आज ही के दिन औरंगजेब से हारा था दारा, रात को पहुंचा था आगरा में अपनी हवेली

आज ही के दिन बादशाह शाहजहां का सबसे पसंदीदा बेटा दारा शुकोह औरंगजेब से हार गया

आज ही के दिन बादशाह शाहजहां का सबसे पसंदीदा बेटा दारा शुकोह औरंगजेब से हार गया

आज की तारीख इतिहास में काफी अहम है. फतेहाबाद (आगरा) के सामूगढ़ में हुई लड़ाई में आज ही के दिन यानी 29 मई को ही बादशाह शाहजहां का सबसे पसंदीदा बेटा दारा शुकोह औरंगजेब से हार (Dara Shikoh defeated by Aurangzeb) गया.

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औरंगजेब के हाथों दारा शुकोह की हार के साथ ही मुगल इतिहास ने अपना रास्ता बदल दिया. रात को वह हारकर अपने कुछ साथियों के साथ आगरा में हाथी घाट के पास मौजूद अपनी हवेली में रुका था और भोर होने से पहले वह दिल्ली भाग गया. किले में मौजूद बादशाह शाहजहां ने उसे पैगाम भेजा था कि वो पहले उसके पास आए लेकिन हार की शर्म दारा में इतनी ज्यादा था कि वह पिता से बिना मिले ही भाग गया. लेखक अफसर अहमद ने अपनी 'औरंगजेब नायक या खलनायक' बुक सीरीज के दूसरे खंड 'सत्ता संघर्ष' में दारा की इस हार का सिलसिलेवार वर्णन किया है. दरअसल दारा की रणनीतिक चूक ने उसे आसमान से जमीन पर ला पटका.

सामूगढ़ में हुई थी लड़ाई

आगरा के सामूगढ़ (फतेहाबाद) में हुई लड़ाई दरअसल सत्ता संघर्ष का बेहद महत्वपूर्ण मोड़ था. इस युद्ध के बाद यह तय हो गया कि अगला मुगल बादशाह कौन होगा. यह भी सही है कि सत्ता संघर्ष तब तक नहीं रुका जब तक औरंगजेब की नजर में उसके अलावा एक भी दावेदार बचा रहा. सामूगढ़ की लड़ाई ने दारा शुकोह की कमजोर सैन्य क्षमता को उजागर कर दिया. दारा काफी जोश खरोश से लड़ा लेकिन औरंगजेब युद्ध कौशल में उस पर भारी पड़ा. दारा के पास भारी सेना जरूर थी और राजपूतों का भी प्रबल समर्थन हासिल था लेकिन युद्ध का अंतिम परिमाण औरंगजेब के पक्ष में आया.

dara shikoh defeated by aurangzeb
औरंगजेब युद्ध कौशल में दारा शुकोह पर भारी पड़ा- सांकेतिक फोटो (flickr)

युद्ध की तैयारी

28 मई को दोनों सेनाओं ने सामूगढ़ के करीब एक दूसरे से आधा कोस की दूरी पर तंबू गाड़ दिए. दूसरे दिन दारा अपनी सुरक्षा पंक्ति को व्यवस्थित करने में लग गया. दारा ने अपनी तोपों को क्रम में लगाना शुरू किया साथ ही अपने हाथियों की कतार भी ठीक करना शुरू कर दिया. वह थोड़ा आगे बढ़ा और एक चौड़े मैदान में उसने मोर्चा लगा दिया. यह इलाका करीब 2 कोस चौड़ा था. दिन में इतनी ज्यादा गर्मी थी कि दारा के कई आदमी अपने कवच और पानी की कमी के कारण मर गए. औरंगजेब भी आगे बढ़ा लेकिन उसने आगे जाकर युद्ध की शुरुआत करना उचित नहीं समझा. उसने अपनी तोपें कुछ ही दूरी पर लगा दीं और अपने विरोधी के पहला हमला करने का इंतजार करने लगा. लेकिन दारा ने भी कुछ नहीं किया. इस तरह इंशा(शाम) की नमाज के बाद औरंगजेब ने वहीं डेरा जमा लिया और अपने सैनिकों से रात भर सचेत रहने को कहा. अगले दिन औरंगजेब ने इस तरह से अपने सैनिकों को मोर्च पर लगाया.

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दारा की सेना का हावी होना

दोनों तरफ से रॉकेट,तीरों और गोलों की बारिश के साथ युद्ध की शुरुआत हुई. दारा के अग्रिम मोर्चे का जिम्मा संभाल रहे सिपह शुकोह ने रुस्तम खान दखिनी के साथ करीब 10 से 12 हजार घुड़सवार की सेना लेकर औरंगजेब की बंदूकची पलटन पर हमला बोल दिया और उन्हें पीछे धकेलते हुए मुहम्मद सुल्तान जो कि औरंगजेब के अग्रिम मोर्चे की अगुआई कर रहा था उस ओर बढ़ गए. इससे भारी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई, तभी दारा की सेना की ओर से ही चलाया गया कोई गोला उसी के बड़े सरदार रुस्ताम खान दखिनी के हाथी को लगा और वह मौके पर ही मर गया. इस हमले से रुस्ताम खान दबाव में आ गया और उसने औरंगजेब की अग्रिम मोर्चे वाली सेना पर हमला रोक दिया.

