फेफड़े ही नहीं, खून के लिए भी जानलेवा होने लगा है कोरोना, मिल रहे हैं ये संकेत

फेफड़े ही नहीं, खून के लिए भी जानलेवा होने लगा है कोरोना, मिल रहे हैं ये संकेत
कोरोना वायरस का खून में यह घातक असर पहली बार देखा गया है.

अब तक कोरोना वायरस(Corona virus) का सबसे घातक प्रभाव फेफड़ों पर ही माना जाता है, लेकिन अब मरीजों में मिले खून के थक्कों (Blood Clot) ने शोधकर्ताओं की चिंता बढ़ा दी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 24, 2020, 3:50 PM IST
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नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Corona virus) के इलाज को ढूंढते समय वैज्ञानिकों को नई बातें पता चल रही हैं. सार्स कोव -2 (SARS CoV-2) कोरोना परिवार का वह वायरस है जिसकी वजह से कोविड-19 (Covid-19) महामारी दुनिया में कहर ढा रही है. इसके प्रभाव को लेकर भी वैज्ञानिक कम परेशान नहीं रहे. अब कोविड-19 के नए लक्षण ने वैज्ञानिकों को हैरानी में डाल दिया है.

किस बात ने किया है डॉक्टरों को हैरान-परेशान
अब कोविड-19 के गंभीर मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों ने उनमें गंभीर जटिलता पायी है. लाइव साइंस के लेख के मुताबिक कुछ मरीजों में खून के थक्के (Blood Clots) मिले हैं. इन थक्कों का पाया जाना बहुत खतरनाक तो है ही बल्कि बहुत हैरान करने वाला भी है.

कितना बड़ा खतरा है यह



खून के थक्कों यानी ब्लड क्लॉट का बहुत से मरीजों में मिलने डॉक्टर एक बड़े खतरे का संकेत मान रहे है. इससे मरीजों में हार्ट अटैक और स्ट्रोक की संभावना बढ़ जाती है. न्यूयार्क के वील कर्नल मेडिसन के हीमेटोलॉजिस्ट डॉ. जैफ्री लॉरेंस का कहना है कि आईसीयू में भर्ती बहुत से मरीजों में क्लॉटिंग समस्या दिख रही है. ये मरीज कोविड19 के ही मरीज हैं और यह इससे पहले नहीं देखा गया.



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सार्स कोव -2 अब तक फेफड़ों में ही सबसे घातक प्रभाव डालता था,


कैसे मरीजों में मिली यह समस्या
कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कुछ डॉक्टरों ने पाया है कि उनके कोविड-19 मरीजों के पैरों में खून के थक्के मिल रहे हैं. वह भी तब जब वे खून को पतला करने वाली दवाएं ले रहे थे. वहीं कुछ मरीज जो डायलिसिस पर थे उनकी मशीन में समस्या आने लगी क्योंकि ये थक्के मशीन की ट्यूबों को जाम करने लगे. इसके अलावा कई मरीजों के फेफड़ों में भी बहुत जगहों पर खून के थक्के मिले हैं.

युवा मरीजों में मिले इस तरह के लक्षण
हैरानी की बात यह है कि ये मरीज युवा हैं. जिनकी उम्र 30-40 साल की है. इन्हें कोरोना वायरस संक्रमण के बाद स्ट्रोक की समस्या हुई थी. आमतौर पर कोविड19 का सबसे ज्यादा खतरा उम्रदराज लोगों में बताई जा रही थी. जब शुरू में यह वायरस फैल रहा था तब मरने वालों में अधिक उम्र (यानी 60 साल से ज्यादा) के लोग ज्यादा थे. इनमें से भी जिन लोगों को हृदय रोग था उन्हें ज्यादा खतरा था.

वायरस के प्रभाव में भी है विविधता
कोविड-19 के मरीजों पर कोरोना वायरस का असर अलग अलग दिखा. खुद वायरस ने भी असामान्य तरीके से खुद को म्यूटेट किया. वहीं कहीं ये वायरस तेजी और आसानी से फैला तो कहीं नहीं. इतना ही नहीं यह वायरस कुछ लोगों पर ज्यादा घातक साबित हुआ, तो कुछ लोगों पर उतना नहीं. इसके अलावा यह शरीर के कुछ खास हिस्सों में ही ज्यादा घातक पाया गया है.

इन रोगियों के लिए है यह बहुत खतरनाक
कोरोना मरीजों में ब्लड क्वॉट का पाया जाना हृदय रोगियों  और उन मरीजों के लिए ज्यादा खतरनाक है जिनमें स्ट्रोक की संभावनाएं ज्यादा है. दोनों तरह के मरीजों के लिए ब्ल़ड क्लॉट ज्यादा खतरनाक होता है. ब्लड क्लॉट मस्तिष्क में खून का बहाव रोक सकता है तो वह हृदय के मरीजों में हार्ट फेल की संभावना बढ़ा देता है.

तो क्या किया जा रहा है अभी
कोविड-19 के मरीजों में क्लॉट पाए जाने के बाद कुछ अस्पतालों ने मरीजों को खून पतला करने वाली दवाएं देना शुरू कर गया है जिससे कि उनमें क्लॉट की संभावनाएं कम की जा सकें. आईसीयू के मरीजों में ब्लड क्लॉट होना आम है, लेकिन कोविड19 मरीजों में जिस तरह से ज्यादा हो रहा है, वो चिंताजनक है.

पहले फेफड़ों में, अब खून में
अभी तक यह बीमारी श्वास की बीमारी के तौर पर देखी जा रही थी. माना जा रहा था कि इसका सबसे बुरा और घातक प्रभाव फेफड़ों पर होता है, खून पर नहीं. वहीं डायबिटीज, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं वाले मरीजों को ब्लड क्लॉट का जोखिम ज्यादा है. अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि मरीजों में ब्लड क्लॉट क्यों ज्यादा तादाद में पाया जा रहा है.

अब शोध हो गया है जरूरी
डॉक्टरों का मानना है कि इस विषय पर जल्दी से शोध किए जाने की जरूरत है. जिसमें खास तौर पर यह देखा जाना जरूरी है कि क्या खून पतला करने वाली दवाएं कोविड-19 मरीजों के लिए सहायक हो सकती हैं या नहीं. वहीं क्लॉट की एक वजह यह भी हो सकती है कि इस बीमारी में इम्यून सिस्टम अतिसक्रिय हो जाता है. इससे क्लॉटिंग की आशंका बढ़ सकती है.

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