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Coronavirus: आइसोलेशन के तरीकों में स्वीडन का जवाब नहीं, जानें अब तक क्‍यों नहीं किया लॉकडाउन

News18Hindi
Updated: April 3, 2020, 11:43 AM IST
Coronavirus: आइसोलेशन के तरीकों में स्वीडन का जवाब नहीं, जानें अब तक क्‍यों नहीं किया लॉकडाउन
कोरोना वायरस से दुनिया भर में फैले डर के बीच स्‍वीडन में अभी भी लोग सामान्‍य जीवन जी रहे हैं.

कोरोना वायरस (Coronavirus) फैलने के डर से दुनिया की बहुत बड़ी आबादी लॉकडाउन (Lockdown) के कारण घरों में कैद है. वहीं, स्‍वीडन (Sweden) में लोग संक्रमण फैलने के बाद भी सामान्‍य जिंदगी जी रहे हैं. आखिर क्‍या है उनका आइसोलेशन (Isolation) का तरीका, जिसकी पूरी दुनिया में हो रही है तारीफ और क्‍यों अब तक वहां नहीं की गई है लॉकडाउन की घोषणा...

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  • Last Updated: April 3, 2020, 11:43 AM IST
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दुनिया भर में कोरोना वायरस (Coronavirus) ने तबाही मचा दी है. दुनिया के सबसे ताकतवर देश भी इस वायरस के सामने घुटने टेक चुके हैं. ज्‍यादातर देशों ने संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सोशल डिस्‍टेंसिंग (Social Distancing) और लॉकडाउन (Lockdown) का सहारा लिया है. इस वजह से दुनिया की बड़ी आबादी घरों में कैद है. इसके उलट स्‍वीडन (Sweden) में लोग अभी भी आराम से सामान्‍य जिंदगी जी रहे हैं. अभी भी वहां लोग बिना फेस मास्‍क लगाए, बिना ग्‍लव्‍स पहने बेझिझक पार्कों और सार्वजनिक जगहों पर घूम रहे हैं. दरअसल, स्‍वीडन में आइसोलेशन (Isolation) की जबरदस्‍त व्‍यवस्‍था है. आपको ताज्‍जुब होगा कि स्‍वीडन के के आधे से ज्‍यादा घर सिंगल रूम अपार्टमेंट हैं. यहां के लोगों को ज्‍यादातर वक्‍त अपने अपार्टमेंट में अकेले बिताना पसंद है. यहां के लोग दुनिया की दूसरी संस्‍कृतियों (Cultures) की तरह एकदूसरे से बहुत मिलना-जुलना पसंद नहीं करते. अब सवाल ये उठता है कि यहां का ये चलन बिना लॉकडाउन के कोरोना वायरस से मुकाबले में कितना कारगर होगा.

18-19 साल की उम्र में पेरेंट्स से अलग रहने लगते हैं बच्‍चे
स्‍वीडन के उपसला की रहने वाली 21 वर्षीय स्‍वीडी काजसा वाइकिंग कहती हैं कि हमें ज्‍यादातर वक्‍त घर में ही गुजारना पसंद है. यहां के लोग बाकी देशों की तरह बहुत ज्‍यादा सामाजिक नहीं होते हैं. इसलिए अलग-थलग रहना हम लोगों के लिए काफी आसान हो जाता है. खाली समय का इस्‍तेमाल में अपने घर की साफ-सफाई, सजावट और पढाई करने में करती हूं. यूरोस्‍टेट के आंकडों के मुताबिक, स्‍वीडन के ज्‍यादातर घर एक ही व्‍यक्ति के रहने लायक बनाए गए हैं. स्‍वीडन के ज्‍यादातर बच्‍चे 18 और 19 साल की उम्र में अपने माता-पिता का घर छोड़ देते हैं और अलग रहना शुरू कर देते हैं, जबकि बाकी यूरोपीय देशों में औसतन 26 साल की उम्र में बच्‍चे ऐसा करते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि रहन-सहन का ये तरीका कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए पर्याप्‍त है. इसके उलट इटली और स्‍पेन में एक ही छत के नीचे बड़े परिवारों के साथ रहने का चलन है.

स्‍वीडन में आधे से ज्‍यादा घर सिंगल रूम अपार्टमेंट हैं. यहां ज्‍यादातर लोग हमेशा से अकेले रहना ही पसंद करते हैं.




