इन छह कारणों के चलते क्यों सबसे खराब रहा ये क्रिकेट वर्ल्ड कप

वर्ष 1975 से लेकर अब तक 12 वर्ल्ड कप हुए हैं लेकिन सुरक्षा इंतजामों से लेकर मौसम और खराब अंपायरिंग के साथ कई वजहों से ये वर्ल्ड कप क्रिकेट प्रतियोगिता सबसे खराब आयोजन कही जाएगी

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: July 15, 2019, 11:38 PM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: July 15, 2019, 11:38 PM IST
1975 से अब तक वर्ल्ड कप क्रिकेट में जिस तरह कोई एक टीम हर विजेता बनती थी, क्या इस बार वैसा ही इंग्लैंड के लिए कहा जा सकता है- दरअसल इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के बीच फाइनल मैच खासा रोमांचक रहा. 50-50 ओवरों के बाद परिणाम रहा टाई. फिर सुपर ओवर भी टाई. इसके बाद जिस नियम से विजेता का फैसला हुआ. उसे बहुत कम लोग पचा पाए. इंग्लैंड को इसलिए विजेता घोषित किया गया, क्योंकि उसने मैच में ज्यादा चौके मारे थे.

हालांकि ये वर्ल्ड कप का ऐसा फाइनल था, जैसा कभी नहीं खेला गया. और नतीजा भी ऐसा, जो अब तक कभी नहीं आया. लेकिन केवल इस फाइनल के कारण ही नहीं बल्कि इस वर्ल्ड कप की कई वजहों से आलोचना हुई.

माना जा रहा है कि अब तक हुई 12 क्रिकेट वर्ल्ड कप प्रतियोगिताओं में ये हर लिहाज से लचर रहा. लेकिन छह ऐसे कारण भी हैं, जिनकी बिना पर कहा जा सकता है कि किस कदर ये वर्ल्ड कप खराब साबित हुआ. ये पहला मौका था जब एक नहीं बल्कि कई स्तर पर ये वर्ल्ड कप काफी लचर रहा. अगर ये इंग्लैंड की जगह किसी और देश में होता तो इंग्लैंड का मीडिया आलोचनाओं की झड़ी लगा देता.

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आईसीसी ने जिस तरह इंग्लैंड के खराब इंतजामों पर भी आंख मूंदी-क्या वैसा ही वो दूसरे देशों के साथ भी करता. जानते हैं छह कौन सी वजहें हैं, जिन्होंने इस वर्ल्ड कप को सबसे खराब वर्ल्ड कप बनाया.

 1. सबसे खराब अंपायरिंग
अंपायरिंग का जितना खराब स्तर इस वर्ल्ड कप में था, वैसा तो क्रिकेट प्रतियोगिताओं में कम नजर आता है. फाइनल में ही तीन से चार गलत फैसले हुए. इसी तरह सेमीफाइनल और हर लीग मैच में कई खराब फैसले होते रहे. हालांकि कई खराब फैसले डीआरएस ने पलटे भी. लेकिन कई बार डीआरएस से वंचित होने के बाद टीमों ने खराब अंपायरिंग का खामियाजा भुगता.
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वर्ल्ड कप के हर मैच में कुछ गलत फैसले टीमों के खिलाफ गए. अंपायरिंग लगातार खराब रही


आईसीसी को अंपायरिंग के स्तर पर ध्यान देना चाहिए. क्रिकेट में प्रयोग की जा रही तकनीक बताती है कि आईसीसी को अब अंपायरों का स्तर सुधारने के लिए कुछ करना होगा. अन्यथा बड़ी प्रतियोगिताओं के फैसले हास्यास्पद होते चले जाएंगे.

2. ऐसे लचर सुरक्षा इंतजाम तो कभी नहीं देखे
आईसीसी यानि इंटरनेशनल क्रिकेट कौंसिल जब किसी देश को वर्ल्ड कप आयोजन की मेजबानी देती है तो आयोजन से पहले उसकी सुरक्षा कमेटी सुनिश्चित करती है कि सुरक्षा इंतजाम चौकस रहें. कोई दर्शक मैदान में नहीं घुस पाए. ना ही कोई आतंकी हादसा हो सके.

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भारत और अन्य देशों में पिछले एक-डेढ़ दशकों में जब भी वर्ल्ड कप हुआ तब आईसीसी की कमेटी ने सुरक्षा इंतजामों के पुख्ता होने के बाद भी ना जाने कितनी कमियां निकालीं. मेजबान देश को सुरक्षा पर  मोटा धन खर्च करना पड़ा. ऐसे में इंग्लैंड के वर्ल्ड कप के बारे में क्या कहेंगे, जहां कई मैचों के दौरान दर्शक मैदान में घुस आए.

कई बार दर्शक मैदान में घुसे. अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हुए मैच के बाद दर्शकों ने मैदान में घुसकर उत्पात ही कर दिया


अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हुए मैच में तो परिणाम आने के बाद दर्शक बड़ी संख्या में मैदान में घुस आए. खिलाड़ियों को निशाना बनाया गया. किसी तरह खिलाड़ियों को बचाया गया.

मैचों के दौरान मैदान के ऊपर से आपत्तिजनक संदेशों के साथ जिस विमान स्टेडियम के ऊपर से निकले, वो तो और भी ज्यादा हैरान करने वाला था. सुरक्षा नियमों के चलते, उन्हें स्टेडियम के ऊपर से उड़ने की मनाही होनी चाहिए थी. अगर ऐसे में कोई आतंकी वारदात होती तो कौन उसका जिम्मेवार होता.

