पुण्यतिथि: संजय गांधी की शादी से लेकर इमर्जेंसी और फिर दुखद हादसे की कहानी

पुण्यतिथि: संजय गांधी की शादी से लेकर इमर्जेंसी और फिर दुखद हादसे की कहानी
संजय गांधी जो आपातकाल के दिनों में मां इंदिरा से कहीं ज्यादा असरदार माने जाने लगे थे

23 जून 1980 को संजय गांधी की पुण्यतिथि है. वो सुबह पिट्स विमान उड़ा रहे थे. तभी आकाश में कलाबाजियां लगाने के दौरान उनके विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया और वो जमीन पर आ गिरा. संजय को राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मृत घोषित किया गया

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 23, 2020, 10:37 AM IST
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29 जुलाई 1974 को प्रधानमंत्री आवास से एक छोटी सी घोषणा हुई. ये प्रधानमंत्री के छोटे बेटे की सगाई की थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी की इंगेजमेंट मेनका आनंद से हुई थी. सगाई एक छोटे से समारोह में 01, सफदरजंग रोड पर हुई. जैसे ही खबर फैली, पूरा देश जानने को उत्सुक हो उठा कि प्रधानमंत्री का बेटा किससे शादी कर रहा है, वो लड़की कौन है.

प्रेस के लिए जारी सूचना में जानकारी दी गई, "मेनका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जर्मन भाषा की छात्रा हैं और साप्ताहिक मैगजीन दिल्ली डेटलाइन में पत्रकार." वैसे मेनका पहले ही सुर्खियों में आ चुकी थीं. 1973 में वह दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में मिस लेडी बन चुकी थीं. इस प्रतिभाशाली छात्रा के पास मॉडलिंग के ऑफर आने लगे थे.

विनोद मेहता अपनी किताब 'द संजय स्टोरी' में लिखते हैं कि उन्होंने डेल्ही क्लास मिल्स यानि डीसीएम के लिए एक टॉवेल का बोल्ड विज्ञापन किया. दिल्ली में जगह जगह इसके होर्डिंग्स लगे.



28 जुलाई को इस विज्ञापन को हैंडल करने वाली ऐड एजेंसी के पास अचानक मिसेज आनंद यानि मेनका की मां का फोन आया कि ऐड के ये होर्डिंग्स तुरंत हटा दिए जाएं. उनकी बेटी की जितनी भी तस्वीरें और ट्रांसपेंसीज हों, वापस लौटाएं. रातों-रात वो होर्डिंग्स हट गए. माना जाता है कि ऐड एजेंसी को जता दिया गया था कि प्रधानमंत्री आवास ऐसा ही चाहता है.
केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी, जिनकी संजय गांधी से शादी हुई थी और तब सारा देश उनके बारे में जानना चाहता था


संजय मिले और प्यार फलने फूलने लगा
'फ्री-प्रेस जर्नल' में सोनाली पिमपुतकर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, "दरअसल इसी विज्ञापन को देखकर संजय उन पर मोहित हो गए. संजय उन दिनों मेनका की कजिन वीनू कपूर के मित्र थे. वीनू की शादी के अवसर पर कॉकटेल पार्टी में संजय और मेनका की मुलाकात हुई.

ये पहली मुलाकात 1973 में हुई. तब मेनका 17 साल की थीं. वो शाम दोनों ने साथ साथ काटी. अगले दिन फिर मिलने का फैसला किया. वो अगले दिन मिले. नजदीकियां बढ़ने लगीं. उन्हीं दिनों संजय का हार्निया का ऑप्रेशन हुआ. मेनका रोज उन्हें देखने अस्पताल जाती थीं."

विनोद मेहता ने अपनी किताब में उन दिनों प्रधानमंत्री आवास में काम करने वाली ऊषा भगत को उद्धृत किया. ऊषा ने अपनी एक दोस्त को उन्हीं दिनों लिखा, "संजय इन दिनों सिर से लेकर पैर तक प्यार में डूबे हुए हैं."

जब संजय ने मेनका का हाथ मांगा
“द संजय स्टोरी” में विनोद मेहता ने लिखा, “संजय ने दिवंगत कर्नल आनंद से बेटी का हाथ उनके हाथ में देने का अनुरोध किया. कर्नल आनंद का कहना था कि उन्हें तो कोई एतराज नहीं, लेकिन वो पहले अपनी मां से तो बात कर लें.”

किताब में बताया गया, “जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने ये सुना कि उनका बेटा शादी करने की सोच रहा है तो उन्होंने राहत की सांस ली हालांकि वो आश्वस्त नहीं थीं कि मेनका उनके बेटे के लिए कितनी सही रहेंगी. इंदिरा ने मेनका को बुलाया. उनसे लंबी गंभीर बात की, बातचीत में दो प्वाइंट्स पर खास जोर दिया, पहला, उनके बेटे के साथ रहना आसान नहीं.

