पुण्यतिथि : वो शख्स जिसने नक्सलवाद को जन्म दिया, बाद में पुलिस टार्चर में हुई मौत

पुण्यतिथि : वो शख्स जिसने नक्सलवाद को जन्म दिया, बाद में पुलिस टार्चर में हुई मौत
चारू मजूमदार (फाइल फोटो)

28 जुलाई 1972 को नक्सलवाद के पिता कहे जाने वाले चारू मजूमदार की कोलकाता के लाल बाजार थाने के लॉक अप में मौत हो गई. पुलिस ने उनका शव भी उनके परिजनों को नहीं लेने दिया. वैसे चारू अपने जीते जी ही किसी किवंदति में बदल चुके थे. कैसे उन्होंने नक्सलवाद आंदोलन ख़ड़ा किया.

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चारू मजूमदार ने बंगाल के धनी परिवार में जन्म लिया था. उन्होंने आराम का जीवन छोड़कर मुश्किल क्रांतिकारी जीवन चुना. कहा जाता है कि देश में नक्सलवाद आंदोलन के असल जनक वही थे. आज भी नक्सलवादी उनसे प्रेरणा लेते हैं. चारू का निधन 38 साल पहले आज ही के दिन जेल में हो गया.

चारू का घर पश्चिम बंगाल में सिलिगुड़ी में था. सिलिगुड़ी में हर किसी को उनके घर का पता मालूम है. दरअसल ये घर वहां आइकोनिक बन चुका है. उसको लेकर ना जाने कितनी ही कहानियां कही जाती हैं.

बताया जाता है कि सिलिगुड़ी में महानंदा रोड के हाउस नंबर 25 में चारू मजूमदार रहा करते थे. यहीं वो कॉमरेड दोस्तों के साथ बैठकर नक्सलबाड़ी गांव को जमींदारों के चंगुल से मुक्त कराने की बातें करते थे, योजनाएं बनाते थे.



सिलिगुड़ी के घर में आंदोलन की नींव रखी गई
इसी घर में बैठकर चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने ‘हिस्टोरिक 8 डाक्यूमेंट्स’ तैयार किए थे, जिसने भारत में नक्सलवादी आंदोलन की नींव रखी. चारू मजूमदार 1918 में एक जमींदार परिवार में जन्मे थे. बचपन से ही उन्हें जमींदारी शब्द से चिढ़ थी. ये शब्द उन्हें हैवानियत का प्रतीक लगता था. बंगाल के तकरीबन सभी महान विद्वानों, लेखकों और सामाजिक नेताओं को वो नकार देते थे, उन्हें अभिजात्य व्यवस्था का अंग बताते थे.

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किसानों के तेभागा आंदोलन ने बदल दी जिंदगी
नक्सलवाद की ओर जाने से पहले चारू मजूमदार कांग्रेस में गए. फिर बीड़ी मजदूरों को संगठित करने की कोशिश की. 1937-38 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली. इसके बाद उन्होंने सीपीआई के आंदोलन में जमकर काम किया. तेभागा नाम के आंदोलन ने चारू की जिंदगी ही बदल दी.

दरअसल तेभागा बंगाल में एक ऐसी प्रथा थी, जिसने किसानों की हालत पतली की हुई थी. बंगाल में जब किसान कोई फसल पैदा करता था तो उसकी आधी पैदावार जमींदारों के पास चली जाती थी. जिसे जमींदार अपना टैक्स और हक बताते थे.

चारू मजूमदार को जमींदार शब्द से नफरत थी. उन्होंने अपना सारा जीवन किसानों और मजदूरों की हक की लड़ाई में दे दिया. हालांकि उनकी लड़ाई जिस तरह के हिंसक रही, उसे आज भी बहुत से लोग स्वीकार नहीं कर पाते.


