कोरोना वायरस दिमाग में ला रहा बेहद खतरनाक बदलाव, रिकवरी के बाद भी डर

कोरोना वायरस दिमाग में ला रहा बेहद खतरनाक बदलाव, रिकवरी के बाद भी डर
स्पेनिश फ्लू के बाद भी 1 मिलियन लोगों को लगातार मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियां रहीं- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

कोरोना (coronavirus) के कारण दिमाग में आ रही सूजन (inflammation of brain) और उसके असर को एक्यूट डिसेमिनेटेड इंसिफेलोमाइलिटिस (ADEM) कहते हैं. वैज्ञानिकों को डर है कि रिकवरी के बाद भी बड़ी आबादी इससे प्रभावित रहने वाली है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 10, 2020, 12:23 PM IST
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कोरोना के मामले 1 करोड़ 23 लाख का आंकड़ा पार कर चुके हैं. इस बीच कोरोना वायरस के बारे में कई बातें निकलकर आ रही हैं. पहले सिर्फ फेफड़ों पर हमला करता दिखने वाला वायरस शरीर के लगभग सारे अंगों पर असर डालता है. गंभीर मामलों में ये मस्तिष्क को प्रभावित करता है. यहां तक कि दिमाग अपना काम बंद कर देता है. अब जर्मनी में हुई एक स्टडी में ये सामने आया है कि किस तरह से वायरस शरीर को धोखा देते हुए ब्रेन तक पहुंचता है और उस पर असर करता है.

क्या हैं दिमाग पर असर के लक्षण
कोरोना के गंभीर मरीज में कई समस्याएं दिखती हैं, जैसे कंपकंपी, दौरे पड़ना और होश खोना. इस पर जर्मन वैज्ञानिकों ने 11 मरीजों को लेकर एक स्टडी की. इसमें कोरोना मरीज में मस्तिष्क से जुड़े ये सारे लक्षण दिखाई दिए, जबकि मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड में बहने वाले सेरिब्रोस्लाइनल फ्लूइड में कोरोना वायरस नहीं दिख रहा था. इस आधार पर वैज्ञानिक ये मान रहे हैं कि मरीज का इम्यून सिस्टम ही ऑटोएंटीबॉडी बना रहा है. इसमें एंटीबॉडी शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं और ऊतकों पर हमला करने लगती है.

वैक्सीन आने के बाद भी बीमारी से रिकवर हो चुके मरीज दिमागी बीमारियों से प्रभावित रहेंगे- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

कैसे दे रहा शरीर को धोखा


स्टडी 6 जुलाई को साइंस जर्नल medRxiv में आई. इसमें उन सारे मरीजों के लक्षणों का उल्लेख था, जो स्टडी में शामिल थे. डराने वाली बात ये थी कि सारे के सारे 11 मरीजों में ऑटोइम्यून सिस्टम बहुत तेजी से काम कर रहा था और इसका असर ब्रेन पर हो रहा था. रॉयटर्स में आई रिपोर्ट के मुताबिक स्टडी में शामिल रिसर्चर डॉ. क्रिश्चियाना फ्रेंक ने कहा कि ब्रेन में किसी बीमारी का कोई लक्षण नहीं, जबकि वो लगातार डैमेज हो रहा है. ये संकेत है कि कोरोना से लड़ने के लिए बन रही एंटीबॉडी ही शरीर के खिलाफ काम कर रही है. वैज्ञानिक फिलहाल इस पर काम कर रहे हैं कि वायरस कैसे अपने ही शरीर की एंटीबॉडीज को शरीर के खिलाफ काम करने के लिए उकसाता है.

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क्या डर है वैज्ञानिकों को
साल 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू के बाद भी 1 मिलियन लोगों को लगातार मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियां रहीं. यानी इससे ये डर बढ़ा है कि कोरोना की वैक्सीन आने के बाद भी बीमारी से रिकवर हो चुके मरीज दिमागी बीमारियों से प्रभावित रहेंगे. यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में भी कोरोना और दिमाग के संबंध पर एक स्टडी हुई. 43 मरीजों पर हुई स्टडी में देखा गया कि वायरस के कारण दिमाग की नसों में सूजन आ जाती है और ठीक होने के बाद भी इसका असर रहता है. इससे कोरोना खत्म होने के बाद भी लोग परेशान रहेंगे.



