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एक साल से भी पहले बनी कोविड-19 वैक्सीन, HIV में 4 दशक के बाद भी इंतजार क्यों

कोविड-19 और एचाईवी (HIV) दोनों ही वायरस संक्रमण है लेकिन एचआईवी की वैक्सीन विकसित नहीं हो सकी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

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    कोविड-19 (Covid-19) अकेली महामारी नहीं हैं जिसने इंसानी वैज्ञानिक ज्ञान को चुनौती दी है. इससे पहले भी कई बीमारियां ऐसी हैं जो मानवजाति के खतरा बनी और अब तक बनी हुई हैं. जहां कोविड-19 की वैक्सीन (Covid-19 Vaccine) विकसित होने में एक साल से भी कम का समय लग गया, वहीं एचआईवी एड्स (HIV AIDS) ऐसी बीमारी है जिसकी वैक्सीन पर काम पिछले चार दशकों से चल रहा है लेकिन अभी तक उसकी वैक्सीन सामने नहीं आई है.

    कितने मरीज हैं एड्स के दुनिया में
    एड्स का पहला मामला आए चार दशक हो चुके हैं. ये सच है कि एक समय इस संक्रमण का मतलब मृत्यु से कम नहीं माना जाता था, लकिन अब इस बीमारी को हमारे वैज्ञानिकों ने ‘मैनेजेबल’ की श्रेणी में ला दिया है. लेकिन दुनिया भर में इस खतरनाक बीमारी के करीब 3.8 करोड़ मरीजों को अब भी इसकी वैक्सीन का इंतजार है.

    अभी क्या इलाज है इसका
    चिकित्सा की दुनिया में अब लोगों के पास एक खास किसी का इलाज है जिसे एंटीरेट्रोवायरल थैरेपी (ART) कहते हैं. इसको लेने से मरीज के शरीर में एड्स के वायरस की मात्रा कम हो जाती है. इससे एड्स मरीज स्वस्थ रहते हैं और वे अपने साथी में एचआईवी संक्रमण नहीं फैला पाते हैं. इसके अलावा जिन लोगों में एचआईवी संक्रमण की संभावना अधिक होती है वे प्री एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PrEP)  भी ले सकते हैं. इस दवा को रोज लेने से संक्रमण की संभावना 99 प्रतिशत तक कम हो जाती है.

    तो फिर वैक्सीन क्यों
    इसकी एक बड़ी वजह है. सबसे पहले तो ऊपर बताए एचाईवी के इलाज तक दुनिया के कोने तक पहुंच नहीं है और जिन सामाजिक आर्थिक रूप से सक्षम इलाकों में सुविधाएं और दवा उपलब्ध हैं वहां पर भी पाया गया है कि संक्रामक रोग दूर करने के मामले में वैक्सीन से कारगर कुछ नहीं हैं. फिलहाल जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी एचआईवी वैक्सीन के दो मानवीय ट्रायल कर रही है. इनमें से एक के तो शुरुआती नतीजे इस साल के अंत में आ सकते हैं.

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    एचाईवी (HIV) संक्रमण में भी कोविड-19 की तरह स्पाइक प्रोटीन की भूमिका होती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    कितना चुनौतीपूर्ण काम है ये
    कोविड-19 की वैक्सीन विकसित होने में इतना कम वक्त इसले लगा क्योंकि दुनिया भर के देशों में संक्रिमित मामलों तक वैक्सीन विकसित करने वालों की पहुंच थी. इसमें कई वैक्सीन उन तकनीकों के आधार पर विकसित की गई थीं जो पहले एचआईवी के लिए जांची जा चुकी थी. फिर  भी एचआईवी संक्रमण और कोविड-19 संक्रमण में बहुत बड़ा अंतर है.

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    तो क्या है परेशानी
    एचआईवी वैक्सीन को विकसित करने वाली वैश्विक संस्था के एचवीटीएन के प्रमुख अन्वेषणकर्ता लैरी कोरे ने एएफपी को बताया कि मानव की प्रतिरक्षा प्रणाली एचआईवी से खुद लड़ने में सक्षम नहीं है. जबकि यह शुरू से ही पता चल गया था कि मानवीय प्रतिरक्षा प्रणाली कोविड-19 से खुद लड़ सकती है.  कोविड वैक्सीन एंटीबॉडी को वायरस के स्पाइक प्रोटीन से बांधने के लिए तैयार करती है जिससे मानवीय कोशिकाएं संक्रमित होने से बच जाती हैं.

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    कई एचाईवी (HIV) की वैक्सीन के ट्रायल्स के नतीजों का भी इंतजार है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    लेकिन एचआईवी का क्या
    एचआईवी की सतह पर भी स्पाइक के आकार का एक प्रोटीन होता है जिसके आधार पर एचाईवी वैक्सीन के विकसित होने की कोशिश हो रही है, लेकिन कोविड के केवल कुछ ही वेरिएंट दुनिया भर में फैल रहे हैं.  वहीं एचआईवी के साथ ऐसा नहीं है. एक संक्रमित व्यक्ति में ही हजारों की संख्या में इसके वेरिएंट मिल जाते हैं. चूंकि यह एक रेट्रोवायरस है यह तेजी से व्यक्ति के डीएनए से खुद को जोड़ लेता है. कारगर वैक्सीन को वायरस को खत्म और कम करने के साथ ही व्यक्ति के शरीर में हमेशा ही रहना होगा.

    ट्रायल का ये हाल
    एचआईवी वैक्सीन विकसित करने के भी कई प्रयास हुए हैं, लेकिन वे नाकाम साबित हुए हैं. जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन उम्मीवार का वर्तमान ट्रायल अफ्रीका में चल रहा है जिसके नतीजे कुछ महीनों में आएंगे, वहीं अमेरिका, यूरोप, दक्षिण अफ्रीका के ट्रायल के आंकड़े साल 2024 तक आएंगे.

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    इसके अलवा कुछ अन्य  तरह की वैक्सीन पर भी काम चल रहा है. लेकिन कारगरता का परीक्षण लंबा समय लेगा. लेकिन उम्मीद की जा रही है कि mRNA तकनीक जिसमें शरीर को कोशिकाओं को ही वैक्सीन की फैक्ट्री में बदल दिया जाता है, और जो कोविड-19 के खिलाफ भी कारगर रही थीं एचआईवी के मामले में फर्क पैदा कर सकती है.