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दारा शुकोह की रणनीतिक चूक ने उसे आसमान से जमीन पर ला पटका

दारा का औरंगजेब की ओर बढ़ना

दारा शुकोह ने जब अपने बेटे सिपह शुकोह के पीछे हटने की बात सुनी तो मध्य में मौजूद अपने 20 हजार लड़ाकों के साथ वह जीत रही दाएं हिस्से की औरंगजेब की सेना की ओर बढ़ चला. वह बड़ी बहादुरी के साथ आगे बढ़ा. उसके आगे बंदूकचियों का दस्ता था जो सामने वाले बंदूकचियों के मुकाबले आगे बढ़ रहा था. लेकिन सामने से उसकी तरफ रॉकेट, बंदूकों और तीरों का इतना जोरदार हमला हुआ कि उसे पीछे हटना पड़ा. दारा ने फिर बाएं हिस्से की जिम्मेदारी संभाल रहे शहजादे मुराद बख्श, जिसे युद्ध के मैदान का शेर भी कहा जाता था, पर हमला बोल दिया. दारा का यह भीषण हमला था. युद्ध और भीषण हो गया जब दारा की ओर से खलीलुल्लाह खान 3 से 4 हजार उज्बेकों के साथ जाकर मुराद से भिड़ गया. दोनों ओर से तीरों की बारिश होने लगी.

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रूप सिंह का औरंगजेब के हाथी पर हमला

गुस्साए राजपूतों ने ताबड़तोड़ युद्धकर मध्य तक रास्ता बना लिया. मध्य सेना की कमान औरंगजेब के पास थी. इन्हीं में से एक राजा रूप सिंह राठौर-10 दुश्मन सेना को चीरते हुए हाथ में तलवार लेकर औरंगजेब के हाथी तक जा पहुंचा. उसने औरंगजेब के हौदे की रस्सियां तलवार से काटना शुरू कर दिया. औरंगजेब को इसका पता लग गया उसने उसकी बहादुरी से प्रभावित होकर उसे अपने सैनिकों को जिंदा पकड़ने का आदेश दिया लेकिन तब तक सैनिकों ने उसके टुकड़े कर दिए.

dara shikoh defeated by aurangzeb
औरंगजेब की दारा शुकोह पर जीत के साथ ही मुगल इतिहास ने अपना रास्ता बदल दिया

बिना चप्पल पहने ही दारा हाथी से उतरा

जब ये सब चल रहा था तब रुस्तम खान ने एक बार फिर दुश्मन सेना पर धावा बोल दिया. युद्ध फिर भीषण होने लगा. राजा छत्रसाल की मौत हो गई. दारा ने देखा कि उसके कई बड़े सरदार इस युद्ध में मारे जा चुके हैं या घायल हो चुके हैं. तभी वह हताश और निराश हो गया. इसी बीच एक रॉकेट उसके हौदे से आकर लगा. इस घटना ने उसे इतना ज्यादा चिंतित कर दिया कि वो बिना कुछ सोचे ही चप्पल तक पहने बिना अपने हाथी से उतर गया. वह घोड़े पर चढ़ गया वह भी बिना किसी हथियार के.

दारा की हार

बदले हालात और खाली हौदा देखकर दारा की सेना में हताशा फैल गई. अपने बड़े सरदार गंवाने के बाद उम्मीद खोकर वह भागने के बारे में सोचने लगा. इसी वक्त उसका एक अंगरक्षक जो उसके करीब था, उसे तोप का गोला लगा और वह मौके पर ही मर गया. इस घटना ने दारा के आसपास मौजूद लोगों में डर भर दिया और वे सब उसे छोड़कर भागने लगे. साथियों और सेना के भागने के चलते दारा ने भी युद्ध से ज्यादा अपनी जान बचाने को महत्व दिया.

dara shikoh defeated by aurangzeb
दारा शुकोह अपनी हार से इस कदर शर्मिंदा था कि अपने पिता शाहजहां से मिलने भी नहीं गया

केवल तंबू और तोपखाना बाकी रहा

दारा और उसका बेटा सिपह शिकोह अपने कुछ साथियों के साथ आगरा की ओर भाग निकले. औरंगजेब अपने हाथी से उतरा और उसने जीत के लिए खुदा को शुक्रिया कहा और नमाज अदा की. इसके बाद वह दारा शुकोह के तंबू की ओर बढ़ा. सबकुछ तबाह हो चुका था सिर्फ उसका तंबू और तोपखाना बचा था. उसने तंबू को कब्जे में ले लिया. दोनों और से करीब 15 हजार सैनिकों की मौत हुई. इस लड़ाई में रुस्तम खान, राव क्षत्रसाल, राजा रूप सिंह, राम सिंह राठौर, मुहम्मद सालिह, वजीर खान और काजी अफजल खान मारे गए.

आगरा भागा दारा

दारा अपने दो हजार घुड़सवारों के साथ रात के वक्त बिना मशालों की रोशनी किए आगरा अपनी हवेली पहुंचा. अपनी हार से वह इस कदर शर्मिंदा था कि अपने पिता शाहजहां से वह मिलने भी नहीं गया. बादशाह ने उसके पास संदेशवाहक भेजकर कहलवाया कि वह उससे आकर मिले और आगे की रणनीति बताए लेकिन दारा ने माफी मांगते हुए मिलने से इंकार कर दिया. उसी रात को तीसरा पहर-12 बीत जाने के बाद वह दिल्ली की ओर चल पड़ा, लाहौर पहुंचने की मंशा लेकर. वह अपने साथ सिपह शुकोह, अपनी पत्नियों, बेटियों और कई नौकरों को ले गया. वह अपने साथ सोना, चांदी, जवाहरात, हाथी और ऊंट भी ले गया. मार्च के तीसरे दिन तक उसके पास 5 हजार सवार और कई सरदार उससे जुड़ चुके थे. ये सब शाहजहां ने उसके लिए भेजे थे. थोड़ा आराम करने के बाद औरंगजेब ने पिता शाहजहां को एक पत्र लिखा- ये बताते हुए कि दरअसल क्या हुआ है और सारी इश्वर की इच्छा बताकर माफी मांगी है.

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