ये हो सकता है खतरा
कनाडा की वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक एड्रियन ओवेन ने माना कि अगर सालभर के भीतर 1 करोड़ की आबादी भी इससे रिकवर हो जाए तो भी उनके शरीर में कई बीमारियां रहेंगी. इन बीमारियों में एक बीमारी मस्तिष्क की भी हो सकती है. इससे काम बुरी तरह से प्रभावित होगा. बता दें कि कोरोना के कारण दिमाग में आ रही सूजन और उसके असर को एक्यूट डिसेमिनेटेड इंसिफेलोमाइलिटिस (ADEM) कहते हैं. ये युवाओं और किशोरों में दिख रही है. फिलहाल वैज्ञानिक नहीं जानते कि ब्रेन पर ये असर कब तक रहेगा.

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एसिडिटी की दवा से भी डर
एक खतरनाक बात जो सामने आई है, वो ये कि एसिडिटी से छुटकारा पाने के लिए ली जा रही दवाएं भी कोरोना का खतरा बढ़ाती हैं. आमतौर पर किडनी की बीमारी के मरीज, डिमेंशिया के मरीजों के साथ-साथ और भी कई बीमारियों में हार्ट बर्न से बचाव के लिए एसिडिटी की दवाएं दी जाती हैं. ये लंबे समय तक चलती रहती हैं. इन दवाओं से भी कोरोना वायरस का खतरा बढ़ता है. एसिडिटी रोकने वाली ये दवाएं पेट में ज्यादा एसिड बनने से रोकती हैं. रिसर्चर्स ने 53,000 लोगों पर एक सर्वे किया, जिसमें 4,000 लोग कोरोना पॉजिटिव निकले. ये वही लोग थे, जो लंबे वक्त से एसिडिटी की दवा ले रहे थे. अगर कोई रोज एसिडिटी की एक गोली ले रहा हो तो उसे कोरोना का दोगुना, जबकि दो गोलियां रोज ले रहे व्यक्ति को कोरोना संक्रमण का तिगुना खतरा रहता है. स्टडी अमेरिकन जर्नल ऑफ गेस्ट्रोएंटेरोलॉजी में छपी.

ओबेसिटी के मरीज पर कोरोना हमला हो तो उसमें श्वसन तंत्र पर बहुत असर होता है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


अलग तरह के काम करते हैं शरीर के ऑर्गन
कोरोना के मामले में एक और बात निकलकर आई है. इसके गंभीर मरीज में अंगों में भीतरी सूजन या ऑर्गन डैमेज का मतलब ये नहीं है कि वायरस का सबसे ज्यादा असर वहीं पर है. यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा में इस पर एक स्टडी हुई. इसमें कोरोना से हुई मौत के बाद मरीजों को ऑटोप्सी की गई. सभी 11 मरीजों की ऑटोप्सी में देखा गया कि आंतों, लिवर और किडनी में वायरल लोड सबसे ज्यादा था, लेकिन न तो इनमें सूजन थी और न ही ये उतनी बुरी तरह से डैमेज हुए थे. यानी किस अंग पर ज्यादा असर पड़ेगा, ये इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वायरल लोड कहां ज्यादा है, बल्कि शरीर के कई अंगों के टिश्यू दूसरे अंगों की अपेक्षा वायरस से बेहतर तरीके से लड़ पाते हैं. यही वजह है कि कहीं-कहीं वायरल लोड ज्यादा होने पर भी वे अंग बचे रहते हैं, जबकि दूसरे अंग कम वायरस के बाद भी डैमेज हो जाते हैं.

कब होता है वेंटिलेटर का डर
अगर ओबेसिटी के मरीज पर कोरोना हमला हो तो उसमें श्वसन तंत्र पर बहुत असर होता है. न्यूयॉर्क में बहुत से कोरोना मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी. इनमें से ज्यादातर मरीज वे थे, जो मोटापे का शिकार थे. शोधकर्ताओं ने न्यूयॉर्क में 1,687 मरीजों पर स्टडी की, जो वेंटिलेटर पर पहुंच गए. इनमें से हर तीन में से एक मरीज मोटापे का शिकार था. वैसे मोटापे के कारण कोरोना डेथ का खतरा नहीं बढ़ता लेकिन इससे श्वसन तंत्र पर बुरी तरह से असर होता है, जो कि अपने-आप में खतरनाक स्थिति है. मोटापे से कोरोना के संबंध पर ये स्टडी साइंस जर्नल एनल्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन में आई.
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