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Dadabhai Naoroji Birthday Spcl: जहां भी जाते, दादाभाई के मुरीद बन जाते थे लोग

Dadabhai Naoroji Birthday Spcl: जहां भी जाते, दादाभाई के मुरीद बन जाते थे लोग

दादाभाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) ने शुरुआती दिनों में धर्म के प्रचार के साथ शिक्षा में बहुत नाम कमाया था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

दादाभाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) ने शुरुआती दिनों में धर्म के प्रचार के साथ शिक्षा में बहुत नाम कमाया था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

Dadabhai Naoroji Birthday: दादाभाई ने इंग्लैंड में जाकर वहां चुनाव जीता था, वे जहां भी जाते थे हर कोई उनका मुरीद हो जाता था.

  • News18Hindi
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    भारतीय इतिहास में शायद दादाभाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) एकमात्र ऐसे व्यक्ति रहे हैं जिनकी हर जगह लोकप्रियता थी. स्वतंत्रता आंदोलन के इकलौते ऐसे नेता थे जिन्हें भारत से लेकर इंग्लैंड तक में लोग पसंद करते थे. यही वजह थे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) के संस्थापकों में से एक रहे नौरोजी ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स (House of commons) में चुने जाने वाले पहले भारतीय होने के साथ-साथ पहले एशियाई भी थे. 4 सितंबर को देश उनकी जन्मतिथि मना रहा है.

    गणित और विज्ञान की पढ़ाई
    भारत के वयोवृद्ध पुरुष (Grand old man of India) कहलाए जाने वाले दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सिंतबर 1825 को उस दौर में ब्रिटिश इंडिया के बॉम्बे प्रेसिडेंसी के नवसारी में हुआ था. वे गुजराती बोलने वाली पारसी जोरोस्थियन परिवार में पैदा हुए थे. ग्यारह वर्ष की आयु में ही दादाभाई नौरोजी का विवाह गुलबाई से हो गया था. उन्होंने स्कॉटलैंड यूनिवर्सिटी से संबद्ध एल्फिंसटन कॉलेज से गणित और प्राकृतिक विज्ञान की पढ़ाई की.

    पारसी धर्म के लिए
    पढ़ाई पूरी करने के बाद वे 1855 तक बंबई में गणित और प्राकृतिक विज्ञान के शिक्षक के तौर पर कार्य करते रहे. इसी बीच उन्होंने पारसी धर्म की सादगी, अवधारणा और पवित्रता से अन्य लोगों को अवगत कराने के लिए 1851 में रहनुमा मजदायसन सभा और 1854 में पाक्षिक पत्रिका रास्त गोफ्तार (सच बताने वाला) का प्रकाशन किया.  यहीं से दादाभाई की लोकप्रियता परवान चढ़ने लगी.

    इंग्लैंड में व्यवसायी और शिक्षक
    1855 में कामा एंड कंपनी के हिस्सेदार के रूप में दादाभाई नौरोजी इंग्लैंड चले गए. कामा एंड कंपनी की शाखा इंग्लैंड में खोलने के साथ ही दादाभाई नौरोजी पहले ऐसे व्यक्ति भी बने जिन्होंने ब्रिटेन में किसी भारतीय कंपनी को स्थापित किया था. लेकिन तीन साल के अंदर ही उन्होंने कंपनी से इस्तीफा दे दिया और वहां नौरोजी एंड कंपनी नाम से कपास निर्यात करने वाली कंपनी की स्थापना की. कुछ समय बाद वह यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन में गुजराती भाषा के अध्यापक बन गए.

    एक प्रखर नरम दल नेता
    दादा भाई का मानते थे कि भारतीयों को ब्रिटिश राजनैतिक संस्थानों में भागीदारी कर देश के लोगों के लिए आवाज उठानी चाहिए. वे देश की आवाज को लंदन तक ले जाना चाहते थे जिसके लिए उन्होंने हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए चुनाव लड़ने का निश्चय किया. उन्हें 1886 में लिबरल पार्टी से टिकट भी मिला, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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    दादाभाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) के नाम की भारत, इंग्लैंड और पाकिस्तान में सड़क है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    ब्रिटिश संसद में भारतीय आवाज
    दादा भाई ने 1892 में फिर चुनाव लड़ा और इस बार केवल तीन वोट से विजयी रहे और हाउस ऑफ कॉमन्स में पहले भारतीय और पहले एशियाई सदस्य भी बने. वे लिबरल पार्टी के निष्ठावान सदस्य रहे  और उन्होंने ब्रिटिश संसद में भारत में नागरिक अधिकार, दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मजदूरों की स्थिति  के लिए आवाज उठाई.ॉ

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    इन मुद्दों पर भी उन्हें मिली लोकप्रियता
    ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में उन्होंने भारत के लिए आवाज तो उठाई ही, स्थानीय मुद्दे भी खूब उठाए. उन्होंने महिलाओं को वोट देने के अधिकार का समर्थन किया, बुजुर्गों को पेंशन, आयरलैंड में स्वराज, और हाउस ऑफ लॉर्ड्स को खत्म करने जैसे मुद्दों को भी उठाया. वे जहां गए वहां लोगों के चेहते रहे. भारत में वे तीन बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. नरमपंथी नेताओं में वे अग्रणी और शीर्ष पर थे. अगली पीढ़ी के नेताओं में बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी जैसे नेताओं से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना तक के वे आदर्श रहे.

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    महात्मा गांधी सहित कई भारतीय नेता दादाभाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) के प्रशंसक थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    ड्रेन ऑफ वेल्थ का सिद्धांत
    दादाभाई की किताब ‘पॉवर्टी एंड अन ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ बहुत लोकप्रिय रही. इसमें उनका दिया हुआ ब्रिटेन में भारत की वेल्थ ड्रेन का सिद्धांत बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध हुआ. उन्होंने इस सिद्धांत में बताया कि भारतीय आर्थिक राजस्व का चौथाई हिस्सा भ्रष्टाचार के जरिए का ब्रिटेन में जा रहा है और इस तरह से भारत को आर्थिक रूप से सूखे की ओर ढकेला जा रहा है. उन्होंने यह तक बताया कि इससे ब्रिटिश सरकार को कितना नुकसान हो रहा है. उनके शोधपत्र के मुताबिक साल 1814 से लेकर 1845 तक लगभघ 35 करोड़ पाउंड स्टर्लिंग इंग्लैंड चला गया था.

    क्यों मारा गया था भारत के आखिरी वायसराय को

    1917 में 91 साल की उम्र में मुंबई के वर्सोवा स्थित अपने घर में उनका निधन हो गया. वे दुनिया के इकलौते ऐसे व्यक्ति हैं जिनके नाम की सड़क भारत, पाकिस्तान और इंग्लैंड तीनों देश में हैं इस तरह का सम्मान पाने वाले वे दुनिया के एकमात्र व्यक्ति हैं. उनके समय का हर राजनेता ने उनकी प्रशंसा ही की है. उन्हें भारत का महान और प्रसिद्ध बुद्धिजीवी भी माना जाता है.

    Tags: Freedom Movement, India, Research

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