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कोरोना वायरस: धरती पर मौजूद 12 जानलेवा वायरसों की कुंडली जानें

पूरी दुनिया में समय-समय पर अलग-अलग वायरस ने तबाही मचाई है. ऐसे कई वायरस हैं, जिनका इलाज ढूंढा जा चुका है. वहीं, कई अभी भी लाइलाज ही हैं.

पूरी दुनिया में समय-समय पर अलग-अलग वायरस ने तबाही मचाई है. ऐसे कई वायरस हैं, जिनका इलाज ढूंढा जा चुका है. वहीं, कई अभी भी लाइलाज ही हैं.

चीन के वुहान (Wuhan) शहर से फैलना शुरू हुआ कोरोना वायरस (Coronavirus) पूरी दुनिया को डरा रहा है. कई वायरस (viruses) ऐसे हैं जो दुनिया के लिए समय-समय पर बड़ा खतरा साबित हुए हैं? ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसे कौन से वायरस हैं जो दुनिया में तबाही मचा चुके हैं और इस समय धरती पर मौजूद हैं. जानें ऐसे एक दर्जन वायरस के बारे में जो दुनिया के लिए चुनौती के तौर पर मौजूद है.

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    पूरी दुनिया कोरोना वायरस (Coronavirus) के खतरे से जूझ रही है, तो वायरस को लेकर कई चर्चाएं ज़ोरों पर हैं. दरअसल, मानव जाति के विकास से पहले ही विषाणुओं के खतरे से आदिकालीन मानव तक जूझता रहा है. आधुनिक समय में वायरस के खिलाफ दवाओं (Drugs) और टीके (Vaccines) बनाने की पद्धति के विकास का परिणाम है कि स्मॉल पॉक्स (Small Pox) जैसे रोग को दुनिया से खत्म किया जा चुका है. इसके बावजूद कई तरह के वायरस मनुष्यों के लिए पिछले कुछ दशकों में खतरा साबित होते रहे हैं. आपको उन 12 वायरसों के बारे में बताते हैं, जो अलग-अलग समय पर दुनिया के लिए बेहद खतरनाक साबित हुए हैं.

    2014 का इबोला वायरस
    मनुष्यों में इस वायरस का सबसे पहला हमला 1976 में कांगो में देखा गया था. इस इबोला वायरस (Ebola virus) का खून के साथ ही अन्य शारीरिक द्रवों से फैलना देखा गया. ये जानवरों से भी फैल सकने वाला वायरस है. विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) के मुताबिक, 2014 में पश्चिम अफ्रीका में इस वायरस का हमला बेहद खतरनाक था. लाइवसाइंस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस वायरस के कारण पीड़ितों में मृत्यु दर 50 से 71 फीसदी तक देखी गई थी.

    इबोला का पहला संस्करण था मार्बर्ग
    1967 में वैज्ञानिकों ने इस वायरस की पहचान की थी, जो जर्मनी के लैबकर्मियों में युगांडा के संक्रमित बंदरों से फैला था. इस वायरस में इबोला वायरस के साथ काफी समानताएं देखी गई थीं. शुरूआती संक्रमण (Infection) के दौरान इस वायरस के पीड़ितों में 25 फीसदी तक को जान गंवानी पड़ी थी. डब्ल्यूएचओ के अनुसार, 1998 से 2000 के बीच कांगो में हुए इस वायरस के हमले में मृत्यु दर 80 फीसदी तक देखी गई.

    इबोला 1967 में सबसे पहली बार जर्मनी के लैबकर्मियों में युगांडा के संक्रमित बंदरों से फैला था.


    भारत और अफ्रीका में अब भी है रैबीज़
    1920 के दशक में पहली बार पहचाने गए इस वायरस पर काबू पाया जा चुका है, लेकिन भारत और अफ्रीका जैसे विकासशील व पिछड़े देशों में यह अब भी समस्या है. सामान्य तौर पर कुत्तों के काटने (Dog Bites) से इस वायरस का संक्रमण होता है, जिसका टीका खोजा जा चुका है. फिर भी विशेषज्ञों की मानें तो अगर आप इस विषाणु के संक्रमण का इलाज ठीक से न लें, तो जान जाने का जोखिम 100 फीसदी है.

    नये ज़माने का सबसे खतरनाक वायरस एचआईवी
    1980 के दशक में पहली बार इस वायरस के कारण होने वाले एड्स का पता चला था. तब से अब तक इस वायरस के कारण करीब सवा तीन करोड़ जानें जा चुकी हैं. यह कुछ साल पहले तक भी सबसे ज़्यादा मौतों को अंजाम देने वाला रोग रहा है. हालांकि, दवाइयों के सहारे एचआईवी ग्रस्त मरीज़ सालों तक ज़िंदा रह सकते हैं, लेकिन वह सामान्य जीवन जैसा नहीं होता. दूसरी तरफ, कम और मध्यम आय वाले देशों में अब भी यह बड़ा खतरा बना हुआ है.

