कोरोना वायरस में म्यूटेशन को खतरनाक क्यों नहीं मान रहे हैं एक्सपर्ट्स?

कोरोना वायरस में म्यूटेशन को खतरनाक क्यों नहीं मान रहे हैं एक्सपर्ट्स?
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हाल में एक रिसर्च में कहा गया था कि कोरोना वायरस म्यूटेट (Corona Virus Mutation) होकर और ज्यादा खतरनाक हो सकता है. लेकिन कई एक्सपर्ट्स का ये भी मानना है कि वायरस का म्यूटेशन बहुत चिंता वाली बात नहीं है.

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अब जब कोरोना वायरस दुनियाभर को अपनी गिरफ्त में ले चुका है तब ये भी चिंता जाहिर की जाने लगी है कि ये म्यूटेट होकर और ज्यादा खतरनाक हो सकता है. यानी अब इस वायरस की संक्रमण फैलाने की शक्ति ज्यादा बढ़ सकती है, साथ ही इसके संक्रमण का असर और ज्यादा गंभीर हो सकता है. लेकिन कई एक्सपर्ट्स का ये भी मानना है कि वायरस का म्यूटेशन बहुत चिंता वाली बात नहीं है.

कोरोना की वैक्सीन तैयार करने में तेजी के साथ लगी कुछ दवा कंपनियों ने भी इसे बहुत तवज्जो नहीं दी है. जर्मनी की एक बड़ी फार्मा कंपनी के सीईओ Ugur Sahin का कहना है-'हम अभी ऐसे म्यूटेशन नहीं देख रहे हैं जो वैक्सीन के दायरे में न आएं.' एक और फार्मा कंपनी Moderna Inc के चीफ मेडिकल ऑफिसर ने भी कुछ मिलती-जुलती प्रतिक्रिया ही दी है. आइए जानते हैं म्यूटेशन को लेकर ज्यादा चिंता क्यों और कब बढ़ी.

नई रिसर्च ने बढ़ाई चिंता
दरअसल पिछले सप्ताह अमेरिका की Los Alamos National Laboratory में हुई एक नई रिसर्च ने म्यूटेशन को लेकर चिंता जाहिर की. इस रिसर्च में नए म्यूटेशन D614G और S943P को लेकर चिंता जाहिर की गई.
स्टडी के ट्रेंड बता रहे हैं कि D614G वुहान से निकला और यूरोप पहुंचते हुए ये नए वातावरण में न सिर्फ एडजस्ट हो गया, बल्कि खतरनाक हो गया. वैज्ञानिकों को डर है कि अगर ये और घातक हुआ तो एक बार कोरोना संक्रमित हो चुके लोगों के शरीर में बनी एंटीबॉडी बेकार हो जाएगी और वे दोबारा संक्रमित हो सकते हैं. वायरस का दूसरा म्यूटेशन S943P कई दूसरे स्ट्रेन्स के साथ मिलकर काम कर रहा है. हालांकि इसके बढ़ने की गति काफी कमजोर है.



Los Alamos National Laboratory


कैसे होता है म्यूटेशन
ब्रिटिश अखबार द गार्जियन की एक रिपोर्ट कहती है कि सभी वायरस म्यूटेट होते हैं यानी अपना रूप बदलते हैं और नया सार्स-कोविड19 भी अलग नहीं है. म्यूटेशन तब होता है जब वायरस किसी दूसरी कोशिका या फिर कहें इंसान में प्रवेश करता है. प्रवेश के बाद वह उस शरीर में प्रसार की प्रक्रिया के तहत नए वायरस पैदा करता है. लेकिन इस प्रक्रिया में कभी-कभी गड़बड़ी आ जाती है.

दूसरे वायरस पैदा करने के दौरान अगली पीढ़ी के लिए मूल जेनेटिक मैटेरिलय या कहें कोड ट्रांसफर करने में गलती हो जाती है. ऐसे में जो नया वारयस पैदा होता है उसमें जेनेटिक कोड अपनी पूर्व पीढ़ी से अलग होता है. नतीजतन नया वायरस अपने वंश के वायरस के लक्षणों से अलग लक्षणों वाला होता है. दरअसल इंसानी शरीर के जीन्स का डीएन का स्ट्रक्चर दो रेखीय होता है जबकि कोरोना वायरस का जीन्स एक रेखीय आरएनए से निर्मित होता है.

एक्सपर्ट्स का कहना, चिंता की बात नहीं
जब इस म्यूटेशन को लेकर कई जगह चिंता जताई जाने लगी तब अन्य एक्सर्पट्स ने भी अपनी राय दी है. दुनिया में डायग्नोस्टिक के क्षेत्र में बड़ी कंपनी Roche Holding AG का कहना है कि वो कोरोना में ऐसा कोई म्यूटेशन नहीं देख रहे हैं जो उनके वैक्सीन ट्रायल की एक्यूरेसी में शामिल नहीं होगा. साथ ही Los Alamos National Laboratory में म्यूटेशन पर हुई रिसर्च की आलोचना इस बात को लेकर भी की जा रही है कि इस रिसर्च के रिजल्ट को बहुत कम लैब डेटा ही सपोर्ट कर रहे हैं. University of Iowa में वरिष्ठ रिसर्च स्कॉलर स्टैनली पर्लमैन का कहना है कि D614G म्यूटेशन का असर तो अलग पड़ सकता है, लेकिन ये कितना ज्यादा या कम गंभीर होगा अभी इस पर स्पष्टता नहीं है.

प्रतीकात्मक तस्वीर


म्यूटेशन का ये मतलब नहीं कि संक्रमण गंभीर होता जाएगा
वहीं कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की साइंटिस्ट Jennifer Doudna का कहना है कि वायरस में म्यूटेशन किसी बीमार व्यक्ति में और गंभीर लक्षण पैदा कर सकता है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आगे वाले संक्रमण शुरुआत से ही बेहद गंभीर होंगे. यानी बीमारी का प्रकार ही गंभीर स्वरूप में नहीं बदल जाएगा. ब्रिटेन की एमआरसी युनिवर्सिटी ऑफ ग्लास्गो सेंटर के साइंटिस्ट ऑस्कर मैक्लिन का कहना है कि हमें याद रखना होना-वायरस म्यूटेट करते हैं, ये उनका काम है. इसमें कोई बहुत गंभीर बात नहीं है.

कम म्यूटेट हो रहा है कोरोना वायरस
इससे इतर हाल में हुए कुछ शोधों के मुताबिक कोविड-19 में उतना म्यूटेशन नहीं हो रहा है जितना अन्य वायरस में होता रहा है. स्कॉटलैंड में वायरस इवोल्यूशन पर हुए एक शोध के मुताबिक अन्य फ्लू के मुकाबले कोविड-19 में एक तिहाई कम म्यूटेशन हो रहा है. ये पहले के वायरस के मुकाबले ज्यादा स्थाई है.

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