समझा जा सके. वहीं, आईआईटी बॉम्‍बे ने डॉक्‍टरों और हेल्‍थ वर्कर्स को कोरोना वायरस (Coronavirus) से बचाने के लिए नैसल जेल बनाने की दिशा में काम शुरू कर दिया है.

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कोरोना वायरस के कारण पूरी दुनिया में अब तक 15 लाख से ज्‍यादा लोग संक्रमित हुए हैं. इनमें 88 हजार से ज्‍यादा लोगों की मौत हो चुकी है. ऐसे में दुनिया भर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता दिनरात इसके हर पहलू पर काम कर रहे हैं. वे इसकी संरचना से लेकर इसके कारगर इलाज (Treatment) तक की खोज में जुटे हैं. इसी क्रम में शोधकर्ताओं ने इसके स्‍ट्रेन (Strain) को अलग करने में सफलता पाई. कई देशों में इसकी वैक्‍सीन (Vaccine) का परीक्षण शुरू हो गया है. भारत (Coronavirus in India) में भी अब तक कोरोना के मरीजों की संख्या 5,734 हो चुकी है. वहीं, मरने वालों का आंकड़ा 166 तक पहुंच गया है. ऐसे में भारतीय वैज्ञानिकों ने भी इसके अलग-अलग पहलुओं को समझने के लिए कोरोना वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग (Genom Sequencing) तेज कर दी है. काउंसिल ऑफ साइंटफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) के दो संस्थानों ने इसके लिए साझा प्रोजेक्ट शुरू किया है.

ये दोनों संस्‍थान कर रहे हैं जीनोम सीक्‍वेंसिंग का काम
कोरोना वायरस की जीनोम सीक्‍वेंसिंग करने वाले दोनों संस्‍थानों का दावा है कि तीन से चार सप्‍ताह में 300 तक सैंपल जुटाने पर भारत में वायरस के व्यवहार का आकलन जारी कर दिया जाएगा. हैदराबाद के सेंटर ऑफ सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) के डायरेक्‍टर डॉ. राकेश मिश्र ने बताया कि जीनोम सीक्वेंसिंग के जरिये वायरस के विकास, बदलते स्वरूप, पैदा होने की जगह, खतरनाक स्‍वरूप जैसी अहम चीजों को समझने में मदद मिलेगी. इस काम में दिल्‍ली का जीनोमिक्स और इंटीग्रेटेड बायोलॉजी संस्थान सीसीएमबी की मदद कर रहा है. इससे ये भी समझा जा सकेगा कि भविष्य में वायरस के किस तरह से विकसित होगा और तब इसकी संरचना, असर कैसा होगा.

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पुणे के नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से भी सीक्‍वेंसिंग सेंटर्स को सैंपल भेजने को कहा गया है.




सीक्‍वेंसिंग सेंटर्स तक पहुंचाए जा रहे हैं वायरस के सैंपल


शोध के लिए संक्रमित रोगियों से वायरस के सैंपल लेकर सीक्वेंसिंग केंद्रों पर पहुंचाए जा रहे हैं. पुणे के नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) से भी सैंपल भेजने को कहा गया है. बता दें कि एनआईवी ने ही कोरोना वायरस के स्‍ट्रेन को अलग करने में सफलता हासिल की थी. माना जा रहा है कि इसके स्‍ट्रेन को अलग करने के बाद कोरोना वायरस की वैक्‍सीन बनाने में काफी मदद मिलेगी. डॉ. रोकेश मिश्रा के मुताबिक, सटीक नतीजे हासिल करने के लिए कम से कम 300 सैंपल की जरूरत होती है. उन्होंनेअनुमान लगाया कि अगले चार हफ्तों में इतने सैंपल इकट्इे कर लिए जाएंगे. इसके बाद इन सैंपल्‍स के आधार पर भारत में लोगों को संक्रमित कर रहे वायरस के व्यवहार की काफी जानकारियां पता की जा सकेंगी.

