अब कोरोना के हल्के लक्षण वाले मरीजों के लिए भी आई दवा, पहले आ चुकी है गंभीर लक्षणों की दवा

अब कोरोना के हल्के लक्षण वाले मरीजों के लिए भी आई दवा, पहले आ चुकी है गंभीर लक्षणों की दवा
मामूली लक्षणों वाले कोरोना मरीजों के इलाज के लिए अब फेविपिराविर दवा दी जा सकेगी (Photo-pixabay)

मामूली लक्षणों वाले कोरोना मरीजों (coronavirus patients with mild and average symptoms) के इलाज के लिए अब फेविपिराविर दवा (Favipiravir medicine) दी जा सकेगी. इसे भारत सरकार की मंजूरी मिल गई है. इससे पहले एक दवा और भी आ चुकी है, जो गंभीर मरीजों की जान बचाने वाली साबित हो रही है.

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कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 89 लाख से आगे निकल चुका है. इस बीच कितनी ही दवाएं आजमाई गईं लेकिन एक के बाद एक सारी असफल रहीं. कोई दवा मरीजों पर काम ही नहीं करती थी तो किसी दवा के साइड इफैक्ट काफी ज्यादा थे. अब पहली बार ऐसी दवा आई है, जो कोरोना के हल्के और औसत लक्षण वाले मरीजों के लिए असरदार मानी जा रही है. फेविपिराविर नाम की ये दवा एंटी वायरल है, जो मुंबई की ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स (Favipiravir by Glenmark Pharmaceuticals) ने तैयार की है. इसे भारतीय औषधि महानियंत्रक (DCGI) की मान्यता भी मिल चुकी है. दवा को फैबिफ्लू ब्रांड नाम से बाजार में उतारा जा रहा है. जानिए, क्या खास है इस दवा में और कैसे ये कोरोना पर काम करेगी.

क्या है ये दवा
फेविपिराविर एक एंटी-वायरल ड्रग है यानी ये खासतौर पर वायरल डिसीज पर काम करता है. इसे पहले से जापान में इंफ्लूएंजा के इलाज के लिए मान्यता मिली हुई है. फिलहाल Covid-19 के मामले में इसपर 18 क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं. इनमें से दो स्टडीज के सकारात्मक परिणाम आए हैं. यही वजह है कि इस दवा को लेकर काफी उम्मीद की जा रही है.

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दवा कंपनी ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स (Glenmark Pharmaceuticals) इसका निर्माण शुरू कर रही है. DCGI से दवा बनाने और इसकी मार्केटिंग की मंजूरी भी मिल चुकी है. इसे मार्केट में FabiFlu ब्रांड नाम दिया गया है. ये दवा गोली के फॉर्म में दी जाती है. फैबिफ्लू को कोरोना के हल्के और औसत लक्षण वाले मरीजों पर ही इस्तेमाल किया जाएगा. गंभीर मरीज इसके दायरे से बाहर रहेंगे. साथ ही ये भी तय हुआ है कि अगर मरीज इस दवा से इलाज के लिए मंजूरी दे, तभी उसका इलाज होगा.



फेविपिराविर एंटी-वायरल ड्रग है यानी ये खासतौर पर वायरल डिसीज पर काम करता है (Photo- moneycontrol)


वैसे फैबिफ्लू पहली ऐसी दवा है, जिसे कोरोना की दवा के तीसरे चरण के ट्रायल के लिए DCGI से मंजूरी मिली है. यही वजह है कि इससे काफी उम्मीद जताई जा रही है.

क्या नतीजे रहे दो चरणों के क्लिनिकल ट्रायल के
ग्लेनमार्क के मुताबिक कोरोना के मरीजों के इलाज के दौरान 88 प्रतिशत मरीजों में इससे फायदा दिखा. लगभग चार दिनों के भीतर उनका वायरल लोड यानी शरीर में वायरस की संख्या में काफी कमी आई. कंपनी ग्लेनमार्क ने 20 जून को दवा के बारे में प्रेस वार्ता लेते हुए चार क्लिनिकल ट्रायल्स का हवाला दिया. इनमें से 2 ट्रायल चीन में, एक रूस में और एक जापान का है. चीन की एक स्टडी में 80 मरीज लिए गए, जिनपर इनके असर की स्टडी की गई. साथ में दूसरी दवाओं जैसे Lopinavir भी एक ग्रुप को दी गई. तुलनात्मक अध्ययन में साफ दिख रहा था कि जिन मरीजों को फैबिफ्लू दिया जा रहा था, उनमें वायरल लोड तेजी से घटा. इससे मरीज जल्दी रिकवर कर जाता है.

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चीन की ही एक दूसरी स्टडी में 236 मरीज शामिल थे. इनमें भी दवा का अच्छा असर दिखा. वहीं जापान में मरीज के बड़े ग्रुप पर भी समान नतीजे दिख. वहां 2,141 मरीजों पर दवा की स्टडी हुई. ये सभी मरीज माइल्ड से लेकर औसत लक्षण वाले थे.

कोरोना के मरीजों के इलाज के दौरान 88 प्रतिशत मरीजों में इससे फायदा दिखा (Photo-pixabay)


हमारी सरकार भी दवा को लेकर टेस्ट कर रही है. Council of Scientific and Industrial Research (CSIR) ने अप्रैल महीने में ही इसपर काम शुरू कर दिया था और अब आगे के ट्रायल के लिए DGCI से मंजूरी भी ले चुकी है.

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दवा की एक खुराक 200 एमजी की होगी. पहले दिन इसकी 1800 एमजी की दो खुराक लेनी होगा, जिसके बाद 14 दिन तक 800 एमजी के दो डोज दिए जाएंगे. मामूली संक्रमण वाले ऐसे मरीज जो डायबिटीज या दिल की बीमारी से पीड़ित हैं, उन्हें भी यह दवा दी जा सकती है. वहीं गंभीर मामले वाले मरीजों को डेक्सामेथासोन की खुराक दी जाएगी. बता दें कि ये दवा पहले से ही गठिया, खून की बीमारियों और सूजन कम करने में इस्तेमाल होती आई है. साथ ही एलर्जी और कई तरह के चर्म रोगों में ये दी जाती है. कोरोना के मामले में इस दवा पर भी ट्रायल हो रहे हैं. इनमें पाया गया कि ऐसे मरीज जिनमें कोरोना की गंभीरता के कारण वेंटिलेटर देना होता है, उनमें मौत का खतरा डेक्सामेथासोन से 1 तिहाई फीसदी कम किया जा सकता है, वहीं जिन्हें ऑक्सीजन देना पड़ रहा हो, उनमें मौत का जोखिम पांचवे हिस्से के बराबर घट जाता है.
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