बिजली के करंट से रोज होती हैं 30 मौतें, इस राज्य का हाल सबसे बुरा

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक साल 2015 में देशभर में कुल 9,986 मौतें करंट लगने की वजह से हुई. इसमें मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में एक-एक हजार मौतें शामिल हैं. बिजली से होने वाली इन मौतों के पीछे बिजली विभाग की लापरवाही और उसकी व्यवस्था में दोष जिम्मेदार है.

News18Hindi
Updated: August 1, 2019, 9:34 AM IST
बिजली के करंट से रोज होती हैं 30 मौतें, इस राज्य का हाल सबसे बुरा
हर साल बढ़ रहे हैं बिजली के करंट से होने वाली मौतों के आंकड़े
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Updated: August 1, 2019, 9:34 AM IST
भारत ने हर क्षेत्र में प्रगति की है. लेकिन कुछ मामले अभी भी ऐसे हैं, जहां के हालात नहीं सुधरते. मसलन बिजली के मामले में पिछले कुछ वर्षों में काफी बदलाव आया है. लेकिन व्यवस्था के स्तर पर इसकी हालत अब भी खराब है. क्या आपको पता है हर साल बिजली के करंट से हजारों लोग मारे जाते हैं. इन मौतों के पीछे व्यवस्था का दोष सबसे अधिक होता है. सबसे ज्यादा मौतें बिजली विभाग की लापरवाही की वजह से खुले तारों की चपेट में आने से होती है. इस लिहाज से आंकड़े हैरान करने वाले हैं. एक आंकड़े के मुताबिक भारत में हर रोज 30 मौतें करंट लगने की वजह से होती हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक साल 2015 में देशभर में कुल 9,986 मौतें करंट लगने की वजह से हुई. इसमें मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में एक-एक हजार मौतें शामिल हैं. बिजली से होने वाली इन मौतों के पीछे बिजली विभाग की लापरवाही और उसकी व्यवस्था में दोष जिम्मेदार है. ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं. इसके बाद भी हालात नहीं सुधरे हैं. सेफ्टी के लिहाज से इलेक्ट्रीसिटी ने अपनी आंखें मूंद रखी हैं. यहां तक कि समस्या बढ़ती ही जा रही है.

बिजली के करंट से होने वाली मौतों में नहीं आ रही कमी

पिछले कुछ वर्षों में बिजली के करंट से होने वाली मौतों में किसी भी तरह की कमी नहीं आई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक साल 2011 में करंट लगने से 8,945 मौतें हुई. 2012 में 8,750 मौतें हुई. 2013 में करंट से होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़कर 10,218 हो गया. 2014 में इसकी वजह से 9,606 मौतें हुईं और 2015 में 9,986 मौतें.

death due to electric current nearly 30 indians daily uttar pradesh has more electrocution cases
यूपी का हाल सबसे बुरा है


उत्तर प्रदेश का हाल और भी बुरा है. यहां पिछले 7 साल में करंट से होने वाली मौतें दोगुनी हो गई है. 2012-13 में यहां करंट लगने की वजह से 570 लोग मारे गए थे. वहीं 2012-13 में ये आंकड़ा बढ़कर 1,120 हो गया. बिजली विभाग इन आंकड़ों पर गौर करने की जहमत नहीं उठाता. उनकी आंख तभी खुलती है, जब बहुत बड़ा हादसा हो जाए.

करंट से होने वाली मौतों में उत्तर प्रदेश का हाल सबसे बुरा
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पिछले दिनों यूपी में बलरामपुर के एक प्राथमिक स्कूल पर हाईटेंशन वायर गिर गया. उसकी चपेट में आकर 51 बच्चे झुलस गए. स्कूल परिसर के पीछे से हाईटेंशन वायर गुजरा था. अरसे से तार झूल रहा था लेकिन बिजली विभाग ने मरम्मत करने की जहमत नहीं उठाई. एक दिन अचानक बिजली का तार पेड़ पर गिर गया. क्लास में अपनी-अपनी बेंच पर बैठे-बैठे बच्चे करंट की चपेट में आकर झुलसने लगे.

इतनी बड़ी संख्या में बच्चों के जख्मी होने की वजह से ये खबर नेशनल मीडिया में आई. छोटे-मोटे मामले तो ऐसे ही दबे रह जाते हैं. इस घटना के बाद यूपी सरकार ने बिजली विभाग को आदेश दिए कि वो ऐसी जगहों की लिस्ट बनाए जहां स्कूल के नजदीक से हाई टेंशन वायर गुजरे हों. ऐसे इलाकों में बिजली के तारों को वहां से शिफ्ट किया जाए. या फिर बार-बार मरम्मत करवाई जाए.

उत्तर प्रदेश में करंट से होने वाली मौतों का आंकड़ा हर साल बढ़ रहा है. 2015-16 में यहां करंट लगने से 723 लोगों की मौत हुई थी. 2016-17 में ये आंकड़ा बढ़कर 958 हो गया. 2017-18 में करंट की वजह से 1,131 लोगों ने अपनी जान गंवाई. वहीं 2018-19 में अभी तक मौत का आंकड़ा 1,120 पहुंच चुका है. पिछले 7 साल में इस प्रदेश में करंट लगने से 5,700 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.

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2015 में मध्य प्रदेश में करंट से हुई सबसे ज्यादा मौतें


2015 में करंट से सबसे ज्यादा मौतें मध्य प्रदेश में हुई

2015 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक मध्य प्रदेश में बिजली से सबसे ज्यादा मौतें हुई. 2015 में मध्य प्रदेश में 1,545 लोग बिजली की चपेट में आकर जान गंवा बैठे. वहीं दूसरा स्थान महाराष्ट्र का रहा, जहां करंट की वजह से 1,361 मौतें हुई. राजस्थान में इस साल 1,066 लोग करंट की चपेट में आकर मारे गए, वहीं आंध्र प्रदेश में 637 लोगों की मौत हुई.

हमारे यहां बिजली के तारों और उसके उपकरणों की सेफ्टी को बहुत कम जागरुकता होती है. सुरक्षा का ख्याल नहीं रखा जाता है. इलेक्ट्रिक उपकरणों की खराब क्वालिटी की वजह से भी जान-माल का नुकसान होता है. सेफ्टी के लिहाज से कुछ मापदंड तय हैं लेकिन उसे फॉलो नहीं किया जाता.

मसलन बिजली के दो पोलों के बीच आम तौर पर 50 फीट की दूरी होनी चाहिए. पोल की ऊंचाई कम से कम 18 फीट होनी चाहिए. लेकिन ये दोनों ही मापदंड फॉलो नहीं किए जाते. बिजली के पोल और उसके तारों की मरम्मत पर भी ध्यान नहीं दिया जाता. तेज हवा की वजह से अक्सर दुर्घटनाएं होती हैं. इनसे बचने के लिए अंडरग्राउंड तार बिछाए जाने चाहिए. यूरोपिय देशों में ऐसा ही होता है लेकिन हमारे यहां अभी तक इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है.

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First published: August 1, 2019, 9:34 AM IST
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