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वैज्ञानिकों की निगाहों से बच कर दुनिया में कहर ढा गया कोरोना, कैसे हो गया यह

Vikas Sharma | News18Hindi
Updated: April 5, 2020, 2:59 PM IST
वैज्ञानिकों की निगाहों से बच कर दुनिया में कहर ढा गया कोरोना, कैसे हो गया यह
कोरोना वायरस कपड़ों से भी फैलता है,लेकिन नई तकनीक से यह कपड़ों पर आते ही बेअसर हो जाएगा.

कोरोना वायरस (Corona Virus) के प्रकोप से 10 साल पहले इस तरह के संकटों की पहचान करने के लिए एक प्रोजेक्ट बनाया गया था. फिर भी अमेरिका-चीन सहित 31 देशों की टीमें कोरोना केखतरे का पहले से अंदाज लगाने में नाकाम हो गईं.

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नई दिल्ली: तीन महीने से ज्यादा समय हो चुका है. चीन के वुहान शहर से निकले कोरना वायरस (Corona virus) ने दुनिया भर में तहलका मचा रखा है. अभी तक यह सार्स कोव-2 (SARS Cov-2) वायरस कोविड-19 (Covid 19) बीमारी को महामारी के रूप में अमेरिका यूरोप सहित दुनिया के ज्यादातर देशों में फैल चुका है. हैरानी की बात है कि यह वायरस दुनिया के वैज्ञानिकों की निगाहों में क्यों नहीं आ सका.

वैज्ञानिक इस तरह के वायरस खोज रहे थे काफी समय से
बात अजीब सी लगती है लेकिन सच यही है वायरस धीरे से दुनिया भर में अपनी जड़ें जमा चुका है. लोग इससे बचने के लिए मास्क लगाकर भी बाहर निकलने से डर रहे हैं. शोधकर्ता अभी तक इस बीमारी का इलाज और टीका ढूंढ रहे हैं. लाइवसाइंस की खबर के मुताबिक इस बात की भी पड़ताल की जा रही है कि करीब 11 साल पहले से ही वैज्ञानिक जब अज्ञात वायरसों को खोज कर रहे थे तो उनकी पकड़ में न आकर यह वायरस दुनिया पर हमला करने में कैसे कामयाब हो गया.

2009 में बना था इस तरह का प्रोग्राम



साल 2009 में अमरीकी सरकार ने इसी तरह के खतरनाक वायरस के खोज करने के लिए एक प्रोग्राम बनाया था. इस प्रोजक्ट का नाम प्रिडिक्ट (PRIDICT) रखा गया, जिसे अमरीकी एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवेलपमेंट ने आर्थिक सहायता दी. खास बात यह है कि इसमें चीन सहित 31 देशों के वैज्ञानिकों की टीमों के साथ काम किया था.



कोरोना वायरस के कारण दुनिया में 12 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं.


बन गया सबसे बड़ा सवाल
प्रडिक्ट संक्रामक रोग निगरानी के लिए एक उभरते हुए वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा था. इस नेटवर्क और हजारों वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे थे इसके बावजूद कोविड-19 दुनिया में फैलकर महामारी बन गई. यह एक बड़ा सवाल बन गया है कि आखिर यह वायरस वैज्ञानिकों की नजर में कैसे नहीं आया.

कई कारण हैं इस नाकामी के
विशेषज्ञ इसके कई कारण बताते हैं. उनका कहना है कि यह बिलकुल मछली पकड़ने के जाल में छेद  जैसा है. सर्विलियंस नेटवर्क में भी कई खामियां थीं. इसमें बहुत कम पैसा और बहुत कम लोगों का इसमें शामिल होना बड़ी वजह रहीं. कुछ का मानना है कि लंबे समय से निगरानी करते समय इसमें कुछ खामियां हमने खुद बना लीं. पिछले साल सितंबर में ही इसकी प्रोजेक्ट की फंडिंग रोक दी गई थी. तब बताया गया था इस तरह के एक नए प्रोजक्ट पर काम शुरू होने जा रहा है, लेकिन इससे ज्यादा जानकारी नहीं दी गई.

