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Global Warming के लिए गायों पर क्यों लादी जा रही है सबसे ज्यादा तोहमत

Global Warming के लिए गायों पर क्यों लादी जा रही है सबसे ज्यादा तोहमत

विशेषज्ञों का कहना है कि गायों (Cows) और अन्य मवेशियों से डकार और गैस के रूप में काफी मात्रा में मीथेन गैस निकलती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

विशेषज्ञों का कहना है कि गायों (Cows) और अन्य मवेशियों से डकार और गैस के रूप में काफी मात्रा में मीथेन गैस निकलती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को लेकर ग्लासगो में हुए वैश्विक सम्मेलन में दुनिया के 105 देशों में मीथेन उत्सर्जन (Methane Emission) कम करने का संकल्प लिया है. इससे एक बार फिर मीथेन उत्सर्जन और उसके कारण चर्चा में हैं. जब भी मीथेन उत्सर्जन की बात होती है, तब गाय (Cows) और अन्य मवेशियों द्वारा गैस और डकार के रूप में होने वाले मीथेन उत्सर्जन को लेकर पर्यावरणविद चिंता जताने लग जाते हैं. अध्ययन बताते हैं कि गायों की भोजन और पाचन की प्रक्रिया कारण निकलने वाली मीथेन सकल रूप से एक प्रभावी उत्सर्जन का रूप ले लेते हैं.

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    जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का सबसे बड़ा प्रभाव ग्लोबल वार्मिंग ही है. इसके लिए ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जिम्मेदार माना जाता है. इन गैसों में CO2 के बाद मीथेन गैस (Methane) का स्थान आता है. CO2 की तुलना में कम होने के बाद भी मीथेन कई गुना ज्यादा ऊष्मा अवशोषित करती है. यही वजह है कि विश्व जलवायु सम्मेलन में मीथेन के उत्सर्जन को कम करने पर जोर दिया गया है. दुनिया में 40 प्रतिशत मानव जनित मीथेन उत्सर्जन कृषि से आती है इसमें से अधिकांश जानवरों खासकर गायों (Cows) के गोबर और उनकी डकार आदि का योगदान है. इस वजह से वैज्ञानिक और पर्यावरणविदों के लिए गाय की गैस और डकार चिंता का विषय बने हुए हैं.

    गायों की अहमियत
    गाय इंसानों के लिए सबसे प्रमुख पालतू जानवरों में से एक है. उसका दूध इंसानों के लिए पौष्टिक होता है. इतना ही नहीं दुनिया के कुछ देशों में गाय मांस उद्योग का प्रमुख हिस्सा भी है. आज भी भारत जैसे देश में गाय बैल कृषि क्षेत्र के संचालन में प्रमुख हिस्सा हैं. वे केवल दूध देने का काम ही नहीं करती हैं, बल्कि खेत जुताई, बैलगाड़ी आदि जैसे कार्यों में भी काम आती हैं. दुनिया भर के गायों से जितना मीथेन उत्पादन होता है वह CO2 की तुलना में एक चौथाई ज्यादा अधिक प्रभावी होता है.

    जलवायु सम्मेलन में मीथेन उत्सर्जन
    इस साल ग्लासगो में हुए जलवायु सम्मेलन में CO2 के साथ-साथ मीथेन पर ध्यान देने की बात उठी थी. सम्मेलन में जो दुनिया के देशों ने स्वैच्छिक रूप वैश्विक स्तर पर मीथेन कम करने का संकल्प लिया है. इसके तहत ये देश 2030 तक मीथेन उत्सर्नज में 30 प्रतिशत तक कटौती करेंगे. इस संकल्प में चीन, भारत और रूस शामिल नहीं हैं. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के निदेशक का कहना था कि मीथेन उत्सर्जन कम करना अगले 25 सालों में जलवायु परिवर्तन कम करने का सबसे प्रभावी तरीका होगा.

    जलवायु सम्मेलन में मीथेन
    जलवायु सम्मेलन में मीथेन का जिक्र ही मीथेन उत्सर्जकों, खास तौर पर गायों को चर्चा में लाया है. मीथेन उत्सर्जन ही ऐसा ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन है जिसमें अन्य उत्सर्जनों की तुलना में कृषि क्षेत्र आगे हैं जिसमें गाय प्रमुख है. वैसे तो मीथेन गैस का उपयोग ईंधन की तरह भी हो सकता है, लेकिन ऐसा तभी हो पाता है जब मीथेन गैस का उत्पादन नियंत्रित तरीके से हो.

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    दुनिया में मीथेन उत्सर्जन (Methane Emission) के लिए गायों और मवेशियों के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार माना जाता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    गायों से होने वाला उत्सर्जन
    मवेशियों के गोबर ने निकलने वाली मीथेन गोबर का सही समय पर गोबर गैस संयंत्र में उपयोग लाकर भी नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन उससे भी बड़ी समस्या है कि मवेशियों,  खास तौर पर गायों को डकार और गैस की बड़ी समस्या होती है. एक गाय दिन भर में जितनी डकार और गैस निकालती है वह समस्या नहीं होती है, लेकिन दुनिया भर में भी सभी गायों की डकार और गैस का आकलन किया जाए तो यह बहुत बड़ी मात्रा हो जाती है.

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    मीथेन पर चिंता क्यों
    वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के लिए मीथेन ज्यादा चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में थोड़ी सा भी ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन बड़ी समस्या की वजह बन सकता है. मीथेन वायुमंडल में केवल 2 पार्ट्स पर मिलियन पीपीएम है जबकि CO2 412 पीपीएम हैं. जहां मीथेन एक  बार वायुमंडल में पहुंच कर 12 साल तक ही रह पाती है, CO2 200 सालों तक रह जाती है. लेकिन मीथेन CO2 की तुलना में 84 गुना ज्यादा ऊष्मा अवशोषित करती है.

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    गायों (Cows) की खास पाचन क्रिया के कारण ही मीथेन गैस का निर्माण होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    गाय ही क्यों
    गाय और अन्य मवेशी चारा खाते हैं जो वे दिन भर चबाते रहते हैं और जुगाली करते रहते हैं. उनके पेट में ऐसे कई सूक्ष्मजीवी रहते हैं जो घास पत्तियां जैसे फाइबर युक्त भोजन को छोटे छोटे टुकड़े में तोड़ने में मदद कर हाजमा आसान बनाते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में गाय के पेट से मीथेन गैस बनती है जो गैस और डकार के रूप में बाहर निकलती रहती है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक जितना पर्यावरण को जितना नुकसान जीवाश्म ईंधन के उत्सर्जन से होता है उससे कहीं ज्यादा  खतरा गाय जैसे मवेशियों के मीथेन उत्सर्जन से होता है.

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    पिछले कई सालों से दुनिया भर के वैज्ञानिक मीथेन का उत्सर्जन रोकने के लिए गायों के खाने में सुधार करने की कोशिश करते रहे हैं. इसके लिए उनके खान पान में बदलाव करने के कई तरह प्रयोग किए गए हैं जिसमें परंपरागत चारे की जगह जैविक घास और मक्का स्प्राउट्स के कई प्रयोग भारत में भी सफल होते देखे गए हैं. तो वहीं कुछ प्रयोग गायों की डकार और गैस को जमा करने वाले उपकरणों को बनाकर मीथेन जमा करने के तौर पर भी हुए हैं.

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