स्‍वभाव में है सोशल डिस्‍टेंसिंग, बाहर होता है संयमित व्‍यवहार


उपसला यूनिवर्सिटी में संक्रामक रोगों के प्रोफेसर बी. ऑल्‍सन का कहना है कि अगर आप एक ही घर में कई पी‍ढ़ी के लोग साथ रहते हैं तो संक्रमण बहुत तेजी से फैल सकता है. इसके उलट स्‍टॉकहोम समेत स्‍वीडन के बड़े शहरों में ज्‍यादातर लोग अपने अपार्टमेंट में अकेले ही रहते हैं. इसलिए यहां संक्रमण फैलने की रफ्तार काफी धीमी रहेगी. स्‍वीडन की संस्‍कृति पर लिखने वाली लेखक लोला अकिनमेड अकरस्‍ट्रॉम का क‍हना है कि सार्वजनिक स्‍थानों पर यहां के लोगों का व्‍यवहार काफी संयमित और शानदार होता है. यहां सार्वजनिक वाहनों में एकदूसरे के करीब बैठने का चलन ही नहीं है. साथ ही अपने साथ यात्रा करने वालों से भी लोग बात करना पसंद नहीं करते हैं. दुकानों और कैफे में भी लोग हमेशा से सोशल डिस्‍टेंसिंग के नियमों को अपनाते आए हैं. ये यहां के लोगों के स्‍वभाव में ही है. यहां के लोग एकदूसरे से काफी दूर-दूर रहना ही पसंद करते हैं.

दो-तिहाई लोग घरों में रहकर ऑनलाइन काम ही करते हैं
स्‍वीडन यूरोपीय संघ की सबसे एडवांस डिजिटल इकोनॉमी मानी जाती है. स्‍वीडिश इंटरनेट फाउंडेशन के मुताबिक, यहां दो तिहाई लोग हमेशा घर से ही ऑनलाइन काम करते हैं. यहां ब्रॉडबैंड की रफ्तार घरेलू और कंपनी नियमों के हिसाब से तय की जाती है. इससे पेशेवर लोगों को घर से काम करने में किसी तरह की असुविधा नहीं होती है. यहां लोग अपना काम बीच में छोड़कर अपने बच्‍चों को लेने के लिए स्‍कूल खुद पहुंच जाते हैं. इसके बाद अपने ऑफिस का बचा हुआ काम कर लेते हैं. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, स्‍टॉकहोम बिजनेस रीजन के सीईओ स्‍टफन इनग्‍वरसन ने बताया कि स्‍वीडन में हर कंपनी अपने ज्‍यादातर कर्मचारियों को घर से काम करने की छूट देती है. इससे उनका संसाधन जुटाने और कर्मचारी को तमाम सुविधाएं देने का खर्च तो बचता ही है. साथ ही रोड्स पर वाहन कम होते हैं और प्रदूषण भी नहीं होता.

स्‍वीडन में लोग न तो सार्वजनिक वाहनों में सटकर बैठते हैा और न पार्कों में. यहां लोगों के स्‍वभाव में ही सोशल डिस्‍टेंसिंग है.


मामूली बीमारी पर भी कंपनियां कर्मियों को देती हैं पेड लीव
लेखिका लोला कहती हैं कि यहां के लोग मामूली सिरदर्द होने पर भी घर पर ही रुककर काम करते हैं. ऐसे में अगर किसी को कोरोना वायरस के मामूली लक्षण भी होंगे तो वो वायरस को आगे नहीं फैलाएगा. ये इसलिए भी है कि यहां की कंपनियां हमेशा से अपने कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम के लिए प्रोत्‍साहित करती हैं. वहीं, मामूली खांसी-जुकाम पर भी बिना मांगे छुट्टी दे दी जाती है. यहां दवाई खाकर कोई ऑफिस में काम नहीं कर सकता है. मजेदार बात है कि इस छुट्टी का पैसा नहीं काटा जाता है. कंपनियां इसका भुगतान करती हैं. दरअसल, कंपनियां मानती हैं कि छुट्टी लेने वाले कर्मचारी ने अपने साथी कर्मियों को बीमार न करके फायदा पहुंचाया है. हालांकि, स्‍वीडन के कोरोना वाायरस को हल्‍के में लेने पर विवाद भी खडा हो गया है. यहां यूरोप के दूसरे देशों की तरह लॉकडाउन नहीं किया गया.

