Coronavirus: क्‍या मेडिकल उपकरणों के लिए दुनियाभर के देशों के बीच बन रहा है जंग जैसा माहौल

Coronavirus: क्‍या मेडिकल उपकरणों के लिए दुनियाभर के देशों के बीच बन रहा है जंग जैसा माहौल
कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच कई देश चीन से चली मेडिकल सप्‍लाई बीच में जब्‍त किए जाने या दूसरे देशों को भेजे जाने को लेकर भी परेशानी में हैं.

कोरोना वायरस (Coronavirus) से मुकाबले के लिए चीन से मेडिकल सप्‍लाई लेकर चले जहाजों के खरीदार देश तक पहुंचने को लेकर आशंका का माहौल बनने लगा है. फ्रांस और जर्मनी समेत कई देशों ने अमेरिका (US) पर उनकी आपूर्ति जब्‍त करने का आरोप लगाया है. वहीं, स्‍पेन को फ्रांस और तुर्की की ओर मुश्किल पेश आ रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 14, 2020, 9:57 PM IST
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चीन ने कोरोना वायरस के खिलाफ मुकाबला करीब-करीब जीत लिया है. हालांकि, पिछले कुछ दिन में कोरोना वायरस के नए पॉजिटिव केस सामने आने की जानकारी मिल रही है. आशंका जताई जा रही है कि चीन (China) में कोरोना वायरस वेव-2 (Coronavirus Wave-2) शुरू हो सकती है. इस बीच दुनिया के ज्‍यादातर देश संक्रमण से निपटने वाले मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर नजर आ रहे हैं. कई देशों ने चीन के साथ मेडिकल उपकरणों के लिए करार किया. इस बीच हाल में पता चला कि चीन से पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्‍यूपमेंट (PPE) लेकर भारत आ रहे जहाज को अमेरिका (US) की ओर घुमा दिया गया. वहीं, कई देशों को डर सता रहा है कि चीन से सामान लेकर चला विमान उनके यहां पहुंचेगा भी या नहीं. ऐसा न हो कि बीच में ही कोई देश उनका सामान जब्‍त न कर ले.

ज्‍यादातर देशों में दिख रही मेडिकल सप्‍लाई के लिए ट्रेड वार
इस समय अगर कोई देश चीन से जरूरी मेडिकल उपकरण या पीपीई खरीदता है और खेप लेने के लिए हवाई जहाज भेजता है तो उसे कुछ अजीब चीजों पर भी ध्‍यान देना जरूरी लग रहा है, जिन्‍हें संक्रमण से पहले कभी तव्‍वजो नहीं दी जाती थी. इसमें उन्‍हें हवाई जहाज का रूट तय करने के साथ ही यह भी देखना पड रहा है कि उसे कहां रुकना चाहिए और कहां लैंड नहीं करना है ताकि जहाज सही सलामत मंजिल तक पहुंच जाए. कोरोना वायरस के कारण पूरी दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर आपातकाल की स्थिति है. ऐसे में मास्क, रेस्पिरेटर्स, मैकेनिकल वेंटिलेटर्स की मांग बढ़ गई है. ये सभी जरूरी चीजें आसानी से मिल भी नहीं रही हैं. दुनिया के ज्‍यादातर देशों के बीच मेडिकल उपकरणों के मामले में ट्रेड वार होती दिख रही है. कई देश लगातार ऐसी शिकायतें दर्ज करा रहे हैं. हालात अच्छे नहीं कहे जा सकते. ताकतवर से ताकतवर देश महामारी का सामना करने के लिए अपने नागरिकों को जरूरी चीजें तक मुहैया कराने में नाकाम नजर आ रहा है. फ्रांस में मास्क वॉर को लेकर बातचीत हो रही है.

फ्रांंस और जर्मनी समेत कई देश अमेरिका पर उनके लिए भेजी गई खेप जब्‍त करने का आरोप लगा रहे हैं.