दूसरी बात इंदिरा को ज्यादा चिंता में डाल रही थी कि मेनका से संजय दस साल बड़े हैं. मेनका संक्षिप्त जवाब दिया, वो दोनों बातें जानती हैं लेकिन उन्हें दिक्कत नहीं है. आखिरकार प्यार की जीत हुई.”

संजय गांधी और मेनका की शादी साधारण तरीके से हुई. उसमें बहुत कम मेहमान ही बुलाये गए थे. ये शादी गांधी परिवार के मित्र मोहम्मद यूनुस के आवास पर हुई थी. शादी के अगले दिन संजय अपनी कार फैक्ट्री गए और मेनका अपनी जर्मन क्लास.


सादगी से शादी
शादी 29 सितंबर 1974 को हुई. ये बहुत सादगी से हुई. शादी के लिए गांधी परिवार के मित्र मोहम्मद यूनुस का घर चुना गया. इसमें बस परिवार के करीबी लोग बुलाए गए. प्रेस और टीवी को दूर रखा गया. हालांकि 'इलैस्ट्रेटेड वीकली' मैगजीन ने इस शादी में भी एक एंगल निकाल ही लिया, ‘मेनका सिख हैं, संजय की मां एक हिंदू. पिता पारसी और शादी हो रही है एक मुस्लिम के घर से- यानि सेकुलर आइडिया के लिहाज से एकदम परफेक्ट.' हनीमून पर जाने की बजाए मेनका अगले दिन अपनी जर्मन क्लास गईं और संजय अपनी कार फैक्ट्री.

ये शादी अच्छी चली. हालांकि कुछ लोगों का आकलन था कि ये एक साल से ज्यादा नहीं चल पाएगी. जब वर्ष 1980 में हवाई दुर्घटना में संजय की मौत हुई, तब दोनों का बेटा वरुण केवल तीन माह का था. हालांकि इस घटना के कुछ महीनों बाद मेनका और इंदिरा में मतभेद की खबरें आने लगीं.

खुशवंत सिंह ने अपनी किताब 'एब्साल्यूट खुशवंत' में लिखा, “इंदिरा उनके साथ गांव की सासों की तरह व्यवहार करने लगीं.” एक साल बाद सास और बहू के रिश्तों में इतनी खटास आ गई कि मेनका प्रधानमंत्री आवास से निकल गईं. उसके बाद उन्होंने खुद अपना मुकाम बनाया. इन दिनों वह एनडीए सरकार में मंत्री हैं और वरुण बीजेपी के सांसद.

संजय गांधी के बेटे वरुण बीजेपी से सांसद हैं. तमाम मुद्दों को लेकर वो लगातार अखबारों में लिखते रहते हैं


संजय की आपातकालीन मंडली और रुखसाना सुल्तान
आपातकाल में संजय काफी चर्चित हुए. साथ ही चर्चित हुए उनके साथ रहने वाली मंडली. ये चर्चाएं काफी रहीं कि उस दौर में संजय के रिश्ते उनका बायां हाथ कही जाने वाली रुखसाना सुल्तान यानि बेगम रुखसाना से थे.

रुखसाना सुंदर और मार्डन महिला थीं. दिल्ली के प्रसिद्ध बिल्डर शोभा सिंह के परिवार के विक्रम सिंह से कॉलेज के जमाने में उन्हें प्यार हुआ. फिर शादी हो गई. शादी से एक बेटी हुई. जो बॉलीवुड अभिनेत्री अमृता सिंह हैं. तलाक के बाद रुखसाना बुटीक चलाने लगीं. दिल्ली के हाईसर्किल में उनका उठना बैठना था.

तब संजय ने रुखसाना से तुरंत लोगों के बीच जाकर काम करने को कहा

इंडिया टुडे ने 14 अगस्त 2014 के अंक में 'द चीफ ग्लैमर गर्ल ऑफ द इमर्जेंसी' शीर्षक से लंबा लेख छापा. उसमें रुखसाना ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, 'आपातकाल में वो पहली बार संजय गांधी के पास पहुंचीं और उनसे कहा कि मैं आपके साथ काम करना चाहती हूं. संजय ने उन्हें तुरंत पुरानी दिल्ली में लोगों के बीच जाकर काम करने को कहा.'

बाद में ये कहा गया कि उन्होंने पुरानी दिल्ली में करीब 13 हजार नसबंदियां कराईं. हालांकि रुखसाना काफी विवादित रहीं. वो लोगों के बीच ये जताने की कोशिश करती थीं कि वो किस कदर संजय की करीबी हैं. वरिष्ठ पत्रकार राजेश रपरिया कहते हैं, 'संजय और रुखसाना के रिश्तों को लेकर चर्चाएं बेशक ज्यादा रही हों लेकिन उन्हें लगता नहीं कि दोनों के बीच कुछ रहा होगा.'