सरकार के गैर-जिम्‍मेदाराना रवैये की हो रही है आलोचना
कुछ वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में महामारी के दौरान स्वीडन की सरकारी स्वास्थ्य एजेंसी के गैर-जिम्मेदाराना रवैये की आलोचना की है. करीब 2,000 शिक्षाविदों ने सरकार को लिखे एक खुले पत्र में उसकी संक्रमण से निपटने की रणनीति में ज्‍यादा पारदर्शिता लाने की अपील की है. फोर्ब्‍स की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वीडन की मेडिकल यूनिवर्सिटी कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट में प्रोफेसर स्टेन लिनारेसन ने कोरोना वायरस से निपटने के सरकार के रवैये की तुलना रसोई में आग जलने देने से की, जिसे बाद में बुझा लिया जाएगा. उन्होंने कहा कि इसका कोई मतलब नहीं है. उन्‍हें डर है कि कहीं आग पूरे घर को चपेट में न ले ले. सरकार ने कोरोना वायरस की रोकथाम को लेकर देशवासियों को निर्देश दिया है कि वे बार-बार चेहरा न छूएं. बीमार लोगों से संपर्क न बनाए.

स्‍वीडन की सरकार कोरोना वायरस को धीमी और नियंत्रित रफ्तार से खत्‍म करना चाहती है.


धीमे और नियंत्रित तरीके से कोरोना वायरस करेंगे खत्‍म
देश के पूर्व महामारी विशेषज्ञ और अब सरकारी स्वास्थ्य एजेंसी के सलाहकार जोहान गीसेस्के ने कहा कि स्वीडन की तस्वीर यूरोपीय देशों से अलग है. यह बहुत अच्छी बात है. सरकार ने साफ कर दिया है कि वे वायरस को धीमी रफ्तार से बढ़ने देना चाहते हैं, जिसे नियंत्रित तरीके से खत्‍म कर दिया जाएगा. फिलहाल स्‍वीडन में बड़े कार्यक्रमों पर रोक लगा दी गई है और यूनिवर्सिटीज बंद हो गई हैं. स्वीडन ने लोगों से घर से ही काम करने और लोगों से बेवजह यात्रा नहीं करने को भी कहा है. सरकार घर बैठे लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए तमाम उपाय भी कर रही है. इस बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं जो जरूरतमंदों की मदद कर रहे हैं. कुछ लोगों ने समूह बनाकर मदद पहुंचाने का काम भी तेज कर दिया है ताकि लोगों को घर में अकेले रहने में कम से कम दिक्कत हो. फेसबुक, व्हाट्सएप जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स के सहारे आस-पड़ोस की तमाम छोटी बड़ी जानकारी ली जा रही हैं.

ज्‍यादा जोखिम वाले लोगों पर दिया जा रहा है पूरा ध्‍यान
स्‍वीडन में फिलहाल सिर्फ उन लोगों पर ध्‍यान दिया जा रहा है, जिन्‍हें संक्रमण का सबसे ज्‍यादा जोखिम है. इसमें बुजुर्गों, छोटे बच्‍चों और पुरानी बीमारियों का इलाज करा रहे लोगों को शामिल किया गया है. हालांकि, 16 साल से कम उम्र के बच्‍चों के लिए स्‍कूल अभी भी खुल रहे हैं. अभी तक किसी भी दुकान या रेस्‍टोरेंट को बंद करने का आदेश नहीं दिया गया है. पब और रेस्‍टोरेंट में अभी भी खाना व शराब सर्व की जा रही है. हालांकि, एक समय में एक जगह 50 से ज्‍यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गई है. लोगों से कहा गया है कि सभी कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए अपनी-अपनी जिम्‍मेदारी निभाएं. बता दें कि एक करोड़ की आबादी वाले स्वीडन में अब तक 5,568 लोग संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें 308 लोगों की मौत हो गई है. लोगों को भरोसा है कि स्वीडन में इटली और स्‍पेन जैसे हालात नहीं होंगे.

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First published: April 3, 2020, 11:41 AM IST
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