फ्रांस और जर्मनी समेत सभी देशों के निशाने पर है अमेरिका


फ्रांस (France) में ऐसी बातें इसलिए हो रही हैं क्‍योंकि वहां की सरकार फेस मास्क (Face Mask) नहीं खरीद पाई. दरअसल, कुछ अमेरिकी खरीदारों ने इसकी ऊंची कीमत नकद में चुका दी थी. फ्रांस के एक प्रांत की सरकार ने हाल में बताया कि चीन के एक रनवे पर फ्रांस के लिए मास्क ले जा रहे हवाई जहाज का सामान अमेरिकी खरीदारों ने नकद में ज्‍यादा कीमत देकर खरीद लिया. इसके बाद जिस प्लेन को फ्रांस आना था, वो अमेरिका चला गया. कुछ ऐसी ही शिकायत जर्मनी (Germany) ने भी दर्ज कराई है. हालांकि, इस बार सभी के निशाने पर अमेरिकी सरकार है. जर्मनी के अधिकारियों ने आरोप लगाया कि बर्लिन पुलिस के लिए दो लाख मास्क की खेप ले जा रही शिपमेंट को अमेरिका ने थाइलैंड (Thailand) में जब्‍त कर लिया. जर्मनी के इंटीरियर मिनिस्टर एंड्रियास गीजेल ने कहा कि हम इसे अमेरिकी सरकार की नए जमाने की डकैती के रूप में देखते हैं. वैश्विक संकट के समय अमेरिका जंगलियों की तरह बर्ताव कर रहा है. जरूरी है कि इस समय अमेरिकी सरकार अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करे.

इस समय हो गई है मांग और आपूर्ति के असंतुलन की समस्‍या
अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) के प्रशासन ने ऐसे सभी आरोपों को खारिज कर दिया है. ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि अमेरिका देश के बाहर किसी चीज को जब्त नहीं कर रहा है. इसके बाद जर्मनी के सुर ढीले पड गए. हालांकि, फिर भी कहा गया कि जिस मास्क के लिए हमने पैसा चुकाया था, वो बर्लिन नहीं पहुंचा. अगर फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों का ये हाल है तो कमजोर देशों के हाल के बारे में सोचा ही जा सकता है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेन के बिजनेस स्कूल ईसेड के प्रोफेसर मैनेल पीयरो कहते हैं कि इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है. इस समय मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन की समस्‍या हो गई है. यूरोपीय देश ही नहीं दुनियाभर के देश इस समस्‍या को झेल रहे हैं. परेशानी ये है कि ज्‍यादातर देशों के पास मांगा जा रहा अतिरिक्त पैसा नहीं है. वैश्विक महामारी (Pandemic) ने भूमंडलीकरण और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था को हिला दिया है. फेस मास्क, गाउन जैसे पीपीई बनाने वाले देशों ने अपने अस्पतालों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए निर्यात पर पाबंदी लगा दी है. इनमें भारत, तुर्की और अमरीका जैसे देश शामिल हैं.

मुक्‍त व्‍यापार अर्थव्‍यवस्‍था के नियम कानून भी छोटे और कमजोर देशों के लिए मुसीबत बन रहे हैं.


मुक्‍त बाजार अर्थव्‍यवस्‍था के नियम कानून भी बन रहे चुनौती
कोरोना वायरस की बुरी तरह मार झेल रहे स्पेन (Spain) को तुर्की के साथ ही फ्रांस जैसे यूरोपीय साझेदार देशों से भी अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है. फ्रांस ने अपने यहां से गुजरने वाली स्‍पेन को जा रही पीपीई की खेप रोक ली थी. इन हालात में चीन से सामान मंगाने को लेकर पेरू जैसे देशों की परेशानी बढ़ गई है. पेरू के स्वास्थ्य मंत्री विक्टर जमोरा के मुताबिक, स्पेन ने भरोसा दिलाया है कि उसके एयरपोर्ट पर पीपीई किट्स ले जा रहे जहाज को उतारे जाने और आगे जाने में कोई दिक्क़त नहीं होगी. लेकिऩ रास्ते में और भी पड़ाव हैं. उन्‍होंने कहा कि अगर तुर्की ने खेप को रोक लिया तो हम क्‍या करेंगे. नियम और कानून भी तेजी से बदले जा रहे हैं. मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था (Free Trade Economy) के दूसरे नियम भी चुनौती बन रहे हैं. इसके तहत सामान सबसे ऊंची कीमत देने वाले या सबसे ज्‍यादा खरीदने वाले देश को ही मिलेगा. जमोरा कहते हैं कि इस हिसाब से हम ग्राहकों की कतार में हम सबसे आखिर में खड़े हैं. हम 100 वेंटिलेटर खरीद रहे हैं तो दूसरे देश एक लाख यूनिट का सौदा कर रहे हैं. लैटिन अमेरिकी देश ब्राजील के सामने भी ऐसी ही समस्‍याएं पेश आ रही हैं. चीनकी कंपनी ने ब्राजील, फ्रांस और कनाडा के बजाय अमेरिका को तरजीह दी.

