एनकाउंटर के बाद कब-कब हरकत में आई अदालत, क्या हुई सजा?

एनकाउंटर के बाद कब-कब हरकत में आई अदालत, क्या हुई सजा?
पुलिसिया एनकाउंटर के बढ़ते मामलों पर कोर्ट कई बार कार्रवाई कर चुका है

फेक एनकाउंटर (fake encounter) के कई मामले कोर्ट तक जा पहुंचे और अदालत ने दोषी पुलिसवालों (police) को उम्रकैद (life imprisonment ) तक की सजा सुनाई.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 10, 2020, 11:36 AM IST
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कानपुर में 8 पुलिसवालों की हत्या का दोषी गैंगस्टर विकास दुबे शुक्रवार सुबह पुलिस एनकाउंटर (Vikas Dubey encounter) में मारा गया. उज्जैन से पकड़ने के बाद यूपी पुलिस विकास को कानपुर ला रही थी. रास्ते में कथित तौर पर पुलिस की गाड़ी पलट गई और भागने की कोशिश करते विकास पर मजबूरन पुलिस को गोलियां चलानी पड़ूीं. अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया गया. बहुचर्चित मामले में एकाएक एनकाउंटर हालांकि काफी सारे सवाल उठा रहा है. कथित तौर पर ये फेक एनकाउंटर है, जो गुस्साई पुलिस ने अपने लोगों की मौत का बदला लेने के लिए किया. वजह जो भी है लेकिन पुलिसिया एनकाउंटर के बढ़ते मामलों पर कई बार कोर्ट दोषी पुलिसवालों को सजा भी सुना चुका है.



पंजाब में नाबालिग का एनकाउंटर
पुलिस एनकाउंटर का एक मामला काफी चर्चित रहा था. पंजाब के अमृतसर में दो पुलिसवालों रघुबीर सिंह और दारा सिंह ने हरपाल नाम के एक 15 साल के बच्चे का एनकाउंटर किया था. घटना 18 सितंबर 1992 की है. उस रोज पुलिस ने पल्ला गांव के घर से बच्चे को उठाया और उसे चार दिनों तक थाने में प्रताड़ित करने के बाद उसका एनकाउंटर कर दिया. पुलिस का कहना था कि आरोपी ने पुलिस पर फायरिंग की थी. मारने के बाद पुलिस ने उसकी लाश का अज्ञात जगह पर दाह संस्कार भी कर दिया. बाद में घटना की जांच के दौरान पाया गया कि ये फेक एनकाउंटर था, जिसमें नाबालिक की जान गई. घटना के 26 साल बाद साल 2018 में कोर्ट ने दो पुलिसवालों को उम्रकैद की सजा सुनाई. तब दोषियों की उम्र लगभग 80 साल थी. दोनों ही पुलिसवालों पर 61 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया.
पुलिसवालों की हत्या का दोषी गैंगस्टर विकास दुबे शुक्रवार सुबह पुलिस एनकाउंटर में मारा गया




सुर्खियों में रहा रणवीर एनकाउंटर
देहरादून में भी एक एनकाउंटर काफी सुर्खियों में रहा था. रणवीर एनकाउंटर के नाम से जाने गए इस फेक एनकाउंटर में कोर्ट ने 7 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा दी. मामला कुछ ऐसा था कि साल 2009 की 3 जुलाई को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का मसूरी में दौरा था. पुलिस वाहनों को चेकिंग कर रही थी, तभी 2 मोटरसाइकिल सवार युवक भागने की कोशिश करने लगे. इसी बीच हुई हाथापाई में युवकों ने एक चौकी प्रभारी की रिवॉल्वर लूट ली और भाग निकले.

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बदमाशों की खोज के दौरान रणवीर को पुलिस ने उसी रोज एनकाउंटर में मार गिराया था. उसके दो साथी फरार बताए गए. बाद में सामने आया कि मुठभेड़ फर्जी थी, जिसमें रणवीर को खूब पिटाई के बाद 22 गोलियां मारी गई थीं. मृतक के पिता ने इस मामले में पुलिस पर हत्या का मुकदमा दर्ज करवाया. जांच के बाद कोर्ट ने जून 2014 को 18 पुलिसवालों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा दी. बाद में 11 पुलिसकर्मियों को मामले से जुड़ा न पाते हुए उन्हें रिहाई मिली, जबकि 7 पुलिसवालों की उम्रकैद की सजा बरकरार है.

रणवीर एनकाउंटर के नाम से जाने गए फेक एनकाउंटर में कोर्ट ने 7 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा


सिख तीर्थयात्रियों को कहा आतंकी और की हत्या
इसी तरह से पीलीभीत फेक एनकाउंटर में स्पेशल कोर्ट ने 47 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा दी. साथ ही पद के अनुसार सभी पर अलग-अलग जुर्माना भी लगा. पुलिसवालों ने आतंकी बताकर 11 सिखों की हत्या की थी. घटना 12 जुलाई 1991 की है. सिख तीर्थयात्रियों के एक जत्थे को पीलीभीत में रोका गया और बस से 11 सिखों को उतार लिया गया.

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बाद में तीन अलग-अलग थानों में फेक एनकाउंटर में उन्हें मृत बता दिया गया. कहा कहा कि मारे गए सिख असल में आतंकी थे और उन्होंने पुलिस पर फायरिंग की थी. गुस्साए घरवालों के कहने पर एक वरिष्ठ वकील ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दायर की. साल 2016 में आखिरकार दोषी पुलिसवालों को उम्रकैद की सजा हुई. हालांकि तब तक आरोप के बाद भी कई पुलिसवाले प्रमोशन पा चुके थे, वहीं 10 पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी थी.

भोजपुर थाना में पुलिस ने एनकाउंटर में चार मजदूरों को कुख्यात अपराधी बताते हुए उनकी हत्या कर दी थी


उद्योगपतियों का एनकाउंटर
एक अन्य मामले में कोर्ट ने साल 1997 में एक फर्जी मुठभेड़ में दो उद्योगपतियों को मार डालने के मामले में एक सहायक पुलिस आयुक्त सहित दिल्ली पुलिस के दस अधिकारियों को साल 2011 में उम्रकैद की सजा सुनाई. मामला कुछ ऐसा है कि 31 मार्च 1997 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक कार पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं. पुलिस ने तर्क दिया कि उन्हें संदेह था कि कार में अपराधी बैठे हैं. गलत पहचान में गोलियां चलाकर जान लेने के आरोप में दिल्ली हाई कोर्ट ने सितंबर 2009 में 10 पुलिसवालों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा दी. मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाया गया, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने भी सजा बरकरार रखी.

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इस तरह के कई मामले हैं, जिसमें दोषी मानते हुए पुलिसवालों को कोर्ट ने सजा दी. जैसे भोजपुर एनकाउंटर का मामला भी काफी चर्चित रहा था. 8 नवंबर 1996 को गाजियाबाद के भोजपुर थाना में पुलिस ने फेक एनकाउंटर में चार मजदूरों को कुख्यात अपराधी बताते हुए उनकी हत्या कर दी थी. साथ ही शवों को लावारिस कहते हुए अज्ञात जगह ले जाकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था. इनमें तीन नाबालिग थे. हंगामे के बाद मामले की जांच सीबीआई कोर्ट में शुरू हुई. आखिरकार 22 फरवरी 2017 को चारों पुलिसकर्मियों को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.
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