Explained: कोरोना वैक्सीन का गर्भपात से क्या संबंध है?

धार्मिक मान्यता के कारण कैथोलिक समुदाय में टीके को लेकर थोड़ी परेशानी दिख रही है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

धार्मिक मान्यता के कारण कैथोलिक समुदाय में टीके को लेकर थोड़ी परेशानी दिख रही है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

कोरोना वैक्सीन (corona vaccine) ही नहीं, बल्कि किसी भी टीके के विकास के दौरान मृत भ्रूण की कोशिकाओं पर उसका प्रयोग होता है. यहां तक कि कोरोना के लिए मंजूरी पा चुकी रेमडेसिविर दवा भी गर्भपात के बाद लैब पहुंचे भ्रूण के टिशू से तैयार की गई थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 9, 2021, 12:28 AM IST
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जॉनसन एंड जॉनसन (Johnson and Johnson) के कोविड-19 टीके की मंजूरी को लेकर ज्यादातर देशों में काफी जोश दिख रहा है. इसकी वजह ये है कि इस टीके का केवल एक ही डोज लेना होगा, जबकि बाकी सारे ही टीके दो बार में दिए जा रहे हैं. हालांकि इस ब्रांड के टीके को लेकर कैथोलिक मान्यता वाले लोग चिंतित हैं. माना जा रहा है कि इस वैक्सीन का संबंध गर्भपात है.

हो रहा जॉनसन एंड जॉनसन के टीके का विरोध 
अमेरिका में कैथोलिक बिशप्स की कॉफ्रेंस में बीते सप्ताह जॉनसन एंड जॉनसन को लेकर काफी बात हुई. उनका कहना है कि अगर दूसरे टीके न आए होते तो इस ब्रांड का टीका लिया जा सकता था, लेकिन जब दूसरे टीके हैं तो गर्भपास से जुड़े इस टीके को केवल सिंगल डोज के चलते नहीं लगवाना चाहिए. इसके बाद से धार्मिक मान्यता के कारण कैथोलिक समुदाय में इसे लेकर थोड़ी परेशानी दिख रही है.

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वैक्सीन इंसानी कोशिकाओं को लेकर लैब में उनमें विकास करके तब जांच करने लगे कि वैक्सीन कितनी असरदार होती है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन का गर्भपात से क्या संबंध है?


इसे समझने के लिए हमें एक बार वैक्सीन के इतिहास में झांकना होगा. 19वीं सदी की शुरुआत में चिकनपॉक्स जानलेवा बीमारी हुआ करती थी. तब ये पाया गया कि अगर हल्के लक्षणों वाले काउपॉक्स के वायरस का टीका दिया जाए तो स्मॉलपॉक्स का खतरा कम हो जाता है. तब ये सारे प्रयोग पशुओं पर या फिर सीधे इंसानों पर हो रहे थे. फिर 20वीं सदी में वैज्ञानिकों को टेस्ट के लिए एक दूसरा आसान तरीका मिला. वे इंसानी कोशिकाओं को लेकर लैब में उनमें विकास करके तब जांच करने लगे कि वैक्सीन कितनी असरदार होती है.

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भ्रूण के शरीर से कोशिकाएं लेकर प्रयोग
आमतौर पर इंसान के शरीर से कोशिकाएं लेकर उन्हें लैब में बढ़ाने की कोशिश की जाए तो वे थोड़े समय में बढ़ना बंद कर देती हैं और मरने लगती हैं. वहीं भ्रूण के शरीर से कोशिकाएं ली जाएं तो वे बढ़ती जाती हैं. इसके बाद यही होने लगा. मृत भ्रूण से कोशिकाएं लेकर लैब में कल्चर की जाने लगीं. जैसे की रुबेला का टीका भ्रूण पर प्रयोग से ही तैयार हुआ. इसी तरह से कोरोना के लिए मंजूरी पा चुकी रेमडेसिविर दवा भी साल 1970 में गर्भपात के बाद लैब पहुंचे भ्रूण की किडनी टिशू से तैयार की गई थी.

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टीका बनाने और उसकी जांच के दौरान भ्रूण की कोशिकाओं का इस्तेमाल होता आया है- सांकेतिक फोटो (pikrepo)


कंपनी पर ये है आरोप
यानी टीका बनाने और उसकी जांच के दौरान भ्रूण की कोशिकाओं का इस्तेमाल होता आया है. तब जॉनसन एंड जॉनसन को लेकर कैथोलिक देशों में चिंता क्यों है? इसकी भी वजह है. द फिलाडेल्फिया इंक्वायरर के मुताबिक इस बारे में the antiabortion Lozier Institute ने काफी शोध की और पाया कि जहां फाइजर और मॉडर्ना ने केवल वैक्सीन के टेस्ट के दौरान भ्रूण का इस्तेमाल किया, वहीं जॉनसन एंड जॉनसन ने रिसर्च, उत्पदान और जांच यानी पूरी प्रक्रिया में धड़ल्ले से भ्रूण की कोशिकाएं काम में लीं.

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यही कारण है कि गर्भपात को गलत मानने वाले समुदाय और संस्थाएं जॉनसन एंड जॉनसन की कोरोना वैक्सीन के सिंगल शॉट होने के बाद भी उसे लेने से परहेज कर रही हैं. वे मान रहे हैं कि इससे गर्भपात को बढ़ावा मिलेगा और टीका लेने के कारण वे भी नैतिक रूप से दूषित हो जाएंगे.

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गर्भपात को गलत मानने वाले समुदाय और संस्थाएं जॉनसन एंड जॉनसन टीके का विरोध कर रही हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


इस्लाम में अलग मामले पर चिंता
वैसे कैथोलिक समुदाय ही नई वैक्सीन को लेकर डरा हुआ नहीं है, बल्कि किसी भी तरह की वैक्सीन को लेकर इस्लाम में भी बहस हो रही है. इसकी वजह ये है कि टीकों के भंडारण और दूसरी प्रक्रिया के दौरान उसे सेफ रखने के लिए सुअर के मांस से बने जिलेटिन का उपयोग होता है. ये जिलेटिन कोरोना ही नहीं, बल्कि लगभग सारे ही टीकों को सेफ रखने में इस्तेमाल होता आया है. सुअर के मांस से बने इस जिलेटिन को स्टेबलाइजर कहते हैं. इसका होना वैक्सीन की क्वालिटी बनाए रखने को सुनिश्चित करता है.

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हलाल वैक्सीन की मांग 
भंडारण में कथित तौर पर पोर्क के उपयोग के कारण इस्लामिक देशों में वैक्सीन को लेकर असमंजस है और कई देश हलाल वैक्सीन की मांग भी कर रहे थे. इंडोनेशिया इसमें सबसे आगे था. बता दें कि ये देश 225 मिलियन आबादी के साथ दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है. पहले भी वहां टीके को लेकर बवाल हो चुका है. साल 2018 में मीजल्स के टीके को इंडोनेशियाई उलेमा काउंसिल ने हराम कहा था क्योंकि उसमें जिलेटिन का उपयोग होता है. हालांकि इस्लामिक धर्मगुरुओं के वैक्सीन को जायज कहने के बाद से लोगों का डर खत्म हो गया.
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