भारत में आज- चंद्रशेखर आजाद ने गिरफ्तार होने की जगह मारी थी खुद को गोली

चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) ने अंतिम समय अपने वचनों को पूरी तरह निभाया था. (फाइल फोटो)

चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) ने अंतिम समय अपने वचनों को पूरी तरह निभाया था. (फाइल फोटो)

27 फरवरी 1931 को इलाहबाद (Allahabad) के अल्फ्रेड पार्क में भारतीय क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) ने अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार होने की जगह खुद को गोली मारने का विकल्प चुना था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 27, 2021, 6:25 AM IST
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आज भारतीय क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) की पुण्यतिथि (Death Anniversary) है. आज ही के दिन साल 1931 में मुठभेड़ के दौरान आजाद ने अंग्रेजों के हाथों पड़ने देने के बजाय खुद को गोली मारने का विकल्प चुना और इलाहबाद (Allahabad) के अल्फ्रेड पार्क को ऐतिहासिक बना दिया जो आज चंद्रशेखर आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है. उनके जीवन में गांधी जी (Mahatma Gandhi), लाला राजपत राय जैसे लोगों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है, लेकिन बाद में चंद्रशेखर आजाद खुद एक सोच बन गए थे जिसने अंग्रेजों की नाक में दम करके रख दिया था.

भगत सिंह भी थे उनके मुरीद
आजाद की ऐसे क्रांतिकारी की तरह था जिनका बलिदान अभूतपूर्व रहा. उनकी सोच और विचारधारा ने उन्हें एक प्रभावी नेतृत्व क्षमता प्रदान की जिसकी वजह से सरदार भगतसिंह भी उनके मुरीद थे. उनका बचपन मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में बीता जहां वे पैदा हुए थे. बचपन से ही उन्होंने तीर कमान चलाना सीख लिया था.

क्यों पड़ा आजाद नाम
15 साल की उम्र में गांधी जी के असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होने के बाद जज को दिए गए जवाबों ने उन्हें मशहूर कर दिया. उन्होंने जज के पूछने पर अपना नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्रता, घर का पता जेल बताया. इससे नाराज होकर जज ने उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी. हर कोड़े पर वे वंदे मातरम और महात्मा गांधी की जय कहते रहे. इसके बाद से ही उनका नाम आजाद पड़ गया.



गांधीजी का प्रभाव
गिरफ्तारी के  बाद अदालत में उनके जवाबों ने दिखा दिया कि वे एक दिन देश के लिए बड़ा कर के दिखाएंगे. वे गांधीजी के स्वतंत्रता संबंधी विचारों से बहुत प्रभावित थे. यह प्रभाव जज से वार्तालाप और उन्हें मिली 15 कोड़ों की सजा के दौरान साफ झलका. इससे भी खास बात यह थी कि 15 साल की उम्र में ही आजादी और गांधी जी के प्रति अगाध श्रद्धा उन्हें सबका प्रिय बना गई.

गांधी जी से मोहभंग
असहयोग आंदोलन के दौरान जब चौरीचौरा कांड के चलते गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया, तब आजाद का गांधी जी से मोहभंग हो गया. उनमें आजादी केप्रति बहुत अधिक आग्रह था जिसकी वजह से वे हिंसा का रास्ता तक अपनाने को तैयार थे. आजाद अकेले नहीं थे. उनकी मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई और वे क्रातिकारी बनने की दिशा में अग्रसर हो गए.

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चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) की सोच का प्रभाव था कि उन्होंने सबको अपना प्रेरणास्रोत बना लिया था.


क्रांति का रास्ता
बिस्मिल से मुलाकात आजाद के जीवन में एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुई. इसके बाद वे ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के सक्रिय सदस्य बनकर क्रांतिकारी बन गए. वैसे तो पार्टी का नेतृत्व बिस्मिल के हाथों में था, लेकिन जल्दी ही आजाद अपने स्पष्ट और ओजस्वी विचारों से सभी साथियों की पसंद बन गए थे जिसमें भगतसिंह भी शामिल थे.

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काकोरी कांड और आजाद
आजाद ने ही बिस्मिल और अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर 9 अगस्त 1925 को काकोरी में चलती ट्रेन को रोककर ब्रिटिश खजाने के लूटा था. इस खजाने को लूटने का उद्देश्य क्रांतिकारी लक्ष्यों को हासिल करने के ले हथियार खरीदना था. इस लूट को काकोरी कांड के नाम से भी जाना जाता है. काकोरी कांड ने ब्रिटिश हूकूमत को हिलाकर रख दिया. और ब्रिटिश हुकूमत आजाद और उनके साथियों के पीछे पड़ गई, लेकिन आजाद बार  बार पुलिस को चकमा देने में पूरी तरह से सफल होते रहे.

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चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) ने अंग्रेजों की तमाम कोशिशों के बाद भी खुद को अंग्रेजों के हाथ नहीं आने दिया. (फोटो: Wikimedia Commons)


लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला
इसके बाद  1928 में लाला लाजपत राय की लाठी चार्ज में मौत के बाद आजाद ने सांडर्स को मारने की योजना बनाई जिसकी वजह से लालाजी की मौत हुई थी. आजाद, भगत सिंह और राजगुरु के साथ लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को लाहौर के पुलिस अधीक्षक दफ्तर के बाहर जमा हुए. फिर जैसे ही सांडर्स अपने अंगरक्षकों के साथ निकला तो भगत सिंह और राजगुरु ने उसपर ताबड़तोड़ फायरिंग कर उसे मार दिया. इसके बाद सांडर्स के अंगरक्षक भगत सिंह और राजगुरु का पीछा करने लगे तब आजाद ने उन अंगरक्षकों को गोली मार दी.

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आजाद ताउम्र अपने नाम के मुताबिक आजाद ख्याल के रहे और हमेशा ही अपने दृढ़, समर्पित विचारों से ओतप्रोत रहे. उन्होंने संकल्प लिया था कि वे कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे और उन्हें फांसी लगाने का मौका अंग्रेजों को कभी नहीं मिल सकेगा. अपने इस वचन को भी आजाद ने पूरी तरह से निभाया.
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