कोविड-19 महामारी ने कैसे जीवाश्म ऊर्जा उत्पादन घटाने में दिखाई तेजी

कोविड-19 महामारी (Covid-19 Pandemic) ने दुनिया को मौका दिया है कि वे कोयला (Coal) आधारित ऊर्जा संयंत्र बंद कर सकें. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

कोविड-19 महामारी (Covid-19 Pandemic) ने दुनिया को मौका दिया है कि वे कोयला (Coal) आधारित ऊर्जा संयंत्र बंद कर सकें. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

कोविड-19 महामारी (Covid-19 Pandemic) की वजह से कोयले (Coal) वाला ऊर्जा उत्पादन (Energy Production) पर बहुत बुरा असर हुआ जिससे इसे खत्म करने की दिशा में बहुत तेजी आई है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 11, 2021, 6:51 AM IST
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पिछले कई दशकों से जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) का उपयोग बंद करने पर जोर दिया जा रहा. वैज्ञानिक जल्द से जल्द पर्यावरण (Environment) के लिए ज्यादा उपयुक्त हरित ऊर्जा (Green Energy) के उपयोगों को अपनाने की बात कर रहे हैं जिससे दुनिया में प्रदूषण (Pollution) कम हो सके और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) एवं ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के दुष्परिणामों से बचा जा सके. पिछले साल फैली कोविड-19 (Covid-19) महामारी का असर ऊर्जा उत्पादन क्षेत्र पर पड़ा है. ताजा अघ्ययन में पाया गया है कि ऊर्जा के लिए कोयला (Coal) उपयोग घटाने की दिशा में तेजी लाने का काम किया है.

एक बहुत बड़ा मौका

बर्लिन और पोट्सडैम के अर्थशास्त्रियों ने कोविड-19 महामारी काल में ऊर्जा व्यवस्था और बिजली की मांग का अध्ययन किया. इस अध्ययन की पड़ताल में उन्होंने पाया कि जहां महामारी  की वजह से लोगों के जीवन और अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर हुआ, वहीं इसने कोयले के उपयोग को तेजी से कम करने का एक बढ़िया मौका भी दिया. सही नीति उपायों के समर्थन से ऊर्जा क्षेत्र के उत्सर्नज और ज्यादा तेजी से कम हो सकते हैं जितना की पहले सोचा जा रहा था.

कोयले पर सबसे ज्यादा असर
पोट्सडैम के इंस्टीट्यूट ऑफ क्लाइमेंट इम्पैक्ट रिसर्च के शोधकर्ता और इस अध्ययन के प्रमुख लेखक क्रिस्टोप बेर्ट्राम ने बताते हैं कि कोरोना आपदा की कोयले पर अन्य ऊर्जा स्रोतों की तुलना में बहुत बुरा असर हुआ और इसका कारण आसान है. अगर बिजली की मांग कम होती है तो सबसे पहले कोयला संयंत्र ही बंद होते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि ईंधन को जलानी की प्रक्रिया महंगी हो जाती है.

इस बात ने पैदा किया बड़ा फर्क

बोर्ट्राम का कहना है कि संयंत्र संचालकों को हर टन कोयले की कीमत चुकानी पड़ती है. वहीं एक बार पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित हो जाते हैं तो उन्हें चलाने का खर्चा बहुत कम होता है और मांग कम होने पर ही उनका संचालन जारी रखा जा सकता है. यही वजह है कि साल 2020 में बिजली उत्पादन में जीवाश्म ईंधन पिछड़ गए है.



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जीवाश्म ईधन (Fossil Fuel) की वजह से ही ऊर्जा उत्पादन (Energy production) में कार्बन उत्सर्जन ज्यादा होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


कार्बन उत्सर्जन में कमी

साल 2020 में ऊर्जा उत्पादन से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 7 प्रतिशत कम हो गया है. केवल भारत अमेरिका और यूरोपीय देशों को देखा जा तो यहां नाटकीय बदलाव की तस्वीर दिखती है. यहां महीने की मांग साल 2019 की तुलना में 20 प्रतिशत कम हुई और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 50 प्रतिशत तक कम हो गया.

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अब नहीं लौटेगा पुराना स्तर

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि अब यह उत्सर्जन साल 2018 के उच्चतर स्तर पर नहीं पहुंच सकेगा. इस अध्ययन के सहलेखक गुनार लॉडरेर का कहना है कि वर्तमान संकट के कारण उम्मीद की जा रही है कि साल 2021 तक बिजली की मांगल 2019 के स्तर पर ही रहेगी. अभी कम कार्बन उत्पादन पर हो रहे निवेश को देखते हुए उस साल भी जीवाश्म ऊर्जा उत्पादन कम होगा.

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दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) से बचाने के लिए स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग बहुत जरूरी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


केवल तभी बढ़ सकता है यह उत्पादन

लॉडरेर ने बताया कि जब तक स्वच्छ बिजली के उत्पादन की वृद्धि बिजली की मांग में बढ़ती रहती है.  ऊर्जा क्षेत्र में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम होता जाएगा. 2022 से 2025 के बीच में कुछ नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों के आने के बाद भी अगर केवल बिजली में असामान्य रूप से मांग बढ़ती है तो जीवाश्म ऊर्जा उत्पादन वापस महामारी-पूर्व स्तरों पर पहुंच जाएंगे.

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शोधकर्ता इस तरह के बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं क्योंकि जीवाश्म ऊर्जा पर्यावरण के लिहाज से नुकसानदायक तो है ही, आर्थिक रूप से भी बहुत जोखिम भरी है. महामारी के हालातों ने राजनेताओं को  एक बड़ा मौका दिया है जिससे वे जीवाश्म ईधन के उपयोग को कम कर सकते हैं.
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