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कोविड महामारी ने कम नहीं की थी जलवायु परिवर्तन की रफ्तार- UN रिपोर्ट

लोगों को लग रहा था कि 2021 के शुरुआती महीनों में कोविड-19 महामारी के कारण प्रदूषण कम होने से जलवायु परिवर्तन का असर कम हुआ होगा.  (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

लोगों को लग रहा था कि 2021 के शुरुआती महीनों में कोविड-19 महामारी के कारण प्रदूषण कम होने से जलवायु परिवर्तन का असर कम हुआ होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की यूनाइटेड साइंस 2021 की रिपोर्ट से चेतावनी मिली है कि कोविड-19 महामारी (Pandemic) की वजह से जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की रफ्तार पर कोई असर नहीं हुआ है.

  • News18Hindi
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    पिछले साल जब कोविड-19 महामारी (Covid-19 Pandemic) के दौरान पर्यावरण आंकलनों की कुछ रिपोर्ट में प्रदूषण की मात्रा में भारी गिरावट बताई गई थी. इंटरनेट पर उन इलाकों की कई तस्वीरें शेयर की गईं जिसमें साफ हवा के कारण नजारे बहुत साफ दिखने लगे थे.  भारत में भी उत्तर प्रदेश के कई मैदानी इलाकों से दूर हिमालय के पर्वत दिखने लगे थे जो पहले नहीं दिखा करते थे. लोगों को लगा कि लॉक्डाउन के कारण बंद हुई मानवीय गतिविधियों ने जलवायु परिवर्तन को कुछ रोके रखा होगा. लेकिन संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की हालिया रिपोर्ट में साफ बताया गया है कि  महामारी ने जलवायु परिवर्तन (Climate change) की गति बिलकुल भी धीमी नहीं की है.

    जलवायु परिवर्तन की रफ्तार रही बेअसर
    गुरुवार को ही संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी इस रिपोर्ट में चेताया गया है कि कोविड-19 महामारी ने जलवायु परिवर्तन की रफ्तार धीमी नहीं की है. कोरोना वायरस के कारण पिछले साल जनवरी के बाद से दुनिया में लॉकडाउन लगना शुरु हो गया था. इसकी वजह से आर्थिक गतिविधियों के बंद से होने से दुनिया के तमाम बड़े शहरों में वाहन बंद होने के साथ वहां की फैक्टियां भी बंद हो गई थीं.

    केवल अस्थायी असर
    यूएन की इस रिपोर्ट में विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ओर से कहा गया है कि इन लॉकडाउन और आर्थिक मंदी की वजह से केवल पिछले साल कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन केवल अस्थायी रुप से कम हुआ था. डब्यू एमओ के महासचिव पेत्तेरी टालस ने भी कहा कि कुछ लोग  सोच रहे थे कि कोविड-19 लॉकडाउन का वायुमंडल पर सकारात्मक असर हुआ होगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं था.

    उत्सर्जन स्तर कम नहीं हुए
    यूनाइटेड इन साइंस 2021 रिपोर्ट में कहा गया है कि जनवरी से जुलाई तक ऊर्जा और उद्योग क्षेत्र के वैश्विक जीवाश्म ईंधन के CO2 उत्सर्जन स्तर, महामारी के पहले 2019 के उसी दौर के स्तरों के मुकाबले या तो बराबर थे या फिर उससे ज्यादा ही थे. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतरेस का कहना है कि यह जलावायु एक्शन के लिए एक नाजुक साल है. नतीजे चेता रहे हैं कि हम कहां तक पहुंच सके हैं.

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    महामारी में केवल मानवजनित CO2 उत्सर्जन कम हुआ, लेकिन ग्रीनसाउस गैसों के उत्सर्जन की तेजी कायम रही. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    प्रभाव नहीं था प्रभावी
    एब्ल्यू एमओ का कहना है कि साल 2020 के शुरुआती कोविड-19 लहर के समय उत्सर्जन में कमी केवल एक छोटा दौर तक ही थी. रिपोर्ट में कहा बताया गया कि इससे उस पूरे साल में ग्रीनहाउस गैसों की वार्षिक वायुमंडलीय मात्राओं की बढ़त में कमी जरूर आईं,  लेकिन यह प्रभाव प्राकृतिक विविधता के लिहाज से बहुत ही कम था.

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    ग्रीनहाउस गैसें बढ़ती ही रहीं
    रिपोर्ट में बताया गया है कि 2021 में सड़क परिवर्तन से उत्सर्जित CO2 की मात्रा महामारी के फैलने के स्तर से कम थी. लेकिन ग्रीन हाउस गैसों का ग्लोबल वार्मिंग में योगदान लगातार बढ़ता  ही रहा. गुतरेस का कहना है कि दुनिया अब भी पेरिस समझौते के लक्ष्यों से बहुत पीछे चल रही है.

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    मानव जनित प्रदूषण उत्सर्जन कम होने से जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की दर पर कोई प्रभाव नहीं हुआ. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    बड़े प्रयासों की जरूरत
    गुतरेस ने कहा कि दुनिया में वैश्विक गर्मी की बढ़त को 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक रोकना असंभव ही होगा जब तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को तुरंत और तेजी से बड़े पैमान पर रोकने का काम नहीं होगा. ऐसा नहीं होने पर हमारे लोगों और ग्रह को जल्दी ही विनाशकारी नतीजों को भुगतने के लिए तैयार होना होगा.

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    दुनिया के कई देश अपने यहां शून्य कार्बन उत्सर्जन की समय सीमा तय करने में लगे हैं. ज्यादातर देशों इसे साल 2050 से 2060 तक की अंतिम समय सीमा को चुनने का ऐलान किया है. इसी बीच अमेरिका के पिछले कुछ सालों में पेरिस समझौते से हटने का भी जलवायु परिवर्तन को रोकने के प्रयासों पर असर हुआ था. अब अमेरिका इसमें वापस आने से ये प्रयास तेज होने की उम्मीद है.

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