ज्यादातर तूफानों की तरह महिला के नाम पर ही क्यों रखा गया है साइक्लोन 'फानी' का नाम?

प्रतीकात्मक तस्वीर

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भारत के बड़े हिस्से पर दिखेगा चक्रवातीय तूफान 'फानी' का असर, बांग्लादेश ने रखा है इस चक्रवात का नाम

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चक्रवात 'फानी' गोपालपुर और पुरी के दक्षिण में चांदबली होता हुआ दोपहर तक ओडिशा तट से टकराएगा. इस दौरान इस इलाके में 175-185 किमी/घंटे से लेकर 205किमी/घंटे की रफ्तार से हवाएं चलने की आशंका है. मौसम विभाग ने मंगलवार को ही ओडिशा, प. बंगाल और आंध्र प्रदेश के कुछ जिलों में इससे जुड़ी चेतावनी जारी कर दी थी.



इस बीच केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु और प. बंगाल के लिए पहले से ही 1,086 करोड़ का राहत पैकेज जारी कर दिया है. फिलहाल यह तूफान श्रीलंका के त्रिकोणमाली, चेन्नई और मछलीपट्टनम के बीच है और 180किमी/घंटे की रफ्तार से बढ़ रहा है. इससे निपटने के लिए और भी तैयारियां की जा रही हैं.



लेकिन दिलचस्प बात यह है कि भारत के दक्षिण-पूर्वी हिस्सों को प्रभावित करने वाले इस चक्रवात का नाम बांग्लादेश का दिया हुआ है. इतना ही नहीं भारत में चक्रवात कहे जाने वाले इस तूफान को साइक्लोन, हरिकेन और टाइफून भी कहा जाता है. आखिर ऐसा क्यों है?





साइक्लोन, टाइफून, चक्रवात और हरिकेन में क्या अंतर है?
इन चारों में ही कोई अंतर नहीं होता है. ये सारे ही चक्रवातीय तूफान होते हैं. बस धरती पर उनकी जगह बदलने के अनुसार इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है. जैसे अगर कोई चक्रवातीय तूफान अटलांटिक महासागर के क्षेत्र में आ रहा है तो इसे 'हरिकेन' कहा जाता है. वहीं अगर यह चक्रवात प्रशांत महासागर के क्षेत्र में आ रहा होगा तो इसे टाइफून कहा जाएगा. इतना ही नहीं अगर यह हिंद महासागर के क्षेत्र में पैदा हो रहा होगा तो इसे साइक्लोन कहा जाएगा. साइक्लोन को ही हिंदी में चक्रवात कहा जाता है.







तो अब आप समझ गए होंगे कि अमेरिका में हरिकेन, भारत में साइक्लोन और जापान में टाइफून क्यों आते हैं? वैसे इनके नाम रखे जाने की प्रक्रिया भी कम रोचक नहीं है.



कौन रखता है तूफानों के नाम?

आधुनिक युग में सबसे पहले नाम रखने की परंपरा यूरोप और अमेरिका में शुरू हुई. इसके बीच के समुद्र को अटलांटिक महासागर कहा जाता है. यहां आने वाले तूफानों के नाम मियामी का नेशनल हरिकेन सेंटर 1953 से रख रहा था.



हालांकि अब विश्व मौसम विभाग ने बिल्कुल अंतरराष्ट्रीय स्टैंडर्ड की व्यवस्था कर दी है. इसके लिए पूरी दुनिया को 9 जोन यानि हिस्सों में बांट दिया गया है. अब किसी तूफान का नाम क्या होगा, यह उसके जोन पर निर्भर करता है.



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ऐसे रखे जाते हैं तूफानों के नाम

हिंद महासागर में आने वाले चक्रवातीय तूफानों के नाम रखे जाने का चलन पूरी गंभीरता के साथ सन् 2000 में तब शुरू हुआ, जब 'विश्व मौसम विभाग' ने 'भारतीय मौसम विभाग' को यह काम सौंपा. भारतीय मौसम विभाग ने ओमान से लेकर थाईलैंड तक 8 देशों से 8-8 नामों की एक लिस्ट की मांग की. इन देशों ने चार साल का वक्त लेकर 2004 तक भारत को नाम भेज दिए.



अब इन आठों देशों को अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के अनुसार रखा गया. जिससे देश इस क्रम में आए- बांग्लादेश, भारत, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड. फिर इनके आगे इनके सुझाए 8-8 नामों को लगा दिया गया. जिससे कुल 64 नाम हो गए. 'फानी' इनमें से 57वां है. इसके बाद अब सिर्फ 7 तूफानों के नाम और बचेंगे. जिसके चलते नाम खत्म होने से पहले फिर से भारतीय मौसम विभाग को इन देशों से नामों के लिए सुझाव मांगने होंगे.