हीरो बन गए चारू
किसानों का मानना था कि जमींदार को वो एक-तिहाई से ज्यादा फसल नहीं देना चाहते. दो तिहाई पर उनका अधिकार होना चाहिए. क्योंकि फसल पर ना केवल उनकी मेहनत होती है बल्कि बीज और अन्य खर्चों का पैसा भी लगा होता है. ये आंदोलन सफल रहा है और देखते ही देखते चारू लोगों की नजरों में चढ़ गए. उन्होंने सीधा सा एक मूलमंत्र बनाया कि हर गांव को जमींदारों और जमींदारी से मुक्ति मिलनी चाहिए.

बात नक्सलबाड़ी को मुक्त कराने से शुरू हुई थी
नक्सलबाड़ी गांव को जमींदारी से मुक्त कराने के लिए उन्हें हथियारबंद आंदोलन करना पड़ा. जिसे नक्सल आंदोलन कहा गया. ये आंदोलन 1968 में हुआ. चारू ने फिर इसके बारे में जो कुछ लिखा, उसने देश में नक्सलवादी आंदोलन को फैलाने का काम किया. चारू इसे लेकर जो भी लिखा, उसे नक्सवादी बाइबल और गीता की तरह मानते हैं.

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पहले कांग्रेस और फिर सीपीआई
चारू का जन्म 1918 में सिलीगुड़ी में हुआ. उनके पिता एक स्वतंत्रता सेनानी थे. 1938 में उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया. देश की आजादी के बाद वो जमींदारी खत्म कराने के अभियान में जुट गए. थोड़े समय के लिए 1962 में वो जेल में भी गए. इससे पहले वो तब भी तीन साल के लिए जेल में रहे जबकि सीपीआई पर 1948 में प्रतिबंध लगा.

शादी की और फिर हिंसक आंदोलन में लग गए
जनवरी 1954 में चारू ने लीला मुजुमदार सेनगुप्ता शादी की, जो जलपुरीगंज से सीपीआई की सदस्या रही थी. शादी के बाद वो सिलीगुड़ी चले गए. आमतौर पर वही उनकी गतिविधियों का केंद्र बन गया. 1967 में नक्सलबारी में हथियारों से लैस किसान विद्रोह छिड़ गया. हिंसा हुई. खून बहा. जानें गईं. इसकी अगुवाई कॉमरेड कानू सान्याल कर रहे थे लेकिन असली भूमिका चारू मजूमदार की थी. इस दल को नक्सली कहा जाने लगा.

चीन की तरह सफल क्रांति करना चाहते थे
चारू चीनी क्रांति की ही तरह सफल क्रांति करना चाहते थे. वो अपने साथियों के साथ माओ से मिलने चीन भी गए थे. 1969 में चारू ने ऑल इंडिया कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ़ कम्युनिस्ट रेवोल्यूशनरीज बनाई, जिसमें वो जनरल सेक्रेट्री बने. 1971 के युद्ध के बाद जबरदस्त तरीके से चारू मजूमदार की खोज शुरू हुई. पता लगा कि वो कोलकाता में छिपे हैं. लेकिन कोई भी उनके बारे में पुलिस को नहीं बताता था.

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पुलिस ने पकड़ा और जमकर यातनाएं दी
पुलिस को आखिरकार उनके एक करीबी को पकड़ने में सफलता मिली. उसे इतना टार्चर किया गया कि उसने बता ही दिया कि चारू कहां हैं. लाल-बाजार लॉक-अप में दस दिन की पुलिस कस्टडी में चारू से किसी को मिलने नहीं दिया गया.

ना वकील और ना कोर्ट में पेशी
वकील को भी नहीं. किसी भी कोर्ट में पेशी नहीं हुई. कहते हैं कि पुलिस ने चारू को भयानक टार्चर किया. लाल-बाजार लॉक-अप उस वक़्त ‘नक्सल टार्चर’ के लिए कुख्यात हो गया था. बिना किसी केस-मुकदमे के 28 जुलाई को उसी लॉक-अप में चारू को मौत मिल गई. कहते हैं कि चारू की डेड बॉडी को भी पुलिस ने घरवालों को नहीं दिया और खुद ही जला दिया.
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