आज ही हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों से होकर Tibet से भारत पहुंचे थे दलाई लामा

लगभग 62 साल पहले दलाई लामा को तिब्बत से भागना पड़ा था (Photo- news18 English)

लगभग 62 साल पहले दलाई लामा को तिब्बत से भागना पड़ा था (Photo- news18 English)

चीन से बचते-बचाते दलाई लामा (Dalai Lama escapes from China) लगभग पंद्रह दिनों तक पैदल चलते रहे ताकि भारत की सीमा में प्रवेश कर सकें. तिब्बतियों को यकीन है कि इस दौरान उनकी प्रार्थनाओं ने दलाई लामा के चारों ओर रक्षा कवच बना रखा था.

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  • Last Updated: March 31, 2021, 6:54 AM IST
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लगभग 62 साल पहले दलाई लामा (Dalai Lama) को तिब्बत से भागना पड़ा था. 31 मार्च 1959 में उन्होंने हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों और घाटियों को पैदल पार करते हुए भारत की सीमा में प्रवेश किया और तब से तिब्बत के ये आध्यात्मिक नेता यहीं पर राजनैतिक शरण में हैं. बीच-बीच में चीन भारत पर दलाई लामा के कारण भी गुस्सा निकालता है. उसे डर है कि 90 के करीब पहुंच चुका ये बुजुर्ग शख्स चीन के हाथ से तिब्बत को छुड़ा लेगा.

क्यों दलाई लामा को चीन से खतरा था

दलाई लामा का मुस्कुराता हुआ चेहरा कई बार इंटरनेट या टीवी पर दिखता है. बहुत से लोग बौद्ध धर्म के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते लेकिन दलाई लामा का नाम सुन रखा होता है. तिब्बती आध्यात्म के इन गुरु का भारत से करीबी नाता है. आज के ही रोज वे हिमालय में छिपते-छिपाते भारत पहुंच सके थे. लेकिन बौद्ध धर्म के इस नेता को आखिर किससे खतरा था कि उन्हें छिपकर अपना देश छोड़ने की जरूरत पड़ी? इसका जवाब जानने के लिए हमें तिब्बत और चीन के इतिहास में देखना होगा.

dalai lama
चीन को डर है कि 90 के करीब पहुंच चुका ये बुजुर्ग शख्स चीन के हाथ से तिब्बत को छुड़ा लेगा

राजशाही के दौरान चीन का तिब्बत पर कब्जा 

तिब्बत और चीन के बीच पहले से ही तनाव चला आ रहा था, जिसकी वजह थी चीन का तिब्बत को अपना हिस्सा मानना. विस्तारवादी चीन ने इस क्षेत्र पर साल 1906-1907 के दौरान कब्जा कर लिया था और ठीक वैसे ही अपनी चौकियां जमा ली थीं, जैसे फिलहाल उसने साउथ चाइना सी में किया है. तब चीन में राजतंत्र था.

चीन ने मचाई थी तबाही



राजतंत्र के खात्मे के साथ ही तिब्बती लोगों ने चीनियों की चौकियों में तोड़फोड़ कर दी और उन्हें तिब्बत से भागना पड़ा. लेकिन चीन ने एक बार फिर दल-बल समेत यहां हमला बोला. ये पचास के शुरुआती दशक की बात है. चीन ने देश पर कब्जा करते हुए उसे अपना हिस्सा बता दिया और भयंकर तबाही मचाई. माना जाता है कि इस दौरान लगभग 85000 तिब्बती विद्रोही मारे गए, जो चीन के खिलाफ थे.  कुछ दिनों तक शांति रही लेकिन भीतर ही भीतर तिब्बत चीन से खुद को छुड़ाने की योजना बना रहा था.

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दलाई लामा ने चुपचाप देश छोड़ दिया

इस बात की भनक लगने पर बातचीत के लिए चीन ने दलाई लामा को अपने यहां यानी बीजिंग आने का न्यौता दिया लेकिन उसकी शर्त थी कि वे बिना किसी सुरक्षा के आएं. ये चीन की कोई चाल हो सकती थी. ये समझने के बाद तिब्बतियों ने अपने धर्म गुरु को चीन जाने से रोक दिया. इसकी बजाए वे चुपके से अपने हजारों अनुयायियों के साथ भारत की ओर बढ़े. कुछ लोग नेपाल चले गए.

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तिब्बत और चीन के बीच पहले से ही तनाव चला आ रहा था- सांकेतिक फोटो (pixabay)


तरह-तरह की अफवाहें उड़ने लगी थीं 

इधर दलाई लामा 17 मार्च को तिब्बत के कैपिटल ल्हासा से पैदल चले थे ताकि चीनी सेना को संदेह न हो. हिमालय की श्रृंखला को पार करते हुए वे 31 मार्च तक भारतीय सीमा में दाखिल हो सके. इधर इस दौरान लंबे समय तक धर्म गुरु और साथ चले लोगों की कोई खबर न होने से तिब्बत की जनता ये भी सोचने लगी थी कि शायद हिमालय में किसी खराब मौसम ने उन्हें लील लिया हो.

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दुआओं ने बचाई जान

चीन के चंगुल से भागकर दलाई लामा के भारत आने के बारे में 'टाइम मैगजीन' में एक आलेख आया था. सोमवार 20 अप्रैल 1959 की तारीख से छपे इस आलेख में बताया गया कि तिब्बत से भारत आ रहे दलाई लामा की रक्षा के लिए तिब्बती लोग प्रार्थना कर रहे थे. उनकी प्रार्थनाओं के कारण भयंकर धुंध बन गई जो दलाई लामा और उनके दल को घेरे रही. इससे वे चीनी सेना की नजरों से बचकर सुरक्षित भारत पहुंचे.

तिब्बत से भारत आ रहे दलाई लामा की रक्षा के लिए तिब्बती लोग प्रार्थना कर रहे थे- सांकेतिक फोटो (pixabay)


राजनैतिक शरण मिली

चाहे प्रार्थनाओं का असर रहा हो या फिर कुछ और, लेकिन 31 मार्च को भारत के अरुणाचल प्रदेश पहुंचने के बाद वे असम से होते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिले. यहां उन्हें राजनैतिक शरण दी गई. तब से दलाई लामा हिमाचल के धर्मशाला में रहते हुए वहीं से तिब्बत की आजादी की जंग लड़ रहे हैं. चीन इस बीच दलाई लामा को ब्लैकलिस्ट कर चुका था और तब से भारत से चीन की दुश्मनी की एक वजह दलाई लामा भी माने जाते हैं.

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क्यों है चीन को धर्मगुरुओं से समस्या

वैसे धर्मशाला में निर्वासित जीवन जी रहे दलाई लामा तिब्बत के14वें धर्म गुरु हैं. इन्हें 13वें लामा द्वारा साल 1937 में उत्तराधिकारी चुना गया था. पूरी तरह तैयार होकर इन्होंने साल 1950 में अपनी जिम्मेदारी संभाली, तब इनकी उम्र महज 15 साल थी. इधर हाल ही में पंचेन लामा को लेकर भी चीन ने तनाव पैदा किया था. पंचेन लामा दलाई लामा के बाद या कई बार उनके बराबर का मजबूत व्यक्ति होता है, जिसे बाकायदा चुना जाता है. चीन चाहता है कि वही पंचेन लामा की तैनाती करे यानी जो इस पद पर रहे, वो चीन की बात सुने. अगर ऐसा हो तो तिब्बत की चीन से आजादी की मुहिम अपने-आप ही कमजोर हो जाएगी.
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