इस तरह से 2017 की शुरुआत में 'मारुथा' चक्रवात आया था, जिसका नाम श्रीलंका का दिया हुआ था. इसके बाद 'मोरा' चक्रवात आया, जिसका नाम थाईलैंड ने रखा था. और 2017 के आखिरी में ओकी तूफान आया, जिसका नाम बांग्लादेश ने दिया था.



इन चक्रवातों के नाम पर हुई काफी चर्चा

'वरदा' नाम के साइक्लोन ने 2016 में चेन्नई को प्रभावित किया था. उस वक्त इस साइक्लोन के नाम की भारत में चर्चा हुई क्योंकि यह नाम पाकिस्तान ने दिया था, जिसका मतलब होता है 'लाल गुलाब.' पिछले साल अक्टूबर में भारत में तितली नाम का चक्रवात आया, उसका नाम भी पाकिस्तान का ही दिया हुआ था.



वहीं 2013 में श्रीलंका सरकार एक तूफान का नाम 'महासेन' रखकर विवादों में घिर गई थी. दरअसल महासेन श्रीलंका के इतिहास में समृद्धि और शांति लाने वाले राजा के तौर पर देखे जाते हैं. श्रीलंकाई राष्ट्रवादियों ने सरकार से सवाल पूछने शुरू कर दिए कि विनाशकारी तूफान का नाम ऐसे राजा के नाम पर कैसे दिया जा सकता है? जिसके बाद श्रीलंकाई सरकार को अपना यह नाम वापस लेना पड़ा.



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महिलाओं के नाम पर भी रहा है विवाद

विश्व मौसम विभाग ज्यादातर तूफानों के नाम महिलाओं के नाम पर रखने के चलते आलोचनाएं झेलता रहा है. 1960 के दशक में दुनिया के ज्यादातर मौसम विभागों ने चक्रवातीय तूफानों के नाम महिलाओं के नाम पर रखे थे. जिसके बाद ऑर्गनाइजेशन फॉर विमेन सहित तमाम महिला संगठनों ने इसका विरोध किया. इसके बाद इस परंपरा में बदलाव आने लगे. हालांकि अभी भी महिलाओं के नाम पर ज्यादा तूफानों के नाम रखे जाते हैं.



तूफानों के नाम रखने में एक विवाद तब और जुड़ा जब एनसाइक्लोपीडिया ऑफ हरीकेन, टायफून एंड साइक्लोन ने छापा कि तूफानों के अप्रत्याशित व्यवहार और चरित्र के कारण उनका नामकरण महिलाओं के नाम पर किया जाता है. इसपर नारीवादियों का कहना था कि तूफानों का नाम रखने वाले मर्दवादी सोच से ग्रसित हैं. हालांकि इलिनॉय यूनिवर्सिटी ने एक बार अपने शोध में बताया था कि जिन चक्रवातीय तूफानों के नाम महिलाओं के नाम पर रखे गए, वे पुरूषों के नाम पर रखे गए तूफानों से ज्यादा खतरनाक थे.



एक बार प्रखर नारीवादी रॉक्सी बोल्टन ने मौसम सेवा को एक आपत्तिनामा भेजकर पूछा था, ‘क्या महिलाएं जीवन और समाज के लिए नाशक हैं? क्या महिलाएं तूफान की तरह ही तबाही लाती हैं?’ उनकी आवाज में जब हजारों लोगों की आवाज मिली तो 1979 में पुरुषों के नाम से भी तूफानों के नाम रखे जाने लगे. हालांकि शुक्रवार को उड़ीसा पहुंचने वाला तूफान 'फानी' भी एक महिला नाम है. जो पूर्वी एशिया में महिलाओं के बीच प्रचलित है.







साइक्लोन भी होते हैं रिटायर

वैसे दिलचस्प यह भी है कि जो तूफान ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं, उन्हें रिटायर कर दिया जाता है. मतलब दोबारा उनका नाम किसी चक्रवातीय तूफान को नहीं दिया जाता है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि लोग दोबारा उस त्रासदी को न याद करें. 1954 में कहर बरपाने वाले हरीकेन 'कैरोल हेजेल', 1960 में तबाही लाने वाले 'डोना', 1970 में विनाश का कारण बने 'सीलिया' सभी के साथ यही किया गया. दोबारा इन नामों को चक्रवातीय तूफानों की सूची में जगह नहीं मिली. 2005 में कहर बरपाने वाले 'कैटरीना', 'रीटा' और 'विलमा' नाम भी इतिहास में दफन हो गए हैं. ऐसा ही 2015 में आए 'जुआकिन' और 'एरिक' तूफान के साथ भी किया गया है.



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