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कोरोना वायरस: जितना माना गया था, उससे कम है मौत की दर

News18Hindi
Updated: April 1, 2020, 10:58 AM IST
कोरोना वायरस: जितना माना गया था, उससे कम है मौत की दर
महिला की मौत सांस व अन्य बीमारी के चलते हुई है. (सांकेतिक फोटो)

नई स्टडी बताती है कि कोविड- 19 (Covid-19) से हुई मौतों की असल संख्या दिखाए जा रहे आंकड़े से कहीं कम है.

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  • Last Updated: April 1, 2020, 10:58 AM IST
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कोरोना वायरस का संक्रमण (coronavirus infection) अब दुनिया के सारे देशों में फैल चुका है. संक्रमित लोगों का आंकड़ा जहां साढ़े 8 लाख से ज्यादा हो चुका है, वहीं मौत की दर भी बढ़ रही है. फिलहाल तक 42000 से ज्यादा लोगों की कोरोना संक्रमण से मौत हुई मानी जा रही है. इधर एक नई स्टडी के अनुसार असल में कोरोना इंफेक्शन से उतनी मौतें हुई नहीं है, जितनी अबतक मानी जा जा रही थी.

The Lancet Infectious Diseases में छपी एक स्टडी बताती है कि कोरोना से हुई कुल मौतों का प्रतिशत 0.66 है. पहले इसे 1.38% बताया जा रहा था जो कि चीन के वुहान से मिले डाटा पर आधारित था. नए शोध में infection fatality ratio को समझने के लिए वैज्ञानिकों 50 हजार मरीजों को लिया. शोध में उन्हें भी शामिल किया, जिनमें बीमारी के हल्के-फुल्के लक्षण दिख रहे थे. ये वे मरीज थे जो चीन के वुहान से कोरोना की शुरुआत में ही अपने-अपने देशों में वापस लौट चुके थे. पहले हुई स्टडी में मौतों की गणना करते वक्त इन लोगों को शामिल नहीं किया गया था, जिससे औसत आंकड़े बढ़े हुए आए.

इस वायरस को सामान्य इंफ्लूएंजा की तरह लेने से बचना चाहिए, खासकर युवाओं को




कोरोना पॉजिटिव इन सभी लोगों को Polymerase chain reaction (PCR) टेस्ट से गुजारा गया. ये वो टेस्ट है जिससे वायरस के जेनेटिक मटेरियल का पता लगता है. इस जांच में डायमंड क्रूज की सवारियों को भी शामिल किया गया. चूंकि इस नई स्टडी में ऐसे लोगों को भी रखा गया, जिनमें बीमारी के हल्के या फिर कोई भी लक्षण नहीं थे, वैज्ञानिकों को कोरोना वायरस संक्रमित लोगों के असल नंबर का पता चल सका.



इस दौरान देखा गया कि मौत की दर का उम्र से गहरा संबंध है. लैंसेट में छपे नए शोध में कई अहम बातें निकलकर आईं-

  • शून्य से 9 साल आयु के मरीजों में ये 0.0016% देखी गई. वहीं 80 या इससे ज्यादा उम्र के लोगों में इसका प्रतिशत काफी ज्यादा 7.8% रहा.

  • रिसर्च में ये भी दिखा कि 80 की उम्र के लगभग मरीजों में हर 5 में से 1 मरीज को अस्पताल में भर्ती किए जाने की जरूरत होती है. लेकिन 30 के आयुवर्ग में सिर्फ 1 प्रतिशत लोग बीमारी की इतनी गंभीर अवस्था में पहुंचते हैं.


इस बारे में The University of Miami के प्रोफेसर Shigui Ruan कहते हैं कि COVID-19 के मामले में मौत के असल आंकड़ों तक पहुंचना मुश्किल है लेकिन यही आंकड़े काफी जरूरी भी हैं. इनसे पता चलता है कि हमें बीमारी से लड़ने के लिए किस तरह की तैयारी चाहिए. और किस तरह के लक्षणों वाले लोगों को ज्यादा देखरेख की जरूरत हो सकती है.

शोध में उन्हें भी शामिल किया, जिनमें बीमारी के हल्के-फुल्के लक्षण दिख रहे थे


कोरोना के मामले में एक बात ये भी निकलकर आई कि अलग-अलग देशों में मौत की दर अलग-अलग है. इसकी वजह वहां के सरकार की पॉलिसी और आउटब्रेक के दौरान वहां क्या किया गया, इसपर निर्भर करती है. जैसे जिन देशों में पहले ही लॉकडाउन या सोशल डिस्टेंसिंग जैसे कदम उठाए गए, वहां कम से कम लोग संक्रमित आ रहे हैं. इसमें कॉन्टैक्ट ट्रैकिंग का भी अहम रोल रहा.

औसत रिकवरी टाइम
बीमारी के पहले संकेत और मौत के बीच औसत वक्त 17.8 माना गया. ये आंकड़ा बढ़ सकता है क्योंकि स्टडी में आउटब्रेक का शुरुआती डाटा लिया गया. रिकवरी और अस्पताल से डिस्चार्ज के बीच का औसत वक्त 22.6 दिन माना जा रहा है. स्टडी में देखा गया कि इलाज के बाद गंभीर लक्षणों वाले मरीज भी अधिकतर ठीक हो रहे हैं और ज्यादातर लोगों में कोरोना के हल्के-फुल्के लक्षण ही दिख रहे हैं.

वैज्ञानिकों का ये भी कहना है कि इस वायरस को सामान्य इंफ्लूएंजा की तरह लेने से बचना चाहिए, खासकर युवाओं को. चूंकि युवाओं में कोरोना पॉजिटिव होने पर भी रोग के हल्के-फुल्के लक्षण हैं और मौत की दर कम है, इसके बावजूद ये इंफ्लूएंजा से कहीं ज्यादा खतरनाक और जानलेवा है. उसकी तुलना में कोरोना से मौत की दर अब भी 33 गुना ज्यादा मानी जा सकती है.

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First published: April 1, 2020, 10:58 AM IST
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