3. खराब मौसम ने भी खूब बेमजा किया 
ये पहला वर्ल्ड कप था. जिसके चार मैच तो पूरी तरह बारिश से धुल गए. कुछ और मैचों पर भी बारिश का असर पड़ा. सबसे ज्यादा खराब हाल श्रीलंका का हुआ. मैचों के दौरान ही पता चला कि इंग्लैंड के कई मैच केंद्रों पर बारिश के दौरान विकेट और मैदान का बेहतर बचाव करने वाले नए तरह के कवर नहीं हैं. बस एक दो मैदान ही साधन और सुविधाओं से पूरी तरह लैस थे.

ये ऐसा वर्ल्ड कप भी था, जिसके मैच लगातार बारिश से प्रभावित हुए. कई मैच रद्द भी हुए


ये भी कह सकते हैं कि भारत और न्यूजीलैंड के बीच खेला गया सेमीफाइनल मैच भी अगर बारिश के कारण अगले दिन में नहीं जाता तो भारत को विकेट और मैदान दोनों अलग तरह से मिलते. तब मैच का परिणाम अलग होता. इंग्लैंड में पिछले कुछ सालों से इन्हीं महीनों में बारिश हो रही है. बारिश ने इस प्रतियोगिता के रंग को ही बेरंग कर दिया. कई टीमों के प्रदर्शन और परिणाम पर बारिश से जो असर पड़ा, वो अलग ही था.

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4. यूज्ड विकेट पर ही मैच खिला दिये
चाहे मैनचेस्टर हो या फिर ब्रिस्टल या और कोई मैदान-वर्ल्ड कप के कई मैच यूज्ड विकेट पर हुए यानि ऐसे विकेट पर, जिन पर दो से तीन दिन पहले ही मैच खेले गए थे. उसी हाल पर उन विकेटों पर मैच खिला दिये गए. वर्ल्ड कप की पिच कमेटी का साफ नियम है कि हर मैच फ्रेश विकेट पर होने चाहिए. साथ ही हर मैदान पर दो से तीन विकेट होने चाहिए ताकि अगर एक ही मैदान पर कई मैच हो रहे हों तो विकेट बदल कराए जा सकें.

इससे पहले जब और जहां वर्ल्ड कप के आयोजन हुए वहां पिच कमेटी ने काफी गंभीरता के साथ इस पहलू पर जोर दिया लेकिन इंग्लैंड में वर्ल्ड कप के आयोजन के दौरान क्यों इस पर कोई सवाल नहीं उठा.

5. अन्यायपूर्ण डीआरएस
किसी भी नियम की पहली अवधारणा ये होती है कि वो न्यायपूर्ण हो और न्याय के आधार को मजबूत करता हो. इस भावना को जाहिर करता हो कि किसी के साथ अन्याय नहीं होगा. वर्ल्ड कप में इस बार डीआरएस की जो प्रणाली लागू की गई उसे अन्यायपूर्ण ही कही जाएगी. क्योंकि ये शर्तों के साथ बंधी हुई थी.

वर्ल्ड कप में जिस तरह से टीमों को डीआरएस के अधिकार दिये गए, वो न्यायपूर्ण नहीं कहे जा सकते


शर्त थी कि अगर कोई टीम आउट या नाटआउट की सूरत में अंपायर के फैसले पर संदेह करते हुए  डीआरएस यानि डिसिजन रिव्यू सिस्टम की मांग करती है तो अगर टीम का संदेह खरा उतरा, तभी उसे मैच में आगे डीआरएस के मौके मिलेंगे अन्यथा वो इस अधिकार से वंचित कर दी जाएगी.

वर्ल्ड कप में कई बार ऐसा हुआ जब टीमों ने डीआरएस सही नहीं लिये. उन्हें इससे वंचित कर दिया गया. फिर पाया गया कि अंपायरिंग के कई फैसले उनके खिलाफ गलत गए लेकिन वो न्याय की मांग नहीं कर सके. किसी भी टीम को यूं न्याय से वंचित करना वास्तव में अन्यायपूर्ण है. खेल भावना के खिलाफ भी. डीआरएस को लागू करने को लेकर हमेशा से विवाद रहा है. बेहतर हो कि इसे न्यायसंगत बनाया जाए.

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6. बेतुके नियम 
वर्ल्ड कप का फाइनल जिसने भी देखा. उसने देखा कि किस तरह इंग्लैंड को पहले 50-50 ओवर और फिर सुपरओवर टाई रहने के बाद भी विजेता घोषित किया गया. आमतौर पर महसूस हुआ कि इस नियम से न्यूजीलैंड के साथ अन्याय हुआ है. इंग्लैंड को इसलिए विजेता माना गया, क्योंकि उसने मैच में ज्यादा चौके लगाए थे.

फाइनल मैच में जिस नियम से विजेता का फैसला हुआ, वो वाकई बेतुका ही कहा जाएगा


बेशक ये नियम आईसीसी ने करीब डेढ़ दशक पहले बनाया था. तब बेशक किसी को इस पर आपत्ति नहीं थी लेकिन असलियत तो ये भी है कि कभी ये स्थिति भी नहीं आई कि इस बेतुके को नियम को लागू करना पड़ा हो. साधारण मैचों या लीग मैचों में इस नियम को लागू करना हो सकता ठीक हो लेकिन फाइनल जैसे मैच में ऐसे नियम असंगत ही कहे जाएंगे. इसकी जगह कुछ और प्रावधान होने चाहिए.

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First published: July 15, 2019, 11:38 PM IST
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