    1993 का हैंटावायरस पल्मोनरी सिंड्रोम
    हैंटावायरस पल्मोनरी सिंड्रोम जब 1993 में अमेरिका में सामने आया था, तब देखते ही देखते 600 से ज़्यादा लोग इसकी चपेट में आए थे, जिनमें से 36 फीसदी की मौत हुई थी. यह वायरस लोगों में दूसरे लोगों से नहीं ​बल्कि संक्रमित चूहों से फैलना पाया गया था. इससे पहले इस वायरस के ज़रिए संक्रमण का मामला 1950 के दशक में सामने आया था, जब 3000 सैनिकों को इससे संक्रमित पाया गया था.

    1980 में दुनिया स्मॉलपॉक्स मुक्त घोषित हुई
    वर्ल्ड हेल्थ असेंबली ने यह घोषणा की थी. लेकिन इससे पहले सदियों तक मनुष्यों ने इस विषाणु और रोग से संघर्ष किया. यह रोग कितना खतरनाक था, ऐसे समझें कि इससे पीड़ित हर 3 में से 1 की मौत हो​ती थी और जो बचते थे, उनके चेहरे पर हमेशा के लिए गहरे दाग रहते थे और अक्सर अंधापन भी झेलना होता था. 20वीं सदी में इस बीमारी के कारण 30 करोड़ मौतों का आंकलन किया जा चुका है.

    स्‍पेनिश फ्लू वायरस ने 1918 में 5 करोड़ से ज्‍यादा लोगों की जान ले ली थी.


    अगर कोई नया इन्फ्लुएंज़ा स्ट्रेन आ गया तो?
    स्पैनिश फ्लू दुनिया का सबसे खतरनाक वायरस अटैक माना जाता रहा है क्योंकि 1918 में जब यह संक्रमण फैला था तब दुनिया की करीब 40 फीसदी आबादी इसकी चपेट में थी और 5 करोड़ से ज़्यादा मौतें हुई थीं. लाइवसाइंस ने विशेषज्ञों के हवाले से लिखा है कि अगर इन्फ्लुएंज़ा का कोई नया स्ट्रेन यानी नये प्रकार का कोई वायरस दोबारा आ गया तो मानव जाति के लिए बेहद खतरनाक साबित होगा.

    हर साल 5 से 10 करोड़ को चपेट में लेता है डेंगू
    सबसे पहले 1950 के दशक में डेंगू वायरस की पहचान हुई थी, तबसे अब तक यह वायरस दुनिया के इतने हिस्से में फैल चुका है, जिसमें 40 फीसदी आबादी रहती है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक एक साल में डेंगू से 5 से 10 करोड़ लोग संक्रमित होते हैं, हालांकि इस वायरस के कारण मृत्यु दर अन्य की तुलना में काफी कम सिर्फ 2.5 फीसदी है.

    विकासशील देशों के लिए चुनौती है रोटावायरस
    विकसित देशों में इस वायरस के कारण बच्चों की मौत के मामले दुर्लभ हैं लेकिन विकासशील और पिछड़े देशों में इस वायरस के कारण बच्चों को गंभीर डायरिया जैसे रोग होते हैं. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 2008 में दुनिया भर में इस वायरस के कारण 5 साल से कम उम्र के साढ़े चार लाख बच्चों की मौत हुई थी. इसके बाद इस वायरस से निपटने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास किए गए.

    चीन से 2002 में शुरू हुए सार्स वायरस ने दुनिया भर में 770 लोगों की जान ली.


    न सार्स का कोई इलाज है और न ही नया केस
    2002 में चीन में सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम यानी सार्स वायरस का हमला हुआ था जो अगले दो सालों में दुनिया के 26 देशों के 8000 से ज़्यादा लोगों में फैला था. इस वायरस के कारण दो सालों में 770 से ज़्यादा मौतें हुई थीं. तबसे अब तक न तो इस वायरस के लिए कोई मान्यता प्राप्त इलाज या टीका खोजा जा सका है और न ही इसके नये मामले सामने आये हैं.

    सार्स—2 उर्फ कोरोना वायरस
    वर्तमान में दुनिया जिससे जूझ रही है, वह कोरोना वायरस पूर्ववर्ती सार्स की फैमिली का ही वायरस है. दिसंबर 2019 से चीन के ही वुहान शहर से इस वायरस के संक्रमण के मामले सामने आए. अब तक इस वायरस के लिए कोई मान्यता प्राप्त इलाज या टीका नहीं खोजा जा सका है और खबरें हैं कि 2021 के जुलाई माह तक इसका मान्यता प्राप्त टीका खोजा जा सकेगा. COVID-19 से पीड़ितों में 2.3 फीसदी मृत्यु दर देखी गई है और यह पुरुषों, बड़ी उम्र के लोगों और मरीज़ों के लिए ज़्यादा बड़ा खतरा है.

    कोरोना का ही एक और संस्कण मर्स
    मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम 2012 में सउदी अरब में फैला था और इसके बाद 2015 में दक्षिण कोरिया में. यह भी कोरोना वायरस की ही फैमिली का वायरस है और उसी की तरह चमगादड़ों के ज़रिए पनपा बताया जाता है. मनुष्यों से पहले इसने ऊंटों को प्रभावित किया था. कोरोना फैमिली के पहचाने गए वायरसों में यह सबसे खतरनाक रहा क्योंकि इससे पीड़ितों में मृत्यु दर 30 से 40 फीसदी तक रही. इस वायरस के लिए भी अब तक कोई मान्यता प्राप्त इलाज या टीका नहीं है.

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