महिलाओं से नजदीकियों के आरोप
वैसे संजय पर कई बार आरोप लगे कि महिलाएं उनके करीब रहती हैं, लेकिन कभी कोई ऐसी बात खुलकर शायद कभी सामने आई हो. हालांकि दिल्ली में उस जमाने मे धनी कारोबारी कुलदीप नारंग से संजय की दोस्ती पर अलग अलग तरह से टिप्पणियां हुईं.

कुलदीप नैयर अपनी किताब “इमर्जेंसी रिटोल्ड” में कहते हैं कि नारंग के उकसावे पर संजय ने कई काम किये. वहीं पत्रकार कूमी कपूर किताब “इमर्जेंसीः ए पर्सनल हिस्ट्री “ में लिखती हैं किस तरह नारंग आपातकाल में संजय गांधी के लिए तमाम बातें सूंघते फिरते थे.

विनोद मेहता अपनी किताब “द संजय स्टोरी” में इशारों में कहते हैं किस तरह नारंग ने संजय की कमजोरी को लेकर महिलाओं को चारे की तरह इस्तेमाल किया. हालांकि मेहता ने भी ये बात किसी मिडल मैन के उद्धरण के तौर पर कही. ये भी लिखा कि प्रधानमंत्री के बेटे होने के कारण महिलाएं अलग अलग मंशाएं लेकर उनके चारों ओर मंडराती थीं.

जगोटा भाइयों का किस्सा
मेहता ने किताब में जगोटा बंधुओं का जिक्र किया है. एक दिन देर रात जगोटा भाइयों ने अपनी बहन के बारे में डिस्कस करने के लिए संजय से मिलने की कोशिश की. भाई चाहते थे कि उनकी बहन के लिए संजय कुछ सम्मानजनक करें. संजय ने मिलने से मना कर दिया.

पीएम हाउस की सुरक्षा में कह दिया गया कि ये भाई किसी भी सूरत में अंदर नहीं घुस सकें. जगोटा भाई पीएम हाउस में आकर संजय से मिलने के लिए इतने व्यग्र थे कि उन्होंने एक, सफदरजंग हाउस के गेट पर टक्कर मारकर कार को अंदर घुसाने की कोशिश की. दोनों भाइयों को तुरंत गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया. बाद में संजय कैंप ने कहा, ये भाई साजिशन पीएम हाउस में एक लड़की को घुसाने की कोशिश कर रहे थे.

स्तब्ध कर देने वाली मौत
23 जून 1980 का दिन स्तब्धकारी खबर लेकर आया. ये खबर थी विमान उड़ाते हुए हादसे में संजय गांधी के निधन की. उनके बारे में कहा जाता है कि वो विमान को कार की तरह चलाया करते थे. विमान को तेज़ हवा में कलाबाज़ियां खिलाना उनका शौक था. 1976 में उन्हें हल्के विमान उड़ाने का लाइसेंस मिला था, जो इंदिरा गाँधी के सत्ता से हटते ही जनता सरकार ने लाइसेंस छीन लिया था.
इंदिरा गांधी के सत्ता में दोबारा लौटते ही उन्हें ये लाइसेंस वापस मिल गया. मई 1980 में टू सीटर विमान ‘पिट्स एस 2ए’ को भारत आयात करने की मंजूरी मिल गई थी. आनन फानन में ये विमान सफ़दरजंग हवाई अड्डे स्थित दिल्ली फ़्लाइंग क्लब में पहुंच भी गया.

संज संजय गांधी का दुर्घटनाग्रस्त टूसीटर प्लेन (फाइल फोटो)


संजय ने पहली बार 21 जून 1980 को नए पिट्स पर हाथ आज़माया. दूसरे दिन यानी 22 जून को पत्नी मेनका गांधी, इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर के धवन और धीरेंद्र ब्रह्मचारी को लेकर उड़ान भरी. 40 मिनट तक दिल्ली के आसमान पर विमान उड़ाते रहे. 23 जून को वो फिर विमान उड़ाने पहुंचे. वो इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना के साथ बैठे.

ठीक सात बजकर 58 मिनट पर उन्होंने टेक ऑफ़ किया. सुरक्षा नियमों को दरकिनार करते हुए रिहायशी इलाके के ऊपर तीन लूप लगाए. चौथी लूप लगाने ही वाले थे कि विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया.. पिट्स तेज़ी से मुड़ा और नाक के बल ज़मीन से जा टकराया. नया पिट्स टू सीटर मुड़ी हुई धातु में बदल चुका था. उसमें से गहरा काला धुंआ निकल रहा था. किसी तरह विमान के मलबे से दोनों के शरीर निकाले गए. तुरंत एक एंबुलेंस उन्हें लेकर राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंची, जहां दोनों को मृत घोषित कर दिया गया.
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