जानिए क्यों और कितने खास हैं कारगिल युद्ध के परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र सिंह यादव

जानिए क्यों और कितने खास हैं कारगिल युद्ध के परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र सिंह यादव
सूबेदार योगेंद्र सिंह यादव ने कारगिल युद्ध में 15 गोलियां खाईं थी लेकिन उन्होंने अपने साथियों के लिए एक मिसाल कायम कर दी.

1999 में कारगिल युद्ध (Kargil War) की जीत में सूबेदार योगेंद्र सिंह यादव (Yogendra Singh Yadav) के अदम्य साहस का भी योगदान रहा जिसके लिए उन्हें परमवीर चक्र प्रदान किया गया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 26, 2020, 12:01 PM IST
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कारगिल विजय दिवस (Kargil Vijay Diwas) पर आज देश उन वीरों को याद कर रहा है जिन्होंने पाकिस्तान (Pakistan) को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. कारगिल युद्ध (Kargil War) भारतीय सेना (Inidan Army) के उस अदम्य साहस और धैर्य की कहानी जिसने भारत और भारतीयों का गर्व का डंका पूरी दुनिया में मचा दिया था. वैसे तो यह भारतीय सेना की एकजुट और एकनिष्ठ लड़ाई रही, लेकिन इसमें से देश के 4 जवानों को परमवीर चक्र और 11 जवानों को महावीर चक्र प्रदान किया गया. इनमें से परमवीर चक्र विजेता सूबेदार योगेंद्र सिंह यादव (Subedar Yogendra Singh Yadav) का नाम पहले आता है.

मुश्किल लक्ष्य मिला था योगेंद्र को
सूबेदार योगेंद्र सिंह ने कारगिल के दुर्गम और कठिन इलाके में अभूतपूर्व साहस का परिचय दिया जहां सारे हालात उनके खिलाफ बहुत ज्यादा और दुश्मन के ज्यादा अनुकूल थे. उन्हें चार जुलाई 1999 को टाइगर हिल जैसे रणनीति दृष्टि से अहम इलाके को दुश्मन से वापस लेने की जिम्मेदारी दी गई थी जिसके तहत उन्हें तीन बंकरों पर कब्जा करना था. बंकर ऊंचाई पर थे और पहाड़ी पर चढ़ कर सीधे हमला करने का मतलब था कि दुश्मन के निशाने के जद में साफ तौर पर आजाना. इस जोखिम के बाद भी योगेंद्र पीछे नहीं हटे और एक हजार फिट की उंचाई के लिए अपने साथियों के साथ ऊपर चढ़ने लगे.

जोखिम उठाने की जिम्मेदारी
जैसा की पूरी उम्मीद थी. दुश्मन ने उनपर और उनके साथियों पर गोलियां बरसाईं लेकिन योगेंद्र ने भी जवाबी कार्रवाई की और पीछे नहीं हटे, इस दौरान उनके टीम कमांडर और दो साथी शहीद हो गए. योगेंद्र को 15 गोलियां लगी लेकिन वे जब तक संभव रहा, तब तक जूझते रहे. योगेंद्र के इस साहस को देखते हुए ही उनकी घातक प्लाटून के दूसरे साथी आगे बढ़े और अंततः टाइगर हिल के शीर्ष पर तिरंगा फहरा कर ही दम लिया.



Kargil war
कारगिल युद्ध में टाइगर हिल पर फतह निर्णायक रही थी. (फाइल फोटो)


क्यों खास है उनका परमवीर चक्र
योगेंद्र को उनके अदम्य साहस के लिए परमवीर चक्र प्रदान किया गया. वे उन गिने चुने वीरों में से एक हैं जिन्हें जीवित रहते यह सर्वोच्च सम्मान मिला. इसके अलावा सबसे खास बात यह है कि वे अब देश के सबसे युवा परमवीर चक्र से सम्मानित वीर हैं. उन्हें केवल 21 साल की उम्र में ही यह सम्मान हासिल हुआ.

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सिक्के ने बचाई जान
ऐसे कई किस्से हैं जहां बहुत सारी गोलियां लगने के बाद भी सैनिक जिंदा बच जाते हैं. योंगेंद्र को भी 15 गोलियों लगने के दौरान लगने लगा था कि वे अब शायद नहीं बचेंगे, लेकिन वे बच गए. ऐसे मामलों में यह बहुत अहम होता है कि गोलियां शरीर के किस हिस्से में लगी हैं. खुद योगेंद्र का कहना है कि उन्हें  एक गोली सीने पर लगी थी लेकिन उनकी जेब में पड़े सिक्कों के कारण वह गोली सीने पर नहीं लगी इस तरह सिक्कों ने उनकी जान बचा ली.

Kargil war
इस जीत में भारतीय वायुसेना की भी बड़ी भूमिका रही (Photo-pikist)


16 साल की उम्र में सेना में
योगेंद्र की पारिविक पृष्ठभूमि भी सेना की ही रही है. उनके पिता  करण सिंह यादव भी भारतीय सेना में थे और उन्होंने 1965 और 1971 की जंग लड़ी थी. उस समय उन्होंने कुमाऊं रेजिमेंट का हिस्सा बन कर इन जंगों में भाग लिया था. इसके बाद 1980 में उत्तर प्रदेश में जन्मे योगेंद्र 16 साल की उम्र में ही सेना में शामिल हो गए और ट्रेनिंग पूरी होते ही उन्हें देश की सेवा करने का मौका मिल गया.

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योगेंद्र के साहस की कहानी फिल्मों में भी दिखी है. ऋत्विक रोशन ने उनका किरदार लक्ष्य फिल्म में निभाया है. लेकिन इस फिल्म में उनका नाम करण शेरगिल था, लेकिन इस किरदार की भूमिका लगभग वही थी जो योगेंद्र की युद्ध में रही. इसके अलावा एलओसी फिल्म में भी मनोज वाजपेयी ने योगेंद्र का किरदार निभाया था.
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