ब्रिटेन की संसद ने बंटवारे पर मुहर लगाई फिर बंटने लगा ये देश

04 जुलाई 1947, वो तारीख थी, जब ब्रिटेन की संसद में भारत और पाकिस्तान बंटवारे पर मुहर लगाई गई. मुहर लगते ही इंग्लैंड से रेडक्लिफ को भारत रवाना कर दिया गया

News18Hindi
Updated: July 4, 2019, 1:03 PM IST
ब्रिटेन की संसद ने बंटवारे पर मुहर लगाई फिर बंटने लगा ये देश
04 जुलाई 1947, वो तारीख थी, जब ब्रिटेन की संसद में भारत और पाकिस्तान बंटवारे पर मुहर लगाई गई. मुहर लगते ही इंग्लैंड से रेडक्लिफ को भारत रवाना कर दिया गया
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Updated: July 4, 2019, 1:03 PM IST
भारत और पाकिस्तान का विभाजन साधारण बात नहीं थी. यह कई सदियों पुरानी सभ्यता का विभाजन था, जिसके वंशज एक जमीन के टुकड़े को ही नहीं बल्कि एक संस्कृति को भी साझा करते थे. लेकिन यह एक सच्चाई है कि ब्रिटिश भारत आज तीन हिस्सों में बंट चुका है. 04 जुलाई को ब्रिटेन की संसद में भारत के बंटवारे पर मुहर लगा दी गई. फिर इसे बांटने का काम शुरू हुआ. ये काम किया सिरील रेडक्लिफ ने. 1947 में आनन-फानन में बैरिस्टर रेडक्लिफ को भारत बुलाया गया था.  उन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच सीमारेखा खींचने का काम सौंपा गया था.

रेडक्लिफ ना पहले कभी भारत आये थे और ना ही उन्हें भारत के बारे में कोई खास जानकारी थी. ऐसे में रेडक्लिफ ने एक बार इस काम में असमर्थता भी जताई,फिर उन्होंने लकीरें खींचनी शुरू कर दीं.

यही कारण रहा कि बंटवारे के दौरान ऐसी कई गलतियां हुईं कि भारत और पाकिस्तान बंटवारे के दौरान हुए नागरिक आदान-प्रदान में दोनों ही ओर से लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. कहा जाता है कि रेडक्लिफ ने भारत से वापस लंदन जाने के बाद विभाजन से जुड़े सारे दस्तावेज और नक्शे जला दिए थे. और बाद में भी उन्होंने इस बारे में ज्यादा बातें नहीं कीं.

पाकिस्तान के पास कोई बड़ा शहर नहीं था तो दे दिया लाहौर

कुलदीप नैय्यर एक ऐसे भारतीय पत्रकार हैं जो रेडक्लिफ़ से आजादी के बाद लंदन जाकर मिले थे. कुलदीप नैय्यर ने एक बार बीबीसी से इस बारे में बातचीत की थी. उन्होंने रेडक्लिफ की आपबीती सुनाते हुए कहा था, "मुझे 10-11 दिन मिले थे सीमा रेखा खींचने के लिए. उस वक़्त मैंने बस एक बार हवाई जहाज़ के ज़रिए दौरा किया. न ही ज़िलों के नक्शे थे मेरे पास. मैंने देखा लाहौर में हिंदुओं की संपत्ति ज़्यादा है. लेकिन मैंने ये भी पाया कि पाकिस्तान के हिस्से में कोई बड़ा शहर ही नहीं था. मैंने लाहौर को भारत से निकालकर पाकिस्तान को दे दिया. अब इसे सही कहो या कुछ और लेकिन ये मेरी मजबूरी थी. पाकिस्तान के लोग मुझसे नाराज़ हैं लेकिन उन्हें ख़ुश होना चाहिए कि मैने उन्हें लाहौर दे दिया."



 
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कुलदीप नैय्यर ने रेडक्लिफ को एक संवेदनशील इंसान भी बताया था और यह भी कहा था कि रेडक्लिफ को बंटवारे से हुई त्रासदी का बहुत अफसोस भी रहा. चूंकि रेडक्लिफ को भारत की तत्कालीन स्थिति का अंदाजा नहीं था तो हो सकता है कि उन्हें बंटवारे के चलते आने वाली मानवीय त्रासदी का अंदाजा ही न रहा हो. वैसे एक बार रेडक्लिफ ने यह भी कहा था कि मैंने तर्कों से हटकर पाकिस्तान को लाहौर दे दिया. जो भारत का हिस्सा होने वाला था. बंटवारा करने के दौरान मैंने मुस्लिमों का पक्ष लिया. पाकिस्तान को मेरा शुक्रगुजार होना चाहिए.

गलती से फिरोजपुर और गुरुदासपुर चले गये थे पाकिस्तान
सिरील रेडक्लिफ ने जो बॉर्डर तय किया. उसके हिसाब से पंजाब के दो शहर फिरोजपुर और गुरुदासपुर पाकिस्तान के हिस्से में चले गये थे. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस बारे में अटारी-वाघा बॉर्डर को चूने से लकीर खींच कर अलग-अलग करने वाले ब्रिगेडियर महिंदर सिंह चोपड़ा के बेटे पुष्पिंदर चोपड़ा ने बताया, "लॉर्ड माउंटबेटन ने सर सिरील रेडक्लिफ को भारत-पाकिस्तान के बीच बॉर्डर बनाने का काम सौंपा था, लेकिन रेडक्लिफ को बॉर्डर के बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं थी."



ऐसे में गलती होना लाजिमी था. माउंटबेटन के दबाव में काम कर रहे रेडक्लिफ ने गुरुदासपुर और फिरोजपुर पाकिस्तान के हिस्से कर दिए. और कुछ दिन बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने रेडक्लिफ से दोनों शहरों को वापस भारत में शामिल करने का आदेश दे दिया. माउंटबेटन के इस आदेश से दोनों शहरों में बहुत मार-काट हुई.

दार्जिलिंग मत दीजिये, छुट्टी मनानी होती है
दार्जिलिंग आज भी भारत के मशहूर टूरिस्ट प्लेस में से एक है. इसका भी एक किस्सा सिरील रेडक्लिफ ने बताया था. उन्होंने बताया कि बाउंड्री कमीशन में ही उनके साथ रहे एक बंगाल के शख्स ने उन्हें अकेले में ले जाकर बोला था, "मैं और मेरी फैमिली हर साल गर्मियों में छुट्टियां मनाने दार्जिलिंग जाते हैं. ऐसे में अगर दार्जिलिंग भारत के हिस्से में चला गया, तो वहां जाना बड़ा मुश्किल हो जाएगा."

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First published: July 4, 2019, 12:04 PM IST
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