ऐसे होता है इस तरह के प्रोजेक्ट पर काम
दुनिय में करीब छह लाख से ज्यादा वायरस ऐसे हैं जिनमें जानवरों से इंसानों में आने की क्षमता है. इनके बारे में पता लगाने के लिए शोधकर्ताओं को ऐसी जगहों की पहचान करनी पड़ती है जहां इन जानवर और इंसानों का आमना सामना या संपर्क हो सकता है. इमें जंगल, सब्जी बाजार, मांस-मछली बाजार आदि शामिल हैं. इसमें नमूने उन जानवरों के ज्यादा लिए जाते हैं जिनसे इंसानों में वायरस फैलनी की बहुत ज्यादा संभावना हो. जैसे कि चमगादड़ चूहे, बंदर वगैरह. उसके बाद उन पर टेस्ट होते हैं.

Corona Virus, Covid 19
कोरोना वायरस को लेकर दुनिया भर में तेजी से शोधकार्य हो रहा है.


पहले से ही थी आशंका
शोधकर्ता यह भी जानते थे कि करोना वायरस वापस आ सकता था. पूर्व संस्करण सार्स कोव-1 पहली बार चीन में 2002 में फैला उसके बाद वह तीस देशों में फैला और उसके अगले साल यह खुद खत्म हो गया.  2007 में हॉन्गकॉन्ग में प्रकाशित शोध में आशंका जताई गई थी कि चमगादड़ में सार्स कोव जैसे कई वायरसों ने उसे टाइम बम बना दिया है. इसमें आशंका जताई गई थी कि दक्षिण चीन में ऐसी संस्कृति है जहां लोग ऐसे जानवर खाते हैं जो चमगादड़ से वायरस ले सकते हैं. इससे इन वायरसों के इंसानों में आने की संभावना ज्यादा होती है. ऐसी आशंका  कई अन्य वैज्ञानिकों ने भी जताई थी.

यह भी था अंदेशा लेकिन...
न्यूयार्क के इकोहेल्थ एलाएंस के इकोलॉजिस्ट केविन ओलिवल जो प्रिडिक्ट का हिस्सा रहे थे, ने बताया की इकोहेल्थ शोधकर्ताओं की टीम और उनके सहयोगियों ने बहुत से सार्स संबंधी कोरोना वायरसों की चमगादड़ों में पहचान की थी. वे उनमें से कुछ पर प्रयोग भी कर रहे थे, लेकिन सार्स कोव-2 कब और कैसे फैल गया यह साफ तौर पर पता नहीं चल सका.

बहुत ज्यादा जटिल है यह काम
ओलिवल का कहना है कि इस तरह के शोध में बहुत सारी जानकारी का होना बहुत जरूरी है. इसमें स्थानीय इकोलॉजी, प्रजातियों के वितरण की जानकारी, लोगों और प्रजातियों के पसरस्पर संपर्क और व्यवहार,  पशु व्यापार के सांस्कृतिक और आर्थिक कारक शामिल हैं. यह बहुत ही जटिल होते हैं इसके लिए बहुत सारे वैज्ञानिक और पैसा चाहिए होता है. इसमें प्रशिक्षण की भी जरूर होती है.

Coronavirus
कोरोना की दवाई पर इस समय दुनिया भर में तेजी से काम चल रहा है.


आगे शायद लिया जाए सबक
गौरतलब  कि प्रडिक्ट को एक दशक में लगभग 200 मिलियन डॉलर का फंड मिला था जो कि आज कोविड-19 के लिए दिए 2 ट्रिलियन डॉलर का बहुत ही छोटा हिस्सा है. अब उम्मीद की जा रही है कि इसस सबक लेकर दुनिया एक बेहतर व्यवस्था बनाएगी जिसमें इस तरह की आपदों के लिए वह बेहतर तरीके से सामना कर सके.

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First published: April 5, 2020, 2:47 PM IST
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