जेल से कम्‍युनिटी ट्रांसमिशन को रोकने में मिलेगी मदद
संक्रमितों का इलाज कर रहे डॉक्‍टर्स और पैरा मेडिकल स्टाफ को कोरोना वायरस से बचाने के लिए भारत में एक जेल भी तैयार किया जा रहा है. इस जेल को लगाने से वायरस शरीर में दाखिल ही नहीं हो पाएगा. दरअसल, इस जेल को नाक (Nasal Gel) में लगाया जाएगा, जिसके बाद वायरस से पूरी तरह बचाव किया जा सकेगा. विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत आने वाला साइंस एंड इंजीनियरिंग बोर्ड कोरोना वायरस से बचाव और उसे निष्क्रिय करने वाली इस तकनीक को तैयार करने के लिए जैव विज्ञान व जैव इंजीनियरिंग विभाग (DBB) तथा आईआईटी, बॉम्‍बे की मदद कर रहा है. अगर ये जेल बनाने में सफलता मिल जाती है तो वायरस के कम्‍युनिटी ट्रांसमिशन को भी रोका जा सकेगा. हालांकि, इस शोध को पूरा होने में नौ महीने लग सकते हैं.

आईआईटी बॉम्‍बे कोरोना वायरस से बचाव के लिए खास जेल बना रहा है, जिसे नाक में लगाया जा सकेगा.


दो चरणों में वायरस को रोकने पर किया जा रहा है काम
शोधकर्ता पहले चरण में ऐसी कोशिकाओं को निष्क्रिय करने पर काम कर रहे हैं, जिन्हें कोरोना वायरस हमारे शरीर में घुसने के बाद कॉलोनी बनाने में इस्‍तेमाल करता है. आसान शब्‍दों में समझें तो इस जैल के जरिये उन कोशिकाओं को निष्क्रिय किया जाएगा, जिनकी मदद लेकर वायरस शरीर के अंदर अपनी संख्‍या बढाकर कैरियर को बीमार कर देता है. आईआईटी बॉम्बे की टीम ने वायरस के संक्रमण को दो चरणों में रोकने की रणनीति बनाई है. ये वायरस सबसे पहले फेफड़ों (Lungs) की कोशिकाओं में अपनी संख्‍या में वृद्धि करता रहता है. इसलिए रणनीति का पहला हिस्‍सा वायरस को शरीर की कोशिकाओं के साथ जुड़ने से रोकना है. दूसरे चरण में जैविक अणु (Organic Molecules) शामिल किए जाएंगे, जिससे डिटर्जेंट की तरह वायरसों को जेल में फंसाकर निष्क्रिय किया जाएगा.

दूसरे चरण की रणनीति के तहत बना रहे हैं नैसल जेल
आईआईटी बॉम्‍बे की टीम कोरोना वायरस के खिलाफ दूसरे चरण की रणनीति के तहत ही जेल बना रहा है, जिसे नाक में लगाया जा सकता है. आईआईटी बॉम्बे की टीम में प्रोफेसर किरण कोंडाबगील, प्रोफेसर रिंती बनर्जी, प्रोफेसर आशुतोष कुमार और प्रोफेसर शमिक सेन हैं. इस टीमको विषाणु विज्ञान, संरचनात्मक जीव विज्ञान, जैव भौतिकी, बायोमैटेरियल्स और दवा वितरण क्षेत्रों का अच्‍छा अनुभव है. डीएसटी के सचिव आशुतोष शर्मा ने कहा कि कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ रहे हमारे स्वास्थ्यकर्मी और दूसरे योद्धा 200 प्रतिशत सुरक्षा के हकदार हैं. नैसल जेल को अन्य सुरक्षात्मक उपायों के साथ विकसित किया जा रहा है, जिससे उन्हें अतिरिक्‍त सुरक्षा मिल सके.

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First published: April 9, 2020, 11:35 AM IST
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