दाम बढ़ाने के बाद भी आापूर्ति पूरी नहीं कर पा रहे उत्‍पादक
रिसर्च फर्म 'मेटिक्यूलस रिसर्च' का अनुमान है कि अमेरिका के पास साढ़े चार करोड़ मास्क का रिजर्व है. ये उसकी मांग के डेढ़ फीसदी के करीब है. मेडिकल सप्लाई के मामले में अमेरिका को दुनिया का सबसे ज्‍यादा रिजर्व रखने वाला देश माना जाता है. अब तक अमेरिका में 5 लाख से ज्‍यादा लोग कोरोना वायरस की चपेट में आ चुके हैं. इनमें 23 हजार से ज्‍यादा लोगों की मौत हो चुकी है. अमेरिका इससे भी बुरे समय की तैयारी कर रहा है. चीन से खरीदारी के अलावा अमेरिकी कंपनियों ने युद्धस्तर पर उत्पादन दोगुना कर लिया है. अमेरिकी सरकार को उम्मीद है कि अप्रैल तक मांग दोगुनी हो जाएगी. वहीं, आने वाले 100 दिन में अमेरिका को एक लाख वेंटिलेटर्स की जरूरत पड़ेगी. वहीं, उत्पादकों ने भले ही दाम बढ़ा दिए हों, लेकिन मांग पूरी करना किसी के बस की बात नजर नहीं आ रही है.

अमेरिकी कंपनियों पर निर्यात पाबंदी लगाने के लिए ट्रंंप प्रशासन युद्धकाल के कानून का सहारा ले रहा है.


पेरू ने कहा, हम संरक्षणवाद की ओर वापस लौट आए हैं
मेटिक्यूलस रिसर्च ने बताया कि आयरलैंड की कंपनी मेडट्रॉनिक ने वेंटिलेटर उत्पादन की क्षमता 40 फीसदी तक बढ़ाई है. हर महीने 160 वेंटिलेटर का उत्पादन करने वाली इटली की कंपनी कंपनी सियारा चार महीने में दो हजार वेंटिलेटर बनाना चाहती है. ऑटोमोबाइल कंपनी सिएट ने स्पेन में गाड़ियों का उत्पादन बंद कर दिया है. अब कंपनी वेंटिलेटर्स बना रही है. कुछ देशों में टेक्सटाइल कंपनियां मास्क बनाने में जुट गई हैं. विक्टर जमोरा कहते हैं कि कारोबारी पैमाने पर देखें तो मेरे लिए इस महामारी ने ग्‍लोबलाइजेशन की अवधारणा खत्‍म कर दी है और हम संरक्षणवाद की ओर वापस लौट आए हैं. रेसपिरेटर्स जैसे उपकरण अमूमन कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री के लोग इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब उन्हें अस्पतालों में इस्‍तेमाल किया जा रहा है.

निर्यात रोेकने को युद्धकाल के कानून का सहारा ले रहा यूएस 
ट्रंप प्रशासन ने इसका उत्पादन करने वाली अमरीकी कंपनी '3M' को रेसपिरेटर्स का निर्यात कनाडा और लैटिन अमेरिका को करने से रोकने के लिए कोरिया युद्ध के समय बनाए गए कानून का सहारा लिया. राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल में कहा था कि हमें मास्क की जरूरत है. ऐसे में हम बिलकुल नहीं चाहते हैं कि इसे दूसरे लोग हासिल कर लें. अगर लोग इसे हमें नहीं देंगे तो हम उनसे सख्ती से निपटेंगे. कई दिनों तक तनाव की स्थिति बने रहने के बाद कंपनी और व्हाइट हाउस के बीच समझौता हो गया. इसके तहत '3M' ने वादा किया है कि विदेश में मौजूद अपने कारखानों से रेसपिरेटर्स का निर्यात अमेरिका अमरीका को किया जाएगा. साथ ही दूसरे देशों की आपूर्ति भी जारी रहेगी. कोरोना वायरस की चपेट में लाखों लोग आ चुके हैं. दुनिया भर के देशों के बीच भरोसा घट रहा है.

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